आज का दोहा › सत्संग और संगति

सत्संग और संगति पर कबीर के दोहे

68 दोहे · अर्थ सहित

052

हंसा मोती चुगत था, कुच्छ थार भराय।
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय॥

हंस मोती चुगता है और थाल भरता जाता है। पर जो व्यक्ति मार्ग ही नहीं जानता, उससे कोई क्या करा सकता है? पात्रता के बिना अवसर भी व्यर्थ हो जाता है।

सत्संग और संगति
103

सोना, सज्जन, साधुजन, टूट जुड़ै सौ बार।
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एके धका दरार॥

सोना, सज्जन और साधु—ये सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं। पर दुर्जन कुम्हार के कच्चे घड़े जैसा है, एक ही धक्के में दरक जाता है और फिर नहीं जुड़ता।

सत्संग और संगति
117

कबीर जात पुकारया, चढ़ चंदन की डार।
बाट लगाए ना लगे, फिर क्या लेत हमार॥

कबीर चंदन की डाल पर चढ़कर पुकार-पुकारकर मार्ग बताते रहे। जो फिर भी राह पर नहीं आया, उसका उपदेशक क्या ले लेगा? सुनना और अपनाना सुनने वाले पर निर्भर है।

सत्संग और संगति
134

हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप।
निशिवासर सुख निधि, लहा अटल प्रगटा आप॥

हरि की संगति से मन शीतल हो गया और मोह का ताप मिट गया। दिन-रात सुख का भंडार मिल गया और भीतर अटल आत्मस्वरूप स्वयं प्रकट हो गया।

सत्संग और संगति
139

कबीरा संगति साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खाँड़ भोजन मिले, ताकर संग न जाय॥

साधु की संगति में जौ की भूसी भी खानी पड़े तो स्वीकार है, पर कुसंग में खीर और शक्कर का भोजन मिले तो भी वह संग नहीं करना चाहिए। संगति भोजन से बड़ी है।

सत्संग और संगति
141

कबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय।
दुख बासे भागा फिरै, सुख में रहै समाय॥

कलह और व्यर्थ की कल्पनाएँ सत्संग से दूर हो जाती हैं। तब दुःख स्वयं भागता फिरता है और मनुष्य सुख में समाया रहता है।

सत्संग और संगति
142

कबीरा संगति साधु की, जित प्रीत कीजै जाय।
दुर्गति दूर बहावति, देवी सुमति बनाय॥

साधु की संगति ऐसी है जहाँ जाकर प्रीति करनी चाहिए। वह दुर्गति को बहा ले जाती है और सद्बुद्धि प्रदान करती है।

सत्संग और संगति
143

कबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी न होय।
होमी चंदन बासना, नीम न कहसी कोय॥

साधु की संगति कभी निष्फल नहीं जाती। चंदन की सुगंध पास आ जाए तो फिर उसे कोई नीम नहीं कहेगा। संग व्यक्ति की पहचान ही बदल देता है।

सत्संग और संगति
147

कबीरा मन पँछी भया, भये ते बाहर जाय।
जो जैसे संगति करै, सो तैसा फल पाय॥

मन पक्षी के समान हो गया है, जहाँ चाहे उड़ जाता है। जो जैसी संगति करेगा, वैसा ही फल पाएगा। मन जिस दिशा में जाता है, जीवन उसी ओर मुड़ जाता है।

सत्संग और संगति
175

बंधे को बँधा मिले, छूटे कौन उपाय।
कर संगति निरबंध की, पल में लेय छुड़ाय॥

बँधे हुए को बँधा ही मिले तो छूटने का उपाय कौन बताएगा? उसकी संगति करो जो स्वयं बंधनमुक्त है—वह पल भर में छुड़ा देगा।

सत्संग और संगति
180

भज दीना कहूँ और ही, तन साधु न के संग।
कहें कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग॥

मन कहीं और लगा है और शरीर साधुओं के संग बैठा है। कबीर कहते हैं—काले कपड़े पर भला रंग कैसे चढ़ेगा? मन के बिना संगति का कोई असर नहीं।

सत्संग और संगति
186

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
जो सुख साधु संग में, सो बैकुंठ न होय॥

राम ने बुलावा भेजा तो कबीर रो पड़े। जो सुख साधुओं की संगति में है, वह बैकुंठ में भी नहीं। सत्संग का आनंद स्वर्ग से भी बड़ा है।

सत्संग और संगति
187

संगति सों सुख्या ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय।
कह कबीर तहँ जाइये, साधु संग जहँ होय॥

अच्छी संगति से सुख उपजता है और बुरी संगति से दुःख। कबीर कहते हैं—वहीं जाना चाहिए जहाँ साधुओं का संग मिले।

सत्संग और संगति
250

बुगली नीर बिटालिया, सायर चढ़या कलंक।
और पखेरू पी गये, हंस न बोवे चंच॥

बगुले ने पानी जूठा कर दिया और सरोवर पर कलंक लग गया। दूसरे पक्षी तो पी गए, पर हंस ने उसमें चोंच तक नहीं डाली। श्रेष्ठ जन दूषित को स्वीकार नहीं करते।

सत्संग और संगति
271

जानि बूझि साँचहि तजें, करै झूठ सूँ नेहु।
ताकि संगति राम जी, सुपिने ही पिनि देहु॥

जो जान-बूझकर सत्य को छोड़ता है और झूठ से प्रेम करता है—हे राम, उसकी संगति मुझे स्वप्न में भी मत देना।

सत्संग और संगति
274

कबीरा खाई कोट कि, पानी पिवै न कोई।
जाइ मिलै जब गंग से, तब गंगोदक होइ॥

किले की खाई का पानी कोई नहीं पीता। पर वही जल जब गंगा से जा मिलता है, तब गंगाजल कहलाने लगता है। संगति ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा बदल देती है।

सत्संग और संगति
276

मूरख संग न कीजिये, लोहा जलि न तिराइ।
कदली-सीप-भुजंग मुख, एक बूंद तिहँ भाइ॥

मूर्ख का संग मत करो, लोहा जल में तैर नहीं सकता। एक ही बूँद केले में कपूर, सीप में मोती और साँप के मुख में विष बन जाती है—पात्र के अनुसार परिणाम बदलता है।

सत्संग और संगति
300

सिंहों के लेहँड नहीं, हंसों की नहीं पाँत।
लालों की नहिं बोरियाँ, साध न चलै जमात॥

सिंहों के झुंड नहीं होते, हंसों की पंक्तियाँ नहीं लगतीं और लालों की बोरियाँ नहीं भरतीं। इसी तरह सच्चे साधु भीड़ में नहीं चलते।

सत्संग और संगति
340

पदारथ पेलि करि, कंकर लीया हाथि।
जोड़ी बिछटी हंस की, पड़्या बगां के साथि॥

अनमोल वस्तु को ठुकराकर हाथ में कंकड़ ले लिया। हंसों की जोड़ी छूट गई और बगुलों के साथ जा पड़े। कुसंग में पड़कर श्रेष्ठ संग खो दिया।

सत्संग और संगति
341

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटि छबाय।
बिन पाणी बिन सबुना, निरमल करै सुभाय॥

निंदा करने वाले को अपने पास ही रखो, आँगन में कुटिया बनवा दो। वह बिना पानी और साबुन के ही तुम्हारे स्वभाव को निर्मल कर देगा।

सत्संग और संगति
440

कबीर चंदर के भिरै, नीम भी चंदन होय।
बूड़्यो बाँस बड़ाइया, यों जनि बूड़ो कोय॥

चंदन के पास रहने से नीम भी चंदन हो जाता है। पर बाँस अपने बड़प्पन के अहंकार में डूब गया—ऐसे कोई मत डूबे।

सत्संग और संगति
445

कबीर लहरि समुंद्र की, मोती बिखरे आय।
बगुला परख न जानई, हंस चुनि-चुनि खाय॥

समुद्र की लहर मोती बिखेर गई। बगुला उन्हें पहचान नहीं पाता, पर हंस चुन-चुनकर ग्रहण कर लेता है। सत्संग का लाभ पारखी ही उठाता है।

सत्संग और संगति
446

साकट कहा न कहि चलै, सुनहा कहा न खाय।
जो कौवा मठ हगि भरै, तो मठ को कहा नशाय॥

नास्तिक क्या नहीं कह डालता और कुत्ता क्या नहीं खा जाता? पर कौआ मठ पर बीट कर दे तो मठ का क्या बिगड़ता है? निंदा से श्रेष्ठता घटती नहीं।

सत्संग और संगति
449

संगत सोई बिगुर्चई, जो है साकट साथ।
कंचन कटोरा छाड़ि के, सनहक लीन्ही हाथ॥

वही संगति बिगाड़ती है जो नास्तिक के साथ हो। ऐसा व्यक्ति सोने का कटोरा छोड़कर हाथ में ठीकरा उठा लेता है।

सत्संग और संगति
450

साकट संग न बैठिये, करन कुबेर समान।
ताके संग न चलिये, पड़ि हैं नरक निदान॥

नास्तिक के साथ मत बैठो, चाहे वह कर्ण और कुबेर के समान दानी और धनी हो। उसके साथ चलने से अंततः नरक ही मिलता है।

सत्संग और संगति
452

साकट सूकर कीकरा, तीनों की गति एक है।
कोटि जतन परमोघिये, तऊ न छाड़े टेक॥

नास्तिक, सूअर और बबूल—तीनों की गति एक जैसी है। करोड़ों यत्न करके समझा लो, फिर भी ये अपना स्वभाव नहीं छोड़ते।

सत्संग और संगति
492

जा सुख को मुनिवर रटें, सुर नर करें विलाप।
जो सुख सहजै पाईया, संतों संगति आप॥

जिस सुख के लिए मुनि रटते रहते हैं और देवता-मनुष्य तरसते हैं, वही सुख संतों की संगति में सहज ही मिल जाता है।

सत्संग और संगति
577

कबिरा संगति साधु की, जो करि जाने कोय।
सकल बिरछ चंदन भये, बाँस न चंदन होय॥

साधु की संगति का मर्म कोई विरला ही जानता है। चंदन के पास सारे वृक्ष चंदन हो गए, पर बाँस अपने अहंकार के कारण चंदन न बन सका।

सत्संग और संगति
578

साधुन के सतसंग से, थर-थर काँपे देह।
कबहुँ भाव कुभाव ते, जनि मिटि जाय सनेह॥

साधुओं के सत्संग में जाते हुए देह थर-थर काँपती है—कहीं किसी कुभाव के कारण वह स्नेह मिट न जाए। यह श्रद्धा की सतर्कता है।

सत्संग और संगति
580

साध संग अंतर पड़े, यह मति कबहु न होय।
कहें कबीर तिहु लोक में, सुखी न देखा कोय॥

साधु-संग में दूरी पड़ जाए, ऐसी बुद्धि कभी न हो। कबीर कहते हैं—तीनों लोकों में उसके बिना कोई सुखी नहीं देखा।

सत्संग और संगति
581

गिरिये परबत सिखर ते, परिये धरिन मंझार।
मूरख मित्र न कीजिये, बूड़ो काली धार॥

पर्वत की चोटी से गिर जाना और धरती पर आ पड़ना स्वीकार है, पर मूर्ख को मित्र मत बनाओ—वह काली धार में डुबो देता है।

सत्संग और संगति
583

भुवंगम बास न बेधई, चंदन दोष न लाय।
सब अंग तो विष सों भरा, अमृत कहाँ समाय॥

चंदन की सुगंध साँप को नहीं बेधती, पर इसमें चंदन का दोष नहीं। जिसका सारा अंग विष से भरा हो, उसमें अमृत कहाँ समाएगा?

सत्संग और संगति
584

तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल।
काची सरसों पेरि कै, खरी भया न तेल॥

यदि तुम्हें प्रेम की सच्ची पीड़ा है तो परिपक्व व्यक्ति से नाता जोड़ो। कच्ची सरसों पेरने पर न खली बनती है न तेल।

सत्संग और संगति
588

ज्ञानी को ज्ञानी मिलै, रस की लूटम लूट।
ज्ञानी को आनी मिलै, हौवै माथा कूट॥

ज्ञानी को ज्ञानी मिले तो रस की लूट मच जाती है। पर ज्ञानी को अज्ञानी मिल जाए तो सिर पीटने के सिवा कुछ नहीं बचता।

सत्संग और संगति
590

ब्राह्मण केरी बेटिया, मांस शराब न खाय।
संगति भई कलाल की, मद बिना रहा न जाए॥

जो कभी मांस-मदिरा छूती तक न थी, कलाल की संगति में पड़कर उसके बिना रह ही नहीं पाती। संगति स्वभाव को पूरी तरह पलट देती है।

सत्संग और संगति
594

प्रीति कर सुख लेने को, सो सुख गया हिराय।
जैसे पाइ छछूंदरी, पकड़ि साँप पछिताय॥

सुख पाने के लिए प्रीति की, पर वह सुख ही खो गया। जैसे साँप छछूंदर पकड़कर पछताता है, वैसी ही दशा हो जाती है।

सत्संग और संगति
595

कबीर विषधर बहु मिले, मणिधर मिला न कोय।
विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय॥

विष धारण करने वाले तो बहुत मिले, पर मणि धारण करने वाला कोई नहीं मिला। यदि विषधर को मणिधर मिल जाए तो विष छूटकर अमृत हो जाए।

सत्संग और संगति
597

तरुवर जड़ से काटिया, जबै सम्हारो जहाज।
तारै पर बोरे नहीं, बाँह गहे की लाज॥

वृक्ष जड़ से काटा गया, फिर भी उसने जहाज बनकर सबको तारा और किसी को डुबोया नहीं। जिसने बाँह पकड़ी, उसकी लाज निभाना यही है।

सत्संग और संगति
599

लकड़ी जल डूबै नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनी सींची जानि के, यही बड़ने की रीति॥

लकड़ी जल में डूबती नहीं—यह कैसी प्रीति? जिसने उसे सींचा था उसी को पहचानकर वह ऊपर तैरती है; बड़प्पन की यही रीति है।

सत्संग और संगति
601

संगति ऐसी कीजिये, सरसा नर सो संग।
लर-लर लोई हेत है, तऊ न छौड़ रंग॥

संगति ऐसे रसिक और सज्जन व्यक्ति से करो जिसका रंग कभी न छूटे—चाहे कितनी ही रगड़ पड़े, वह अपना स्नेह नहीं छोड़ता।

सत्संग और संगति
603

साधु संग गुरु भक्ति अरु, बढ़त बढ़त बढ़ि जाय।
ओछी संगत खर शब्द रु, घटत-घटत घटि जाय॥

साधु-संग और गुरु-भक्ति बढ़ते-बढ़ते बढ़ती जाती है। ओछी संगति और कटु वचन घटते-घटते सब कुछ घटा देते हैं।

सत्संग और संगति
604

संगत कीजै साधु की, होवे दिन-दिन हेत।
साकुट काली कामली, धोते होय न सेत॥

साधु की संगति करो, उससे दिन-प्रतिदिन प्रेम बढ़ता है। नास्तिक तो काली कमली जैसा है, धोने पर भी सफेद नहीं होता।

सत्संग और संगति
605

चर्चा करूँ तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय।
ध्यान धरो तब एकिला, और न दूजा कोय॥

चर्चा करनी हो तो चौराहे पर, ज्ञान की बात हो तो दो लोग पर्याप्त हैं। पर ध्यान धरना हो तो अकेले ही—वहाँ दूसरा कोई नहीं चाहिए।

सत्संग और संगति
712

कुल करनी के कारने, हंसा गया बिगोय।
तब कुल काको लाजि है, चाकिर पाँव का होय॥

कुल और लोकाचार के कारण हंस रूपी जीव नष्ट हो गया। तब कुल की क्या लाज, जब चरणों का सेवक बनना ही श्रेष्ठ था?

सत्संग और संगति
719

दीन गवाँयो दूनि संग, दुनी न चली साथ।
पाँच कुल्हाड़ी मारिया, मूरख अपने हाथ॥

दुनिया के संग में धर्म गँवा दिया और दुनिया साथ भी न चली। मूर्ख ने पाँच विकारों की कुल्हाड़ी अपने ही हाथों अपने ऊपर चला ली।

सत्संग और संगति