आज का दोहा › ज्ञान और विवेक

ज्ञान और विवेक पर कबीर के दोहे

27 दोहे · अर्थ सहित

010

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

संत की जाति मत पूछो, उसका ज्ञान परखो। जैसे तलवार खरीदते समय उसकी धार का मोल लगाया जाता है, म्यान का नहीं—वैसे ही मनुष्य का मूल्य उसके गुणों से है, कुल या जाति से नहीं।

ज्ञान और विवेक
035

हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट।
बाँधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट॥

जहाँ साग-सब्जी बेचने वालों का बाजार हो वहाँ हीरे की गठरी मत खोलो। वहाँ चुप्पी की पोटली बाँधकर अपने रास्ते चल दो। ज्ञान अपात्र के सामने प्रकट करना व्यर्थ है।

ज्ञान और विवेक
053

कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय॥

जो कहना था कह दिया, अब कुछ कहने को शेष नहीं। द्वैत मिट गया, केवल एक बचा—जैसे लहर दरिया में समा जाती है। यह अद्वैत-अनुभव की चरम अवस्था है।

ज्ञान और विवेक
054

वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल।
बिना करम का मानव, फिरै डावाडोल॥

अनमोल वस्तु सागर की तरह भरी पड़ी है, पर उसका कोई ग्राहक नहीं। भाग्यहीन और कर्महीन मनुष्य यूँ ही डाँवाडोल भटकता फिरता है। मूल्य वस्तु का नहीं, पारखी का अभाव है।

ज्ञान और विवेक
055

कलि खोटा जग आँधरा, शब्द न माने कोय।
चाहे कहूँ सत आइना, सो जग बैरी होय॥

कलियुग खोटा है और संसार अंधा—कोई सच्चे उपदेश को नहीं मानता। जो दर्पण की तरह सच दिखा दे, संसार उसी को अपना शत्रु बना लेता है।

ज्ञान और विवेक
070

जा कारण जग ढूँढ़िया, सो तो घट ही माँहि।
परदा दिया भरम का, ताते सूझे नाहिं॥

जिसे पाने के लिए सारा संसार छान मारा, वह तो अपने ही हृदय में है। बीच में भ्रम का परदा पड़ा है, इसीलिए वह दिखाई नहीं देता।

ज्ञान और विवेक
080

दाया भाव हृदय नहीं, ज्ञान थके बेहद।
ते नर नरक ही जायेंगे, सुनि-सुनि साखी शब्द॥

जिनके हृदय में दया का भाव नहीं, उनका असीम ज्ञान भी थक कर व्यर्थ हो जाता है। ऐसे लोग साखी और उपदेश सुनते रहने पर भी नरक ही जाएँगे। दया के बिना ज्ञान निष्फल है।

ज्ञान और विवेक
099

जहँ ग्राहक तहँ मैं नहीं, जहाँ मैं ग्राहक नाहिं।
मूरख यह भरमत फिरे, पकड़ शब्द की छाँय॥

जहाँ ग्राहक है वहाँ मैं नहीं पहुँचता, और जहाँ मैं हूँ वहाँ कोई ग्राहक नहीं। मूर्ख लोग शब्द की छाया भर पकड़कर भटकते फिरते हैं, तत्त्व तक नहीं पहुँचते।

ज्ञान और विवेक
101

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर।
तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान न पूर॥

जब तक सूर्य नहीं उगता तभी तक तारे टिमटिमाते हैं। इसी तरह जब तक पूर्ण ज्ञान का उदय नहीं होता, तब तक जीव कर्मों के बंधन में बँधा संसार में भटकता रहता है।

ज्ञान और विवेक
112

जो जन भीगे रामरस, बिगत कबहूँ ना रूख।
अनुभव भाव न दरसते, ना दुःख ना सुख॥

जो व्यक्ति राम-रस में भीग गया, वह कभी सूखता नहीं। उसका अनुभव बाहर से दिखाई नहीं देता; उस अवस्था में न दुःख रहता है, न सुख—वह दोनों से परे हो जाता है।

ज्ञान और विवेक
115

जहर की जमीं में है रोपा, अभी सींचे सौ बार।
कबीरा खलक न तजे, जामें कौन विचार॥

जो पौधा विष की भूमि में रोपा गया हो, उसे सौ बार सींचने पर भी अमृत नहीं देगा। कबीर कहते हैं—फिर भी संसार अपनी कुप्रवृत्ति नहीं छोड़ता, इसमें भला कौन-सा विवेक है?

ज्ञान और विवेक
124

लीक पुरानी को तजें, कायर कुटिल कपूत।
लीक पुरानी पर रहें, शातिर सिंह सपूत॥

पुरानी और परखी हुई राह को कायर, कुटिल और कुपुत्र ही छोड़ते हैं। बुद्धिमान, सिंह-सा साहसी और सुपुत्र उसी मर्यादा पर टिके रहते हैं।

ज्ञान और विवेक
151

कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढ़े बन माँहि।
ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाहिं॥

कस्तूरी हिरन की अपनी ही नाभि में बसी है, पर वह उसे सारे वन में ढूँढ़ता फिरता है। इसी तरह राम हर हृदय में हैं, पर दुनिया उन्हें देख नहीं पाती।

ज्ञान और विवेक
160

घी के तो दर्शन भले, खाना भला न तेल।
दाना तो दुश्मन भला, मूरख का क्या मेल॥

घी के दर्शन भी भले हैं, पर तेल खाना भी अच्छा नहीं। समझदार शत्रु भी भला है, पर मूर्ख से कैसा मेल? विवेकहीन का साथ सबसे हानिकारक है।

ज्ञान और विवेक
171

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय॥

पोथियाँ पढ़-पढ़कर सारा संसार मर गया, पर कोई पंडित न बन सका। प्रेम के ढाई अक्षर जो पढ़ ले, वही सच्चा पंडित है। ग्रंथों से नहीं, प्रेम से ज्ञान आता है।

ज्ञान और विवेक
239

चतुराई सूवै पढ़ी, सोइ पंजर माहिं।
फिरि प्रमोधै आन कों, आपण समझे नाहिं॥

तोते ने चतुराई की बातें रट लीं, पर वह स्वयं पिंजरे में ही बंद है। वह दूसरों को उपदेश देता है, पर अपनी दशा नहीं समझता। रटा हुआ ज्ञान मुक्त नहीं करता।

ज्ञान और विवेक
346

नीर पियावत क्या फिरै, सायर घर-घर बारि।
जो तृषावंत होइगा, सो पीवेगा झखमारि॥

पानी पिलाते क्यों फिरते हो, घर-घर में तो सागर भरा है। जो सचमुच प्यासा होगा, वह स्वयं ढूँढ़कर पी लेगा। ज्ञान थोपा नहीं जाता।

ज्ञान और विवेक
348

हीरा परा बजार में, रहा छार लिपटाइ।
बहुतक मूरख चलि गये, पारिख लिया उठाइ॥

हीरा बाजार में धूल से लिपटा पड़ा रहा। बहुत-से मूर्ख उसे लाँघकर चले गए, पर पारखी ने पहचानकर उठा लिया। योग्यता पहचानने वाला विरला होता है।

ज्ञान और विवेक
372

पंडित पढ़ि गुनि पचि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान।
ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, सत्त शब्द परनाम॥

पंडित पढ़-पढ़कर और गुनकर खप गए, पर गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिला। ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं—इसलिए सत्य शब्द को प्रणाम है।

ज्ञान और विवेक
439

कबीर हृदय कठोर के, शब्द न लागे सार।
सुधि-सुधि के हिरदे विधे, उपजै ज्ञान विचार॥

कठोर हृदय वाले को शब्द का सार नहीं लगता। पर जो सुधि वाले हैं, उनका हृदय बिंध जाता है और उसमें ज्ञान-विचार उपज आता है।

ज्ञान और विवेक
513

साधु ऐसा चाहिए, जाके ज्ञान विवेक।
बाहर मिलते सों मिलें, अंतर सबसों एक॥

साधु ऐसा चाहिए जिसमें ज्ञान और विवेक हो। बाहर से वह जो मिले उससे मिलता है, पर भीतर से सबके साथ एक ही रहता है।

ज्ञान और विवेक
556

शब्द विचारे पथ चलै, ज्ञान गली दे पाँव।
क्या रमता क्या बैठता, क्या गृह कंदला छाँव॥

जो शब्द का विचार करके मार्ग पर चले और ज्ञान की गली में पाँव रखे—उसके लिए घूमना या बैठना, घर या वन की छाया, सब बराबर है।

ज्ञान और विवेक
798

हस्ती चढ़िये ज्ञान की, सहज दुलीचा डार।
श्वान रूप संसार है, भकन दे झक मार॥

ज्ञान के हाथी पर सहज का गलीचा डालकर सवार हो जाओ। संसार कुत्ते के समान है—उसे भौंकने दो, वह अपने आप थक जाएगा।

ज्ञान और विवेक
804

जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

जो गहरे पानी में उतरे, उन्होंने ही मोती पाया। कबीर कहते हैं—मैं डूबने के डर से किनारे ही बैठा रहा, इसलिए खाली रह गया। बिना गहराई में उतरे कुछ नहीं मिलता।

ज्ञान और विवेक