हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार।
मैमंता घूमत रहै, नाहिं तन की सार॥
हरि-रस पीना तभी माना जाए जब उसका नशा कभी न उतरे। पीने वाला मतवाला होकर घूमता रहता है और उसे अपने शरीर तक की सुध नहीं रहती।
भक्ति और नाम-स्मरण