संत कबीर दास

इस संग्रह के बारे में

कबीर 15वीं सदी के संत, कवि और समाज-सुधारक थे। काशी में पले-बढ़े कबीर ने न किसी एक मत को अपनाया, न किसी को छोड़ा — उन्होंने जाति, कर्मकांड और दिखावे की भक्ति पर सीधे प्रश्न किए। उनकी भाषा सधुक्कड़ी थी: जनता की भाषा, जिसमें ब्रज, अवधी, भोजपुरी और खड़ी बोली घुली-मिली है।

कबीर की सबसे बड़ी देन उनका दोहा है — दो पंक्तियों में कही गई बात, जो सुनने वाले के भीतर देर तक गूँजती रहे। यही कारण है कि पाँच सौ साल बाद भी उनके दोहे पाठ्यपुस्तकों, सत्संगों और रोज़मर्रा की बातचीत में जीवित हैं।

यह संग्रह

इस वेबसाइट पर कबीर के दोहे सरल हिंदी अर्थ के साथ दिए गए हैं। हर दोहे का अपना पृष्ठ है, और दोहे विषय के अनुसार भी छाँटे गए हैं — ताकि जो पढ़ना हो, वह आसानी से मिल जाए।

दोहे लोक-परंपरा से आते हैं और सार्वजनिक डोमेन में हैं। अर्थ और व्याख्या इस साइट के लिए लिखे गए हैं।

त्रुटि दिखे तो

पाठ या अर्थ में कोई भूल दिखे तो कृपया संपर्क करें — सुधार कर दिया जाएगा।