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संत कबीर के सभी 802 दोहे
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गुरु महिमा 136
- 004गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूँ पाँय।
- 005बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
- 013कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
- 047राम रहे बन भीतरे, गुरु की पूजा ना आस।
- 049तीरथ गये ते एक फल, संत मिले फल चार।
- 104सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराय।
- 127गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हर का सेव।
- 129काँचे भाँडे से रहे, ज्यों कुम्हार का देह।
- 154कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
- 196ना गुरु मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव।
- 197सतगुर हम सूं रीझि करि, एक कह्या करि संग।
- 198कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीष।
- 199यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
- 231कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि घरी खटाइ।
- 233इहि उदर के कारणे, जग पाच्यो निस जाम।
- 236कलि का स्वमी लोभिया, मनसा घरी बधाई।
- 247कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खाँड़।
- 352गुरु सों ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजिए दान।
- 353गुरु को कीजै दंडवत, कोटि-कोटि परनाम।
- 354कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
- 355गुरु पारस को अंतरो, जानत है सब संत।
- 356गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय।
- 357जो गुरु बसै बनारसी, सीष समुंदर तीर।
- 358गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान।
- 359गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
- 360गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं।
- 361लच्छ कोष जो गुरु बसै, दीजै सुरति पठाय।
- 362गुरु मूरति गति चंद्रमा, सेवक नैन चकोर।
- 363गुरु सों प्रीति निबाहिये, जेहि तत निबटै संत।
- 364गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
- 365गुरु मूरति आगे खड़ी, दुनिया भेद कछु नाहिं।
- 366गुरु शरणागति छाड़ि के, करै भरोसा और।
- 367सिष खाँडा गुरु भसकला, चढ़ै शब्द खरसान।
- 368ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास।
- 369अहं अग्नि निशि दिन जरै, गुरु सो चाहे मान।
- 370जैसी प्रीति कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय।
- 371मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव।
- 373सोइ-सोइ नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम।
- 374कहें कबीर जजि भरम को, नन्हा है कर पीव।
- 375कोटिन चंदा उगही, सूरज कोटि हज़ार।
- 376तबही गुरु प्रिय बनै कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत।
- 377तन मन शीष निछावरै, दीजै सरबस प्रान।
- 378जो गुरु पूरा होय तो, शीषहि लेय निबाहि।
- 379भौ सागर की त्रास ते, गुरु की पकड़ो बाँहि।
- 380करै दूरि अज्ञानता, अंजन ज्ञान सुदेय।
- 381सुनिये संतों साधु मिलि, कहहिं कबीर बुझाय।
- 382अबुध सुबुध सुत मातु पितु, सबहि करै प्रतिपाल।
- 383लौ लागी विष भागिया, कालख डारी धोय।
- 384राजा की चोरी करे, रहै रंग की ओट।
- 385साबुन बिचारा क्या करे, गाँठे राखे मोय।
- 386सद्गुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय।
- 387सतगुरु शरण न आवहीं, फिर फिर होय अकाज।
- 388सतगुरु सम कोई नहीं, सात दीप नौ खंड।
- 389सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय।
- 390सतगुरु मिले जु सब मिले, न तो मिला न कोय।
- 391जेहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव।
- 392मनहि दिया निज सब दिया, मन से संग शरीर।
- 393सतगुरु को माने नहीं, अपनी कहै बनाय।
- 394जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान।
- 395कबीर समूझा कहत है, पानी थाह बताय।
- 396बिन सतगुरु उपदेश, सुर नर मुनि नहिं निस्तरे।
- 397केते पढ़ि गुनि पचि भए, योग यज्ञ तप लाय।
- 398डूबा औघट न तरै, मोहि अंदेशा होय।
- 399सतगुरु खोजो संत, जो व काज को चाहहु।
- 400करहु छोड़ कुल लाज, जो सतगुरु उपदेश है।
- 401यह सतगुरु उपदेश है, जो मन माने परतीत।
- 402जग सब सागर मोहि, कहु कैसे बूड़त तेरे।
- 403जानीता बूझा नहीं, बूझि किया नहीं गौन।
- 404जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरंध।
- 405गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव।
- 406आगे अंधा कूप में, दूजे लिया बुलाय।
- 407गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं।
- 408पूरा सतगुरु न मिला, सुनी अधूरी सीख।
- 409कबीर गुरु है घाट का, हाँटू बैठा चेल।
- 410गुरु-गुरु में भेद है, गुरु-गुरु में भाव।
- 411जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रांति न जिसका जाय।
- 412झूठे गुरु के पक्ष की, तजत न कीजै वार।
- 413सद्गुरु ऐसा कीजिये, लोभ मोह भ्रम नाहिं।
- 414कबीर बेड़ा सार का, ऊपर लादा सार।
- 415जो गुरु को तो गम नहीं, पाहन दिया बताय।
- 416सोचे गुरु के पक्ष में, मन को दे ठहराय।
- 417गु अँधियारी जानिये, रु कहिये परकाश।
- 418गुरु नाम है गम्य का, शीष सीख ले सोय।
- 419गुरुवा तो घर फिरे, दीक्षा हमारी लेह।
- 420गुरुवा तो सस्ता भया, कौड़ी अर्थ पचास।
- 421जाका गुरु है गीरही, गिरही चेला होय।
- 422गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तन ताप।
- 423गुरु बिचारा क्या करै, शब्द न लागै अंग।
- 424गुरु बिचारा क्या करे, हृदय भया कठोर।
- 425कहता हूँ कहि जात हूँ, देता हूँ हेला।
- 426शिष्य पुजै आपना, गुरु पूजै सब साध।
- 427हिरदे ज्ञान न उपजै, मन परतीत न होय।
- 428ऐसा कोई न मिला, जासू कहूँ निसंक।
- 429शिष किरपिन गुरु स्वारथी, किले योग यह आय।
- 430स्वामी सेवक होय के, मनही में मिलि जाय।
- 431गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि।
- 432सत को खोजत मैं फिरूँ, सतिया न मिलै न कोय।
- 433देश-देशांतर मैं फिरूँ, मानुष बड़ा सुकाल।
- 436जो कामिनि परदै रहे, सुनै न गुरुगुण बात।
- 437चौंसठ दीवा जोय के, चौदह चंदा माहिं।
- 442कंचन मेरू अरपही, अरपें कनक भंडार।
- 444शुकदेव सरीखा फेरिया, तो को पावे पार।
- 447साकट मन का जेवरा, भजै सो करराय।
- 451टेक न कीजै बावरे, टेक माहि है हानि।
- 453निगुरा ब्राह्मण नहिं भला, गुरुमुख भला चमार।
- 516और देव नहिं चित्त बसै, मन गुरु चरण बसाय।
- 555जौ मानुष गृह धर्मयुत, राखै शील विचार।
- 607सतगुरु शब्द उलंघ के, जो सेवक कहूँ जाय।
- 608तू तू करूँ तो निकट है, दुर-दुर करू हो जाय।
- 609सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय।
- 610अनराते सुख सोवना, राते नींद न आय।
- 611यह मन ताको दीजिये, साँचा सेवक होय।
- 612गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
- 613आशा करै बैकुंठ की, दुरमति तीनों काल।
- 614द्वार धनी के पड़ि रहे, धका धनी का खाय।
- 615उलटे सुलटे बचन के, शीष न मानै दुख।
- 616कहें कबीर गुरु प्रेम बस, क्या नियरै क्या दूर।
- 617गुरु आज्ञा लै आवही, गुरु आज्ञा लै जाय।
- 618गुरुमुख गुरु चितवत रहे, जैसे मणिहि भुजंग।
- 619यह सब तच्छन चितधरे, अप लच्छन सब त्याग।
- 622कबीर गुरु कै भावते, दूरिह ते दीसंत।
- 623सुख दुख सिर ऊपर सहै, कबहु न छोड़े संग।
- 624गुरु समरथ सिर पर खड़े, कहा कभी तोहि दास।
- 625लगा रहै सत ज्ञान सो, सबही बंधन तोड़।
- 626काहू को न सतापिये, जो सिर हंता होय।
- 627दास कहावन कठिन है, मैं दासन का दास।
- 629दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावै दास।
- 683कै खाना कै सोवना, और न कोई चीत।
- 688आछे दिन पाछे गये, गुरु सों किया न हेत।
- 693ऊँचा मंदिर मेड़िया, चला कली ढुलाय।
- 707यह तन काँचा कुंभ है, चोट चहूँ दिस खाय।
- 723डर करनी डर परम गुरु, डर पारस डर सार।
- 728बैल गढ़ंता नर, चूका सींग रु पूँछ।
- 776घाट जगाती धर्मराय, गुरुमुख ले पहिचान।
- 797कहते तो कहि जान दे, गुरु की सीख तु लेय।
- 799या दुनिया दो रोज की, मत कर या सो हेत।
भक्ति और नाम-स्मरण 115
- 001दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
- 007सुख में सुमिरन ना किया, दुःख में किया याद।
- 009लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
- 014पाँच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय।
- 015कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान।
- 020नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग।
- 029क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन माँहि।
- 039सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप।
- 050सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन।
- 056कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय।
- 060भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय।
- 061घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार।
- 062अंतर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार।
- 066सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग।
- 067सुमिरत सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल।
- 071जबही नाम हिरदे धरा, भया पाप का नाश।
- 074जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय।
- 075जल ज्यों प्यारा माहरी, लोभी प्यारा दाम।
- 078जब लगि भगति सकाम है, तब लग निष्फल सेव।
- 084जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं वहाँ काम।
- 090जब ही नाम हृदय धरयो, भयो पाप का नाश।
- 093बाहर क्या दिखलाए, अंतर जपिए राम।
- 096कथा-कीर्तन कुल विशे, भवसागर की नाव।
- 110सुमरण की सुध यों करो, ज्यों गागर पनिहार।
- 122अपने-अपने साख की, सबही लीनी मान।
- 137उज्ज्वल पहरे कापड़ा, पान-सुपारी खाय।
- 152कबीरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार।
- 162जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहारी।
- 167ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत।
- 168तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय।
- 181मथुरा भावै द्वारिका, भावे जो जगन्नाथ।
- 185राम नाम चीन्हा नहीं, कीना पिंजर बास।
- 195राम-नाम कै पटंतरै, देबे कों कुछ नाहिं।
- 201राम पियारा छाँड़ि करि, करै आन का जाप।
- 204लंबा मारग, दूरि घर, विकट पंथ, बहुमार।
- 206यह तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं।
- 207अंदेसड़ा न भाजिसी, सदै सो कहियां।
- 208इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव।
- 209अंषड़ियाँ झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।
- 219दीठा है तो कस कहूँ, कह्या न को पितयाइ।
- 220भारी कहों तो बहु डरों, हलका कहूँ तौ झूठ।
- 222कबीर रेख स्यंदूर की, काजल दिया न जाइ।
- 223कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउं।
- 226भगति बिगाड़ी कामिया, इंद्री केरै स्वादि।
- 232स्वामी हूवा सीतका, पैलाकार पचास।
- 241सबै रसाइण मैं किया, हरि सा और न कोई।
- 242हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार।
- 243कबीर हरि-रस यों पिया, बाकी रही न थाकि।
- 254कबीर पढ़ियो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाइ।
- 255मैं जान्यूँ पाढ़िबो भलो, पाढ़िबा थे भलो जोग।
- 260साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
- 268मेरे संगी दोइ जरग, एक वैष्णौ एक राम।
- 273कबीरा बन-बन में फिरा, कारणि आपणै राम।
- 278काजल केरी कोठड़ी, तैसी यहु संसार।
- 286जिनके नौबति बाजती, भगलैं बंधते बारि।
- 289नान्हा कातौ चित्त दे, महँगे मोल बिलाइ।
- 290कबीर केवल राम की, तू जिनि छाँड़ै ओट।
- 294माला पहरयां कुछ नहीं, भगति न आई हाथ।
- 297चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात।
- 299कबीर हरि का भावता, झीणां पंजर मांस।
- 302जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूँ छाना होइ।
- 305पावक रूपी राम है, घटि-घटि रह्या समाइ।
- 308जिहिं धरि साध न पूजि, हरि की सेवा नाहिं।
- 309कबीर कुल तौ सो भला, जिहि कुल उपजै दास।
- 310क्यूँ नृप-नारी नींदिये, क्यूँ पनिहारी कौ मान।
- 311काबा फिर कासी भया, राम भया रे रहीम।
- 314कबीर का तू चितवै, का तेरा च्यंत्या होइ।
- 316कबीर सब जग हंडिया, मादल कंधि चढ़ाइ।
- 321जिस मरनै यै जग डरै, सो मेरे आनंद।
- 324कबीर हरि सब कूँ भजै, हरि कूँ भजै न कोइ।
- 325सिर साटैं हरि सेवइये, छाँड़ि जीव की बाणि।
- 336कबीर हरि के नाव सूँ, प्रीति रहै इकवार।
- 434कबीर गुरु की भक्ति बिन, राजा ससभ होय।
- 435कबीर गुरु की भक्ति बिन, नारी कूकरी होय।
- 454हरिजन आवत देखिके, मोहड़ो सूखि गयो।
- 455खसम कहावै बैरनव, घर में साकट जोय।
- 465बार-बार नहिं करि सके, पाख-पाख करि लेय।
- 468छठे मास नहिं करि सके, बरस दिना करि लेय।
- 542कुलवंता कोटिक मिले, पंडित कोटि पचीस।
- 557गिरही सुवै साधु को, भाव भक्ति आनंद।
- 566घर में रहै तो भक्ति करूँ, ना तरू करू बैराग।
- 628दासातन हिरदै बसै, साधु न सो अधीन।
- 630भक्ति कठिन अति दुर्लभ, भेष सुगम नित सोय।
- 631भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनंत।
- 632भक्ति भाव भादों नदी, सबै चली घहराय।
- 633भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त हरषाय।
- 634भक्ति दुहेली गुरुन की, नहिं कायर का काम।
- 635भक्ति पदारथ तब मिलै, जब गुरु होय सहाय।
- 636भक्ति भेष बहु अंतरा, जैसे धरनि अकाश।
- 637कबीर गुरु की भक्ति करूँ, तज निषय रस चोंज।
- 638भक्ति दुवारा साँकरा, राई दशवें भाय।
- 639भक्ति बिना नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय।
- 640भक्ति नसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब धाय।
- 641गुरु भक्ति अति कठिन है, ज्यों खाँड़े की धार।
- 642भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव।
- 643कबीर गुरु की भक्ति का, मन में बहुत हुलास।
- 644कबीर गुरु की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार।
- 645जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चितलाय।
- 646देखा देखी भक्ति का, कबहुँ न चढ़ सी रंग।
- 647आरत है गुरु भक्ति करूँ, सब कारज सिध होय।
- 648पेटे में भक्ति करै, ताका नाम सपूत।
- 649निष्पक्षा की भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान।
- 650तिमिर गया रवि देखते, कुमति गयी गुरु ज्ञान।
- 651खेत बिगारेउ खरतुआ, सभा बिगारी कूर।
- 652ज्ञान सपूरण न भिदा, हिरदा नाहिं जुड़ाय।
- 653भक्ति पंथ बहुत कठिन है, रती न चालै खोट।
- 654भक्तन की यह रीति है, बंधे करे जो भाव।
- 655भक्ति महल बहु ऊँच है, दूरिह ते दरशाय।
- 656और कर्म सब कर्म है, भक्ति कर्म निहकर्म।
- 657विषय त्याग बैराग है, समता कहिये ज्ञान।
- 658भक्ति निसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब आय।
- 659भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने मेव।
- 703कुल खोये कुल ऊबरै, कुल राखे कुल जाय।
- 705दुनिया सेती दोसती, मुआ होत भजन में भंग।
- 724भय से भक्ति करै सबै, भय से पूजा होय।
सत्संग और संगति 68
- 052हंसा मोती चुगत था, कुच्छ थार भराय।
- 103सोना, सज्जन, साधुजन, टूट जुड़ै सौ बार।
- 117कबीर जात पुकारया, चढ़ चंदन की डार।
- 134हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप।
- 139कबीरा संगति साधु की, जौ की भूसी खाय।
- 141कबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय।
- 142कबीरा संगति साधु की, जित प्रीत कीजै जाय।
- 143कबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी न होय।
- 147कबीरा मन पँछी भया, भये ते बाहर जाय।
- 175बंधे को बँधा मिले, छूटे कौन उपाय।
- 180भज दीना कहूँ और ही, तन साधु न के संग।
- 186राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
- 187संगति सों सुख्या ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय।
- 250बुगली नीर बिटालिया, सायर चढ़या कलंक।
- 271जानि बूझि साँचहि तजें, करै झूठ सूँ नेहु।
- 274कबीरा खाई कोट कि, पानी पिवै न कोई।
- 276मूरख संग न कीजिये, लोहा जलि न तिराइ।
- 281कागद केरी नाव री, पाणी केरी गंग।
- 300सिंहों के लेहँड नहीं, हंसों की नहीं पाँत।
- 340पदारथ पेलि करि, कंकर लीया हाथि।
- 341निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटि छबाय।
- 440कबीर चंदर के भिरै, नीम भी चंदन होय।
- 445कबीर लहरि समुंद्र की, मोती बिखरे आय।
- 446साकट कहा न कहि चलै, सुनहा कहा न खाय।
- 448कबीर साकट की सभा, तू मति बैठे जाय।
- 449संगत सोई बिगुर्चई, जो है साकट साथ।
- 450साकट संग न बैठिये, करन कुबेर समान।
- 452साकट सूकर कीकरा, तीनों की गति एक है।
- 456घर में साकट स्त्री, आप कहावे दास।
- 490साधुन की झुपड़ी भली, न साकट के गाँव।
- 492जा सुख को मुनिवर रटें, सुर नर करें विलाप।
- 536संगत कीजै साधु की, कभी न निष्फल होय।
- 540आसन तो इकांत करें, कामिनी संगत दूर।
- 576एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
- 577कबिरा संगति साधु की, जो करि जाने कोय।
- 578साधुन के सतसंग से, थर-थर काँपे देह।
- 579साखी शब्द बहुतै सुना, मिटा न मन का दाग।
- 580साध संग अंतर पड़े, यह मति कबहु न होय।
- 581गिरिये परबत सिखर ते, परिये धरिन मंझार।
- 582संत कबीर गुरु के देश में, बसि जावै जो कोय।
- 583भुवंगम बास न बेधई, चंदन दोष न लाय।
- 584तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल।
- 585काचा सेती मति मिलै, पाका सेती बान।
- 586कोयला भी हो ऊजला, जरि बरि है जो सेव।
- 587मूरख को समुझावते, ज्ञान गाँठि का जाय।
- 588ज्ञानी को ज्ञानी मिलै, रस की लूटम लूट।
- 589साखी शब्द बहुतक सुना, मिटा न मन क मोह।
- 590ब्राह्मण केरी बेटिया, मांस शराब न खाय।
- 591जीवन जीवन रात मद, अविचल रहै न कोय।
- 592दाग जु लागा नील का, सौ मन साबुन धोय।
- 593जो छोड़े तो आँधरा, खाये तो मरि जाय।
- 594प्रीति कर सुख लेने को, सो सुख गया हिराय।
- 595कबीर विषधर बहु मिले, मणिधर मिला न कोय।
- 596सज्जन सों सज्जन मिले, होवे दो दो बात।
- 597तरुवर जड़ से काटिया, जबै सम्हारो जहाज।
- 598मैं सोचों हित जानिके, कठिन भयो है काठ।
- 599लकड़ी जल डूबै नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
- 600साधू संगत परिहरै, करै विषय का संग।
- 601संगति ऐसी कीजिये, सरसा नर सो संग।
- 602तेल तिली सौ ऊपजै, सदा तेल को तेल।
- 603साधु संग गुरु भक्ति अरु, बढ़त बढ़त बढ़ि जाय।
- 604संगत कीजै साधु की, होवे दिन-दिन हेत।
- 605चर्चा करूँ तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय।
- 606संत सुरसरी गंगा जल, आनि पखारा अंग।
- 679ढोल दमामा दुरबरी, सहनाई संग भेरि।
- 712कुल करनी के कारने, हंसा गया बिगोय।
- 719दीन गवाँयो दूनि संग, दुनी न चली साथ।
- 739कबीर काया पाहुनी, हंस बटाऊ माहिं।
साधु के लक्षण 99
- 016शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
- 046हद चाले सो मानव, बेहद चले सो साध।
- 058साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
- 068छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार।
- 072नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय।
- 079फूटी आँख विवेक की, लखे न संत असंत।
- 088संत ही में सत बाँटिए, रोटी में ते टूक।
- 092सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह।
- 097कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा।
- 109ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय।
- 125संत पुरुष की आरसी, संतों की ही देह।
- 133साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध।
- 158गाँठि न थामहिं बाँधही, नहिं नारी सो नेह।
- 193ऋद्धि सिद्धि माँगो नहीं, माँगो तुम पै येह।
- 234ब्राह्मण गुरु जगत् का, साधू का गुरु नाहिं।
- 277हरिजन सेती रूसणा, संसारी सूँ हेत।
- 296स्वाँग पहिरि सो रहा भया, खाया-पीया खूंदि।
- 301निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह।
- 307हैवर गैवर सघन धन, छत्रपती की नारि।
- 318संत न बाँधै गाठड़ी, पेट समाता-तेइ।
- 331कबीर चेरा संत का, दासनि का परदास।
- 345खूंदन तौ धरती सहै, बाढ़ सहै बनराइ।
- 441पशुआ सों पालो परो, रहू-रहू हिया न खीज।
- 457आँखों देखा घी भला, न मुख मेला तेल।
- 458कबीर दर्शन साधु का, बड़े भाग दरशाय।
- 459कबीर सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय।
- 460कबीर दर्शन साधु के, करत न कीजै कानि।
- 461कई बार नाहिं कर सके, दोय बखत करि लेय।
- 462दूजे दिन नहिं करि सके, तीजे दिन करू जाय।
- 463तीजे चौथे नहिं करे, बार-बार करू जाय।
- 464दोय बखत नहिं करि सके, दिन में करूँ इक बार।
- 466पाख-पाख नहिं करि सकै, मास मास करू जाय।
- 467बरस-बरस नाहिं करि सकै, ताको लागे दोष।
- 469मास-मास नहिं करि सकै, उठे मास अलबत्त।
- 470मात-पिता सुत इस्तरी, आलस्य बंधू कानि।
- 471साधु चलत रो दीजिये, कीजै अति सनमान।
- 472इन अटकाया न रुके, साधु दरश को जाय।
- 473खाली साधु न बिदा करूँ, सुन लीजै सब कोय।
- 474सुनिये पार जो पाइया, छाजन भोजन आनि।
- 475कबीर दरशन साधु के, खाली हाथ न जाय।
- 476टूका माही टूक दे, चीर माहि सो चीर।
- 477कबीर लोंग-इलायची, दातुन, माटी पानि।
- 478साधु आवत देखिकर, हँसी हमारी देह।
- 479साधु शब्द समुद्र है, जामें रत्न भराय।
- 480साधु आया पाहुना, माँगे चार रतन।
- 481साधु आवत देखिके, मन में करै भरोर।
- 483साधु बिरछ सतज्ञान फल, शीतल शब्द विचार।
- 484साधु बड़े परमारथी, शीतल जिनके अंग।
- 485आवत साधु न हरखिया, जात न दीया रोय।
- 486छाजन भोजन प्रीति सो, दीजै साधु बुलाय।
- 487सरवर तरवर संत जन, चौथा बरसे मेह।
- 488बिरछा कबहुँ न फल भखै, नदी न अंचय नीर।
- 489सुख देवै दुख को हरे, दूर करे अपराध।
- 491कह अकाश को फेर है, कह धरती को तोल।
- 493साधु सिद्ध बहु अंतरा, साधु मता परचंड।
- 494आशा वासा संत का, ब्रह्मा लखै न वेद।
- 495कोटि-कोटि तीरथ करै, कोटि कोटि करु धाय।
- 496वेद थके, ब्रह्मा थके, याके सेस महेस।
- 497संत मिले जानि बीछुरों, बिछुरों यह मम प्रान।
- 498साधु ऐसा चाहिए, दुखै दुखावै नाहिं।
- 499साधु कहावन कठिन है, ज्यों खाँड़े की धार।
- 500साधु कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर।
- 501साधु चाल जु चालई, साधु की चाल।
- 502साधु सोई जानिये, चलै साधु की चाल।
- 503साधु भौरा जग कली, निशि दिन फिरै उदास।
- 504साधू जन सब में रमें, दुख न काहू देहि।
- 505साधु सती और सूरमा, राखा रहै न ओट।
- 506साधु-साधु सब एक है, जस अफीम का खेत।
- 507साधु सती औ सिंह को, ज्यों ले घन त्यों शोभ।
- 508साधु तो हीरा भया, न फूटै धन खाय।
- 511दुख-सुख एक समान है, हरष शोक नहिं व्याप।
- 515मानपमान न चित धरै, औरन को सनमान।
- 517जौन चाल संसार की, जौ साधु को नाहिं।
- 519शीलवंत दृढ़ ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
- 520कोई आवै भाव ले, कोई अभाव लै आव।
- 521संत न छाड़ै संतता, कोटिक मिलै असंत।
- 522कमल पत्र हैं साधुजन, बसें जगत के माहिं।
- 523बहता पानी निरमला, बंदा गंदा होय।
- 524बँधा पानी निरमला, जो टूक गहिरा होय।
- 525एक छाड़ि पय को गहें, ज्यों रे गऊ का बच्छ।
- 526जौन भाव उपर रहै, भितर बसावै सोय।
- 527उड़गण और सुधाकरा, बसत नीर के संग।
- 528तन में शीतल शब्द है, बोले वचन रसाल।
- 529तूटै बरत आकाश सों, कौन सकत है झेल।
- 530ढोल दमामा गड़झड़ी, सहनाई और तूर।
- 532जुवा चोरी मुखबिरी, ब्याज बिरानी नारि।
- 533कबीर मेरा कोइ नहीं, हम काहू के नाहिं।
- 534संत समागम परम सुख, जान अल्प सुख और।
- 535संत मिले सुख ऊपजै, दुष्ट मिले दुख होय।
- 541यह कलियुग आयो अबै, साधु न जाने कोय।
- 543साधु दरशन महाफल, कोटि यज्ञ फल लेह।
- 544साधु दरश को जाइये, जेता धरिये पाँय।
- 545संत मता गजराज का, चालै बंधन छोड़।
- 546आज काल दिन पाँच में, बरस पाँच जुग पंच।
- 547साधु ऐसा चाहिए, जहाँ रहै तहँ गैब।
- 548संत होत हैं हेत के, हेतु तहाँ चलि जाय।
- 549हेत बिना आवै नहीं, हेत तहाँ चलि जाय।
- 550साधु ऐसा चाहिए, जाका पूरा मंग।
- 551संत सेव गुरु बंदगी, गुरु सुमिरन वैराग।
पाखंड और आडंबर 29
- 003माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
- 006कबीरा माला मनहि की, और संसारी भीख।
- 043कबीरा जपना काठ की, क्या दिखलावे मोय।
- 069ज्यों तिल माहीं तेल है, ज्यों चकमक में आग।
- 121साईं आगे साँच है, साईं साँच सुहाय।
- 128प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय।
- 170न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय।
- 173पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहार।
- 178मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय।
- 258काजी-मुल्ला भ्रमिया, चल्या युनीं कै साथ।
- 263तीरथ तो सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाय।
- 264जप-तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत बेसास।
- 265जेती देखौ आत्म, तेता सालिगराम।
- 266कबीर दुनिया देहुरै, सीत नवावन गंग जाइ।
- 269उज्ज्वल देखि न धीजिये, बग ज्यूँ माडै ध्यान।
- 292माला पहिरै मनभुषी, ता थै कछू न होइ।
- 295बैसनो भया तौ क्या भया, बूझा नहीं बबेक।
- 298एष ले बूढ़ी पथमी, झूठे कुल की लार।
- 438झिरमिर झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेह।
- 552चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावै हंस।
- 553बाना पहिरे सिंह का, चलै भेड़ की चाल।
- 554साधु भया तो क्या भया, माला पहिरी चार।
- 558पाँच सात सुमता भरी, गुरु सेवा चित लाय।
- 559गुरु के सनमुख जो रहै, सहै कसौटी दुख।
- 560मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग।
- 561भेष देख मत भूलिये, बूझि लीजिये ज्ञान।
- 562कवि तो कोटि-कोटि हैं, सिर के मुड़े कोट।
- 564फाली फूली गाडरी, ओढ़ि सिंह की खाल।
- 565धारा तो दोनों भली, बिरही के बैराग।
माया और मोह 20
- 017माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
- 027माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय।
- 114यह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो।
- 144को छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय।
- 179माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश।
- 215पूत पियारौ पिता कों, गौहनि लागो घाइ।
- 227परनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि।
- 235कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ।
- 245तृष्णा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ।
- 246कबीर सो धन संचिये, जो आगे कू होइ।
- 248कबीर माया पापरगी, फंध ले बैठी हाटि।
- 251कबीर इस संसार का, झूठा माया मोह।
- 252माया तजी तौ क्या भया, मानि तजि नहीं जाइ।
- 275माषी गुड़ में गड़ि रही, पंख रही लपटाई।
- 338कोई एक राखै साबधाँ, चेतनि पहरै जागि।
- 539आशा तजि माया तजै, मोह तजै अरु मान।
- 563बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम।
- 737क्या करिये क्या जोड़िये, तोड़े जीवन काज।
- 740जो तू परा है फंद में, निकसेगा कब अंध।
- 743मन मुवा माया मुई, संशय मुवा शरीर।
काल और मृत्यु 121
- 019रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय।
- 022दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारंबार।
- 025माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
- 033दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन।
- 045बँधे मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार।
- 051समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय।
- 091काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय।
- 118लोग भरोसे कौन के, बैठे रहें उरगाय।
- 123खेत ना छोड़े सूरमा, जूझे दो दल मोह।
- 131केतन दिन ऐसे गए, अन रूचे का नेह।
- 149कहे कबीर देय तू, जब तक तेरी देह।
- 156कबीर यह जग कुछ नहीं, खिन खारा खिन मीठ।
- 161चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
- 166झूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद।
- 172पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।
- 174पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय।
- 182माली आवत देख के, कलियन करी पुकार।
- 190लकड़ी कहै लुहार की, तू मति जारे मोहि।
- 238तीरथ करि-करि जग मुवा, डूंधै पाणी न्हाइ।
- 284एक दिन ऐसा होएगा, सब सूँ पड़े बिछोइ।
- 285कबीर नौबत आपणी, दिन-दस लेहू बजाइ।
- 323कबीर घोड़ा प्रेम का, चेतनि चाढ़ि असवार।
- 328जीवन थैं मरिबो भलौ, जो मरि जानै कोइ।
- 339बारी-बारी आपणी, चले पियारे म्यंत।
- 349सुरति करौ मेरे साइयाँ, हम हैं भोजन माँहि।
- 482साधु मिलै यह सब हलै, काल जाल जम चोट।
- 531आज काल के लोग हैं, मिलि कै बिछुरी जाहिं।
- 664कबीर मंदिर लाख का, जड़िया हीरा लाल।
- 665कबीर धूल सकेलि के, पुड़ी जो बाँधी येह।
- 666कबीर थोड़ा जीवना, माढ़ै बहुत मढ़ान।
- 667कबीर नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय।
- 669कबीर जो दिन आज है, सो दिन नहीं काल।
- 670कबीर खेत किसान का, मिरगन खाया झारि।
- 671कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल।
- 672कबीर सपने रैन के, ऊधरी आये नैन।
- 673कबीर जंत्र न बाजई, टूटि गये सब तार।
- 674कबीर रसरी पाँव में, कहँ सोवै सुख-चैन।
- 675कबीर नाव तो झाँझरी, भरी बिराने भाए।
- 676कबीर पाँच पखेरूआ, राखा पोष लगाय।
- 677कबीर बेड़ा जरजरा, कूड़ा खेनहार।
- 678एक दिन ऐसा होयगा, सबसों परै बिछोह।
- 680मरेंगे मरि जायँगे, कोई न लेगा नाम।
- 681कबीर पानी हौज की, देखत गया बिलाय।
- 682कबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजदीक।
- 684हाड़ जरै जस लाकड़ी, केस जरै ज्यों घास।
- 685आज काल के बीच में, जंगल होगा वास।
- 686ऊजड़ खेड़े टेकरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार।
- 687पाव पलक की सुधि नहीं, करै काल का साज।
- 689आज कहै मैं कल भजूँ, काल फिर काल।
- 690कहा चुनावै मेड़िया, चूना माटी लाय।
- 691सातों शब्द जु बाजते, घर-घर होते राग।
- 692ऊँचा महल चुनाइया, सुबरदन कली ढुलाय।
- 694ऊँचा दीसे धौहरा, भागे चीती पोल।
- 695पाव पलक तो दूर है, मो पै कहा न जाय।
- 697हाड़ जले लकड़ी जले, जले जलवान हार।
- 699पाँच तत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम।
- 700कहा चुनावै मेड़िया, लम्बी भीत उसारि।
- 701यह तन काँचा कुंभ है, लिया फिरै थे साथ।
- 702जनमै मरन विचार के, कूरे काम निवारि।
- 704दुनिया के धोखे मुआ, चला कुटुम की कानि।
- 708जंगल ढेरी राख की, उपरि उपरि हरियाय।
- 710महलन माही पौढ़ते, परिमल अंग लगाय।
- 711कुल करनी के कारने, ढिग ही रहिगो राम।
- 713मैं मेरी तू जानि करै, मेरी मूल बिनास।
- 714ज्यों कोरी रेजा बुनै, नीरा आवै छोर।
- 715इत पर धर उत है धरा, बनिजन आये हाथ।
- 716जिसको रहना उत घरा, सो क्यों जोड़े मित्र।
- 718मैं भौंरो तोहि बरजिया, बन बन बास न लेय।
- 720तू मति जानै बावरे, मेरा है यह कोय।
- 726काल चक्र चक्की चलै, बहुत दिवस औ रात।
- 727एक दिन ऐसा होयगा, कोय काहु का नाहिं।
- 731चले गये सो ना मिले, किसको पूछूँ जात।
- 733हे मतिहीनी माछरी, राखि न सकी शरीर।
- 734मछरी यह छोड़ी नहीं, धीमर तेरो काल।
- 735परदा रहती पदुमिनी, करती कुल की कान।
- 736जागो लोगों मत सुवो, ना करूँ नींद से प्यार।
- 738जिन घर नौबत बाजती, होत छतीसों राग।
- 742नर नारायन रूप है, तू मति समझे देह।
- 744मरूँ-मरूँ सब कोइ कहै, मेरी मरै बलाय।
- 745एक बूँद के कारने, रोता सब संसार।
- 748मूरख शब्द न मानई, धर्म न सुनै विचार।
- 749चेत सवेरे बाचरे, फिर पाछे पछिताय।
- 750क्यों खोवे नरतन वृथा, परि विषयन के साथ।
- 751आँखि न देखे बावरा, शब्द सुनै नहिं कान।
- 752ज्ञानी होय सो मानही, बूझै शब्द हमार।
- 753जोबन मिकदारी तजी, चली निशान बजाय।
- 754कबीर टुक-टुक चोंगता, पल-पल गयी बिहाय।
- 755काल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय।
- 756निश्चय काल गरासही, बहुत कहा समुझाय।
- 757जो उगै तो आथवै, फूलै सो कुम्हिलाय।
- 758कुशल-कुशल जो पूछता, जग में रहा न कोय।
- 759जरा श्वान जोबन ससा, काल अहेरी नित्त।
- 760बिरिया बीती बल घटा, केश पलटि भये और।
- 761यह जीव आया दूर ते, जाना है बहु दूर।
- 762कबीर गाफिल क्यों फिरै, क्या सोता घनघोर।
- 763कबीर पगरा दूर है, बीच पड़ी है रात।
- 764कबीर मंदिर आपने, नित उठि करता आल।
- 765धरती करते एक पग, समुंद्र करते फाल।
- 766आस पास जोधा खड़े, सबै बजावै गाल।
- 767चहुँ दिसि पाका कोट था, मंदिर नगर मझार। खिरकी खिरकी पाहरू, गज बंदा दरबार॥
- 768हम जाने थे खायेंगे, बहुत जिमि बहु माल।
- 769काची काया मन अथिर, थिर थिर कर्म करंत।
- 771संसै काल शरीर में, विषम काल है दूर।
- 772बालपना भोले गया, और जुवा महमंत।
- 773बेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावै थाल।
- 774ताजी छूटा शहर ते, कसबे पड़ी पुकार।
- 775खुलि खेलो संसार में, बाँधि न सक्कै कोय।
- 777संसै काल शरीर में, जारि करै सब धूरि।
- 778ऐसे साँच न मानई, तिलकी देखो जाय।
- 779जारि बारि मिस्सी करे, मिस्सी करि है छार।
- 780काल पाय जब ऊपजो, काल पाय सब जाय।
- 781पात झरंता देखि के, हँसती कूपलियाँ।
- 782फागुन आवत देखि के, मन झूरे बनराय।
- 783मूस्या डरपें काल सों, कठिन काल को जोर।
- 784सब जग डरपै काल सों, ब्रह्मा, विष्णु महेश।
- 785कबीरा पगरा दूरि है, आय पहुँची साँझ।
- 786जाय झरोखे सोवता, फूलन सेज बिछाय।
- 787काल फिरे सिर ऊपरै, हाथों धरी कमान।
- 788काल काल सब कोई कहै, काल न चीन्है कोय।
- 789काल काम तत्काल है, बुरा न कीजै कोय।
- 790काल काम तत्काल है, बुरा न कीजै कोय।
अहंकार और गर्व 32
- 002तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय।
- 018माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
- 026जहाँ आपा तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग।
- 037जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय।
- 040अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक होय।
- 044पतिव्रता मैली भली, काली कुचल कुरूप।
- 082जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं।
- 086ऊँचे पानी न टिके, नीचे ही ठहराय।
- 087सब ते लघुताई भली, लघुता ते सब होय।
- 119एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गार।
- 140कबीरा गरब न कीजिए, कबहूँ न हँसिये कोय।
- 177बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
- 200तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूँ।
- 249कबीर जग की जो कहै, भौ जलि बूड़ै दास।
- 253करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तुंड।
- 288कबीर कहा गरबियौ, काल कहै कर केस।
- 291मैं-मैं बड़ी बलाइ है, सकै तो निकसौ भाजि।
- 327आपा भेटियाँ हरि मिलै, हरि मेल्या सब जाइ।
- 330रोड़ा है रहो बाट का, तजि पाषंड अभिमान।
- 537मान नहीं अपमान नहीं, ऐसे शीतल संत।
- 620ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सो हेत।
- 660कबीर गर्ब न कीजिये, चाम लपेटी हाड़।
- 661कबीर गर्ब न कीजिये, ऊँचा देखि अवास।
- 662कबीर गर्ब न कीजिये, इस जीवन की आस।
- 663कबीर गर्ब न कीजिये, काल गहे कर केस।
- 668कबीर गर्ब न कीजिये, जाम लपेटी हाड़।
- 698पकी हुई खेती देखि के, गरब किया किसान।
- 709मलमल खासा पहिनते, खाते नागर पान।
- 741अहिरन की चोरी करै, करै सुई का दान।
- 746समुझाये समुझे नहीं, धरे बहुत अभिमान।
- 747राज पाट धन पायके, क्यों करता अभिमान।
- 770हाथी परबत फाड़ते, समुंदर छूट भराय।
प्रेम और विरह 23
- 038मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न कोय।
- 059लगी लगन छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय।
- 064प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
- 065प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय।
- 083छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय।
- 106आग जो लागी समुद्र में, धुआँ न प्रकट होय।
- 163जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान।
- 183ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
- 189साँझ पड़े दिन बीतबै, चकवी दीन्ही रोय।
- 202कबीरा प्रेम न चषिया, चषि न लिया साव।
- 205बिरह-भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
- 210सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त।
- 211जो रोऊँ तो बल घटै, हँसों तो राम रिसाइ।
- 212कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त।
- 214परबति परबति मैं फिरया, नैन गंवाए रोइ।
- 217जा कारणि मैं ढूँढ़ती, सनमुख मिलिया आइ।
- 244कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई।
- 259प्रेम-प्रीति का चालना, पहिरि कबीरा नाच।
- 304राम वियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्हे कोई।
- 317मानि महतम प्रेम-रस, गरवातण गुण नेह।
- 342गोव्यंद के गुण बहुत हैं, लिखै जु हिरदै माहिं।
- 706यह तन काँचा कुंभ है, यहीं लिया रहिवास।
- 725भय बिन भाव न ऊपजै, भय बिन होय न प्रीति।
वाणी और व्यवहार 12
- 021जो तोकू काँटा बुवे, ताहि बोय तू फूल।
- 030गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच।
- 034ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
- 036कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार।
- 048जाके जिह्वा बंधन नहीं, हृदय में नहीं साँच।
- 077बानी से पहचानिये, साम चोर की घात।
- 136आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक।
- 153कागा काको धन हरे, कोयल काको देय।
- 270जेता मीठा बोलणा, तेता साधन जारिंग।
- 351सब काहू का लीजिये, साचाँ सबद निहार।
- 443साकट का मुख बिंब है, निकसत बचन भुवंग।
- 730खलक मिला खाली हुआ, बहुत किया बकवाद।
ज्ञान और विवेक 27
- 010जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
- 035हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट।
- 053कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय।
- 054वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल।
- 055कलि खोटा जग आँधरा, शब्द न माने कोय।
- 070जा कारण जग ढूँढ़िया, सो तो घट ही माँहि।
- 080दाया भाव हृदय नहीं, ज्ञान थके बेहद।
- 099जहँ ग्राहक तहँ मैं नहीं, जहाँ मैं ग्राहक नाहिं।
- 101तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर।
- 112जो जन भीगे रामरस, बिगत कबहूँ ना रूख।
- 115जहर की जमीं में है रोपा, अभी सींचे सौ बार।
- 124लीक पुरानी को तजें, कायर कुटिल कपूत।
- 132एक ते अनंत अंत एक हो जाय।
- 151कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढ़े बन माँहि।
- 160घी के तो दर्शन भले, खाना भला न तेल।
- 171पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
- 192ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार।
- 239चतुराई सूवै पढ़ी, सोइ पंजर माहिं।
- 346नीर पियावत क्या फिरै, सायर घर-घर बारि।
- 348हीरा परा बजार में, रहा छार लिपटाइ।
- 372पंडित पढ़ि गुनि पचि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान।
- 439कबीर हृदय कठोर के, शब्द न लागे सार।
- 509साधू-साधू सबही बड़े, अपनी-अपनी ठौर।
- 513साधु ऐसा चाहिए, जाके ज्ञान विवेक।
- 556शब्द विचारे पथ चलै, ज्ञान गली दे पाँव।
- 798हस्ती चढ़िये ज्ञान की, सहज दुलीचा डार।
- 804जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।
दया और परोपकार 13
- 011जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप।
- 031दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
- 032दान दिए धन ना घटे, नदी न घटे नीर।
- 081दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय।
- 126भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग।
- 194क्षमा बड़ेन को उचित है, छोटे को उत्पात।
- 312दुखिया भूखा दुख कों, सुखिया सुख कों झूरि।
- 329कबीर मन मृतक भया, दुर्बल भया सरीर।
- 512सदा कृपालु दुःख परिहरन, बैर भाव नहिं दोय।
- 514सावधान और शीलता, सदा प्रफुल्लित गात।
- 538दया गरीबी बंदगी, समता शील सुभाव।
- 621दया और धरम का ध्वजा, धीरजवान प्रमान।
- 795देह खेह खोय जायगी, कौन कहेगा देह।
मन और संयम 38
- 028आया था किस काम को, तू सोया चादर तान।
- 041बाजीगर का बाँदरा, ऐसा जीव मन के साथ।
- 042अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट।
- 063मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार।
- 073आहार करे मन भावता, इंद्री किए स्वाद।
- 085कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।
- 094फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम।
- 098तन बोहित मन काग है, लख योजन उड़ जाय।
- 108कबीरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय।
- 135आशा का ईंधन करो, मनशा करो बभूत।
- 155कबीरा मनहि गयंद है, अंकुश दै-दै राखि।
- 159चंदन जैसा साधु है, सर्पहि सम संसार।
- 169तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय।
- 203कबीरा राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ।
- 216हाँसी खेलों हरि मिलै, कौण सहै षरसान।
- 225कामी अभी न भावई, विष ही कों ले सोधि।
- 229ज्ञानी मूल गवाइयाँ, आपण भये करना।
- 230कामी लज्जा ना करै, न माहें अहिलाद।
- 240कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूँ मैं भ्रम।
- 256पद गाएं मन हरषिया, साषी कह्यां अनंद।
- 267मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि।
- 279पाणी ही तै पातला, धुवाँ ही तै झीण।
- 280कबीर मारू मन कूँ, टूक-टूक है जाइ।
- 282मैं मंता मन मारि रे, घट ही माहें घेरि।
- 283मनह मनोरथ छाँड़िये, तेरा किया न होइ।
- 293कैसो कहा बिगाड़िया, जो मुंडै सौ बार।
- 303काम मिलावे राम कूं, जे कोई जाणै राखि।
- 319कबीर संसा कोउ नहीं, हरि सूं लाग्गा हेत।
- 320कबीर सोई सूरिमा, मन सूँ माँडै झूझ।
- 332अबरन कों का बरनिये, भोपै लख्या न जाइ।
- 518इंद्रिय मन निग्रह करन, हिरदा कोमल होय।
- 696मौत बिसारी बाहिरा, अचरज कीया कौन।
- 717मेरा संगी कोई नहीं, सबै स्वारथी लोय।
- 721या मन गहि जो थिर रहै, गहरी धूनी गाड़ि।
- 722तन सराय मन पाहरू, मनसा उतरी आय।
- 729यह बिरियाँ तो फिर नहीं, मन में देख विचार।
- 732विषय वासना उरझिकर, जनम गवाँय जाद।
- 801बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
संतोष और त्याग 19
- 008साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय।
- 023आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।
- 107साधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय।
- 120जो तू चाहे मुक्ति को, छोड़े दे सब आस।
- 261खूब खाँड है खीचड़ी, माहि पड्याँ टुक लून।
- 337बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार।
- 510सदा रहे संतोष में, धरम आप दृढ़ धार।
- 567उदर समाता माँगि ले, ताको नाहिं दोष।
- 568अजहूँ तेरा सब मिटें, जो मानै गुरु सीख।
- 569माँगन गै सो भर रहै, भरे जु माँगन जाहिं।
- 570माँगन-मरण समान है, तोहि दई मैं सीख।
- 571उदर समाता अन्न ले, तनहि समाता चीर।
- 572आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह।
- 573सहत मिलै सो दूध है, माँगि मिलै सा पानि।
- 574अनमाँगा उत्तम कहा, मध्यम माँगि जो लेय।
- 575अनमाँगा तो अति भला, माँगि लिया नहिं दोष।
- 792खाय-पकाय लुटाय के, करि ले अपना काम।
- 793खाय-पकाय लुटाय के, यह मनुवा मिजमान।
- 794गाँठि होय सो हाथ कर, हाथ होय सी देह।
उपदेश और चेतावनी 50
- 012धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
- 024काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
- 057जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय।
- 076दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गरजी।
- 089मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहिं दोष।
- 095तेरा साईं तुझमें, ज्यों पहुपन में बास।
- 100कहता तो बहुत मिला, गहता मिला न कोय।
- 102आस पराई राखता, खाया घर का खेत।
- 105बलिहारी वा दूध की, जामें निकसे घीव।
- 111सब आए इस एक में, डाल-पात फल-फूल।
- 113सिंह अकेला बन रहे, पलक-पलक कर दौर।
- 116जो जाने जीव न आपना, करहीं जीव का सार।
- 130साईं ते सब होते हैं, बंदे से कुछ नाहिं।
- 138उत ते कोई न आवई, पासू पूछूँ धाय।
- 145काल करे सो आज कर, सबहि सात तुव साथ।
- 146कहा किया हम आय कर, कहा करेंगे पाय।
- 148कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर।
- 150करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय।
- 157कबीरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय।
- 164ज्यों नैनन में पूतली, त्यों मालिक घर माँहि।
- 165जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप।
- 176बूँद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय।
- 184या दुनियाँ में आ कर, छाँड़ि देय तू ऐंठ।
- 188साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय।
- 191हरिया जाने रूखड़ा, जो पानी का गेह।
- 213सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे।
- 218पहुँचेंगे तब कहैंगें, उमड़ैंगे उस ठाईं।
- 221कबीर एक न जान्यां, तो बहु जान्यां क्या होइ।
- 224कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो भीत।
- 228परनारी राता फिरैं, चोरी बिढ़ता खाहिं।
- 237कबीर इस संसार कौ, समझाऊँ कै बार।
- 257जैसी मुख तै नीकसै, तैसी चाले चाल।
- 262साईं सेती चोरियाँ, चोरा सेती गुझ।
- 272कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तू बसै।
- 287बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िया खाया खेत।
- 306फाटै दीदै मैं फिरों, नजिर न आवै कोई।
- 313कबीर दुबिधा दूरि करि, एक अंग है लागि।
- 315रचनाहार कूं चीन्हि लै, खैबे कूं कहा रोइ।
- 322अब तौ जूझ्या ही बणै, मुडि चल्याँ घर दूर।
- 326जेते तारे रैणि के, तेतै बैरी मुझ।
- 333जिसहि न कोई विसहि तू, जिस तू तिस सब कोई।
- 334साईँ मेरा वाणियाँ, सहित करै व्यौपार।
- 335झल बावै झल दाहिनै, झलहि माहि त्योहार।
- 343जो ऊग्या सो आंथवै, फूल्या सो कुमिलाइ।
- 344सीतलता तब जाणियें, समिता रहै समाइ।
- 347कबीर सिरजन हार बिन, मेरा हित न कोइ।
- 350क्या मुख लै बिनती करों, लाज आवत है मोहि।
- 791लेना है सो जल्द ले, कही सुनी मान।
- 796देह धरे का गुन यही, देह देह कछु देह।
- 800कबीर यह तन जात है, सको तो राखु बहोर।