हंसा मोती चुगत था, कुच्छ थार भराय।
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय॥
हंस मोती चुगता है और थाल भरता जाता है। पर जो व्यक्ति मार्ग ही नहीं जानता, उससे कोई क्या करा सकता है? पात्रता के बिना अवसर भी व्यर्थ हो जाता है।
सत्संग और संगति68 दोहे · अर्थ सहित
हंसा मोती चुगत था, कुच्छ थार भराय।
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय॥
हंस मोती चुगता है और थाल भरता जाता है। पर जो व्यक्ति मार्ग ही नहीं जानता, उससे कोई क्या करा सकता है? पात्रता के बिना अवसर भी व्यर्थ हो जाता है।
सत्संग और संगतिसोना, सज्जन, साधुजन, टूट जुड़ै सौ बार।
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एके धका दरार॥
सोना, सज्जन और साधु—ये सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं। पर दुर्जन कुम्हार के कच्चे घड़े जैसा है, एक ही धक्के में दरक जाता है और फिर नहीं जुड़ता।
सत्संग और संगतिकबीर जात पुकारया, चढ़ चंदन की डार।
बाट लगाए ना लगे, फिर क्या लेत हमार॥
कबीर चंदन की डाल पर चढ़कर पुकार-पुकारकर मार्ग बताते रहे। जो फिर भी राह पर नहीं आया, उसका उपदेशक क्या ले लेगा? सुनना और अपनाना सुनने वाले पर निर्भर है।
सत्संग और संगतिहरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप।
निशिवासर सुख निधि, लहा अटल प्रगटा आप॥
हरि की संगति से मन शीतल हो गया और मोह का ताप मिट गया। दिन-रात सुख का भंडार मिल गया और भीतर अटल आत्मस्वरूप स्वयं प्रकट हो गया।
सत्संग और संगतिकबीरा संगति साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खाँड़ भोजन मिले, ताकर संग न जाय॥
साधु की संगति में जौ की भूसी भी खानी पड़े तो स्वीकार है, पर कुसंग में खीर और शक्कर का भोजन मिले तो भी वह संग नहीं करना चाहिए। संगति भोजन से बड़ी है।
सत्संग और संगतिकबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय।
दुख बासे भागा फिरै, सुख में रहै समाय॥
कलह और व्यर्थ की कल्पनाएँ सत्संग से दूर हो जाती हैं। तब दुःख स्वयं भागता फिरता है और मनुष्य सुख में समाया रहता है।
सत्संग और संगतिकबीरा संगति साधु की, जित प्रीत कीजै जाय।
दुर्गति दूर बहावति, देवी सुमति बनाय॥
साधु की संगति ऐसी है जहाँ जाकर प्रीति करनी चाहिए। वह दुर्गति को बहा ले जाती है और सद्बुद्धि प्रदान करती है।
सत्संग और संगतिकबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी न होय।
होमी चंदन बासना, नीम न कहसी कोय॥
साधु की संगति कभी निष्फल नहीं जाती। चंदन की सुगंध पास आ जाए तो फिर उसे कोई नीम नहीं कहेगा। संग व्यक्ति की पहचान ही बदल देता है।
सत्संग और संगतिकबीरा मन पँछी भया, भये ते बाहर जाय।
जो जैसे संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
मन पक्षी के समान हो गया है, जहाँ चाहे उड़ जाता है। जो जैसी संगति करेगा, वैसा ही फल पाएगा। मन जिस दिशा में जाता है, जीवन उसी ओर मुड़ जाता है।
सत्संग और संगतिबंधे को बँधा मिले, छूटे कौन उपाय।
कर संगति निरबंध की, पल में लेय छुड़ाय॥
बँधे हुए को बँधा ही मिले तो छूटने का उपाय कौन बताएगा? उसकी संगति करो जो स्वयं बंधनमुक्त है—वह पल भर में छुड़ा देगा।
सत्संग और संगतिभज दीना कहूँ और ही, तन साधु न के संग।
कहें कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग॥
मन कहीं और लगा है और शरीर साधुओं के संग बैठा है। कबीर कहते हैं—काले कपड़े पर भला रंग कैसे चढ़ेगा? मन के बिना संगति का कोई असर नहीं।
सत्संग और संगतिराम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
जो सुख साधु संग में, सो बैकुंठ न होय॥
राम ने बुलावा भेजा तो कबीर रो पड़े। जो सुख साधुओं की संगति में है, वह बैकुंठ में भी नहीं। सत्संग का आनंद स्वर्ग से भी बड़ा है।
सत्संग और संगतिसंगति सों सुख्या ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय।
कह कबीर तहँ जाइये, साधु संग जहँ होय॥
अच्छी संगति से सुख उपजता है और बुरी संगति से दुःख। कबीर कहते हैं—वहीं जाना चाहिए जहाँ साधुओं का संग मिले।
सत्संग और संगतिबुगली नीर बिटालिया, सायर चढ़या कलंक।
और पखेरू पी गये, हंस न बोवे चंच॥
बगुले ने पानी जूठा कर दिया और सरोवर पर कलंक लग गया। दूसरे पक्षी तो पी गए, पर हंस ने उसमें चोंच तक नहीं डाली। श्रेष्ठ जन दूषित को स्वीकार नहीं करते।
सत्संग और संगतिजानि बूझि साँचहि तजें, करै झूठ सूँ नेहु।
ताकि संगति राम जी, सुपिने ही पिनि देहु॥
जो जान-बूझकर सत्य को छोड़ता है और झूठ से प्रेम करता है—हे राम, उसकी संगति मुझे स्वप्न में भी मत देना।
सत्संग और संगतिकबीरा खाई कोट कि, पानी पिवै न कोई।
जाइ मिलै जब गंग से, तब गंगोदक होइ॥
किले की खाई का पानी कोई नहीं पीता। पर वही जल जब गंगा से जा मिलता है, तब गंगाजल कहलाने लगता है। संगति ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा बदल देती है।
सत्संग और संगतिमूरख संग न कीजिये, लोहा जलि न तिराइ।
कदली-सीप-भुजंग मुख, एक बूंद तिहँ भाइ॥
मूर्ख का संग मत करो, लोहा जल में तैर नहीं सकता। एक ही बूँद केले में कपूर, सीप में मोती और साँप के मुख में विष बन जाती है—पात्र के अनुसार परिणाम बदलता है।
सत्संग और संगतिकागद केरी नाव री, पाणी केरी गंग।
कहै कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग॥
नाव कागज की है और नदी गंगा जैसी विशाल। कबीर कहते हैं—पाँच विकारों के कुसंग के साथ मैं कैसे पार उतरूँ?
सत्संग और संगतिसिंहों के लेहँड नहीं, हंसों की नहीं पाँत।
लालों की नहिं बोरियाँ, साध न चलै जमात॥
सिंहों के झुंड नहीं होते, हंसों की पंक्तियाँ नहीं लगतीं और लालों की बोरियाँ नहीं भरतीं। इसी तरह सच्चे साधु भीड़ में नहीं चलते।
सत्संग और संगतिपदारथ पेलि करि, कंकर लीया हाथि।
जोड़ी बिछटी हंस की, पड़्या बगां के साथि॥
अनमोल वस्तु को ठुकराकर हाथ में कंकड़ ले लिया। हंसों की जोड़ी छूट गई और बगुलों के साथ जा पड़े। कुसंग में पड़कर श्रेष्ठ संग खो दिया।
सत्संग और संगतिनिंदक नियरे राखिये, आँगन कुटि छबाय।
बिन पाणी बिन सबुना, निरमल करै सुभाय॥
निंदा करने वाले को अपने पास ही रखो, आँगन में कुटिया बनवा दो। वह बिना पानी और साबुन के ही तुम्हारे स्वभाव को निर्मल कर देगा।
सत्संग और संगतिकबीर चंदर के भिरै, नीम भी चंदन होय।
बूड़्यो बाँस बड़ाइया, यों जनि बूड़ो कोय॥
चंदन के पास रहने से नीम भी चंदन हो जाता है। पर बाँस अपने बड़प्पन के अहंकार में डूब गया—ऐसे कोई मत डूबे।
सत्संग और संगतिकबीर लहरि समुंद्र की, मोती बिखरे आय।
बगुला परख न जानई, हंस चुनि-चुनि खाय॥
समुद्र की लहर मोती बिखेर गई। बगुला उन्हें पहचान नहीं पाता, पर हंस चुन-चुनकर ग्रहण कर लेता है। सत्संग का लाभ पारखी ही उठाता है।
सत्संग और संगतिसाकट कहा न कहि चलै, सुनहा कहा न खाय।
जो कौवा मठ हगि भरै, तो मठ को कहा नशाय॥
नास्तिक क्या नहीं कह डालता और कुत्ता क्या नहीं खा जाता? पर कौआ मठ पर बीट कर दे तो मठ का क्या बिगड़ता है? निंदा से श्रेष्ठता घटती नहीं।
सत्संग और संगतिकबीर साकट की सभा, तू मति बैठे जाय।
एक गुवाड़े कदि बड़ै, रोज गदहरा गाय॥
नास्तिकों की सभा में जाकर मत बैठो। एक ही बाड़े में गधे और गाय बाँध दिए जाएँ तो गाय का ही नुकसान होता है।
सत्संग और संगतिसंगत सोई बिगुर्चई, जो है साकट साथ।
कंचन कटोरा छाड़ि के, सनहक लीन्ही हाथ॥
वही संगति बिगाड़ती है जो नास्तिक के साथ हो। ऐसा व्यक्ति सोने का कटोरा छोड़कर हाथ में ठीकरा उठा लेता है।
सत्संग और संगतिसाकट संग न बैठिये, करन कुबेर समान।
ताके संग न चलिये, पड़ि हैं नरक निदान॥
नास्तिक के साथ मत बैठो, चाहे वह कर्ण और कुबेर के समान दानी और धनी हो। उसके साथ चलने से अंततः नरक ही मिलता है।
सत्संग और संगतिसाकट सूकर कीकरा, तीनों की गति एक है।
कोटि जतन परमोघिये, तऊ न छाड़े टेक॥
नास्तिक, सूअर और बबूल—तीनों की गति एक जैसी है। करोड़ों यत्न करके समझा लो, फिर भी ये अपना स्वभाव नहीं छोड़ते।
सत्संग और संगतिघर में साकट स्त्री, आप कहावे दास।
वो तो होगी शूकरी, वो रखवाला पास॥
घर में नास्तिक वातावरण हो और आप स्वयं को भक्त कहलाएँ—यह विरोधाभास टिकता नहीं। भीतर और बाहर एक होना चाहिए।
सत्संग और संगतिसाधुन की झुपड़ी भली, न साकट के गाँव।
चंदन की कुटकी भली, ना बबूल बनराव॥
साधु की झोंपड़ी भली है, नास्तिकों का पूरा गाँव नहीं। चंदन का छोटा टुकड़ा भला है, बबूल का पूरा वन नहीं।
सत्संग और संगतिजा सुख को मुनिवर रटें, सुर नर करें विलाप।
जो सुख सहजै पाईया, संतों संगति आप॥
जिस सुख के लिए मुनि रटते रहते हैं और देवता-मनुष्य तरसते हैं, वही सुख संतों की संगति में सहज ही मिल जाता है।
सत्संग और संगतिसंगत कीजै साधु की, कभी न निष्फल होय।
लोहा पारस परस ते, सो भी कंचन होय॥
साधु की संगति कभी निष्फल नहीं होती। पारस के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है।
सत्संग और संगतिआसन तो इकांत करें, कामिनी संगत दूर।
शीतल संत शिरोमनी, उनका ऐसा नूर॥
जो एकांत में आसन लगाते हैं और विषय-संगति से दूर रहते हैं—वे शीतल संत शिरोमणि हैं, उनका तेज ही ऐसा होता है।
सत्संग और संगतिएक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
कबीर संगत साधु की, करै कोटि अपराध॥
एक घड़ी, आधी घड़ी या उसकी भी आधी—इतनी देर की साधु-संगति भी करोड़ों अपराधों को धो देती है।
सत्संग और संगतिकबिरा संगति साधु की, जो करि जाने कोय।
सकल बिरछ चंदन भये, बाँस न चंदन होय॥
साधु की संगति का मर्म कोई विरला ही जानता है। चंदन के पास सारे वृक्ष चंदन हो गए, पर बाँस अपने अहंकार के कारण चंदन न बन सका।
सत्संग और संगतिसाधुन के सतसंग से, थर-थर काँपे देह।
कबहुँ भाव कुभाव ते, जनि मिटि जाय सनेह॥
साधुओं के सत्संग में जाते हुए देह थर-थर काँपती है—कहीं किसी कुभाव के कारण वह स्नेह मिट न जाए। यह श्रद्धा की सतर्कता है।
सत्संग और संगतिसाखी शब्द बहुतै सुना, मिटा न मन का दाग।
संगति सो सुधरा नहीं, ताका बड़ा अभाग॥
साखी और शब्द बहुत सुने, पर मन का दाग नहीं मिटा। जो संगति से भी नहीं सुधरा, उससे बड़ा अभागा कोई नहीं।
सत्संग और संगतिसाध संग अंतर पड़े, यह मति कबहु न होय।
कहें कबीर तिहु लोक में, सुखी न देखा कोय॥
साधु-संग में दूरी पड़ जाए, ऐसी बुद्धि कभी न हो। कबीर कहते हैं—तीनों लोकों में उसके बिना कोई सुखी नहीं देखा।
सत्संग और संगतिगिरिये परबत सिखर ते, परिये धरिन मंझार।
मूरख मित्र न कीजिये, बूड़ो काली धार॥
पर्वत की चोटी से गिर जाना और धरती पर आ पड़ना स्वीकार है, पर मूर्ख को मित्र मत बनाओ—वह काली धार में डुबो देता है।
सत्संग और संगतिसंत कबीर गुरु के देश में, बसि जावै जो कोय।
कागा ते हंसा बनै, जाति बरन कुछ खोय॥
जो कोई गुरु के देश में जाकर बस जाए, वह कौए से हंस बन जाता है और जाति-वर्ण का भेद खो देता है।
सत्संग और संगतिभुवंगम बास न बेधई, चंदन दोष न लाय।
सब अंग तो विष सों भरा, अमृत कहाँ समाय॥
चंदन की सुगंध साँप को नहीं बेधती, पर इसमें चंदन का दोष नहीं। जिसका सारा अंग विष से भरा हो, उसमें अमृत कहाँ समाएगा?
सत्संग और संगतितोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल।
काची सरसों पेरि कै, खरी भया न तेल॥
यदि तुम्हें प्रेम की सच्ची पीड़ा है तो परिपक्व व्यक्ति से नाता जोड़ो। कच्ची सरसों पेरने पर न खली बनती है न तेल।
सत्संग और संगतिकाचा सेती मति मिलै, पाका सेती बान।
काचा सेती मिलत ही, है तन धन की हान॥
कच्चे यानी अपरिपक्व से मेल मत करो, परिपक्व से नाता रखो। कच्चे से मिलते ही तन और धन दोनों की हानि होती है।
सत्संग और संगतिकोयला भी हो ऊजला, जरि बरि है जो सेव।
मूरख होय न ऊजला, ज्यों कालर का खेत॥
कोयला भी जल-जलकर सफेद राख हो जाता है, पर मूर्ख कभी उजला नहीं होता—जैसे ऊसर खेत कभी उपजाऊ नहीं होता।
सत्संग और संगतिमूरख को समुझावते, ज्ञान गाँठि का जाय।
कोयला होय न ऊजला, सौ मन साबुन लाय॥
मूर्ख को समझाने में अपनी गाँठ का ज्ञान भी चला जाता है। सौ मन साबुन लगा दो, कोयला उजला नहीं होता।
सत्संग और संगतिज्ञानी को ज्ञानी मिलै, रस की लूटम लूट।
ज्ञानी को आनी मिलै, हौवै माथा कूट॥
ज्ञानी को ज्ञानी मिले तो रस की लूट मच जाती है। पर ज्ञानी को अज्ञानी मिल जाए तो सिर पीटने के सिवा कुछ नहीं बचता।
सत्संग और संगतिसाखी शब्द बहुतक सुना, मिटा न मन क मोह।
पारस तक पहुँचा नहीं, रहा लोह का लोह॥
बहुत साखी और शब्द सुने, पर मन का मोह न मिटा। पारस तक पहुँचा ही नहीं, इसलिए लोहे का लोहा ही रह गया।
सत्संग और संगतिब्राह्मण केरी बेटिया, मांस शराब न खाय।
संगति भई कलाल की, मद बिना रहा न जाए॥
जो कभी मांस-मदिरा छूती तक न थी, कलाल की संगति में पड़कर उसके बिना रह ही नहीं पाती। संगति स्वभाव को पूरी तरह पलट देती है।
सत्संग और संगतिजीवन जीवन रात मद, अविचल रहै न कोय।
जु दिन जाय सत्संग में, जीवन का फल सोय॥
जीवन और उसका नशा—कुछ भी स्थिर नहीं रहता। जो दिन सत्संग में बीत जाए, वही जीवन का असली फल है।
सत्संग और संगतिदाग जु लागा नील का, सौ मन साबुन धोय।
कोटि जतन परमोधिये, कागा हंस न होय॥
नील का दाग सौ मन साबुन से भी नहीं छूटता। करोड़ों यत्न से समझा लो, कौआ हंस नहीं बनता।
सत्संग और संगतिजो छोड़े तो आँधरा, खाये तो मरि जाय।
ऐसे संग छछूंदरी, दोऊ भाँति पछिताय॥
साँप छछूंदर को छोड़े तो अंधा हो जाए और खाए तो मर जाए। कुसंग ऐसा ही होता है—दोनों ओर से पछतावा।
सत्संग और संगतिप्रीति कर सुख लेने को, सो सुख गया हिराय।
जैसे पाइ छछूंदरी, पकड़ि साँप पछिताय॥
सुख पाने के लिए प्रीति की, पर वह सुख ही खो गया। जैसे साँप छछूंदर पकड़कर पछताता है, वैसी ही दशा हो जाती है।
सत्संग और संगतिकबीर विषधर बहु मिले, मणिधर मिला न कोय।
विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय॥
विष धारण करने वाले तो बहुत मिले, पर मणि धारण करने वाला कोई नहीं मिला। यदि विषधर को मणिधर मिल जाए तो विष छूटकर अमृत हो जाए।
सत्संग और संगतिसज्जन सों सज्जन मिले, होवे दो दो बात।
गहदा सो गहदा मिले, खावे दो दो लात॥
सज्जन से सज्जन मिले तो दो सार्थक बातें होती हैं। गधे से गधा मिले तो दो-दो लातें ही चलती हैं।
सत्संग और संगतितरुवर जड़ से काटिया, जबै सम्हारो जहाज।
तारै पर बोरे नहीं, बाँह गहे की लाज॥
वृक्ष जड़ से काटा गया, फिर भी उसने जहाज बनकर सबको तारा और किसी को डुबोया नहीं। जिसने बाँह पकड़ी, उसकी लाज निभाना यही है।
सत्संग और संगतिमैं सोचों हित जानिके, कठिन भयो है काठ।
ओछी संगत नीच की, सिर पर पाड़ी बाट॥
मैं हित समझकर सोचता रहा, पर वह काठ की तरह कठोर निकला। नीच की ओछी संगति ने सिर पर आफत ला दी।
सत्संग और संगतिलकड़ी जल डूबै नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनी सींची जानि के, यही बड़ने की रीति॥
लकड़ी जल में डूबती नहीं—यह कैसी प्रीति? जिसने उसे सींचा था उसी को पहचानकर वह ऊपर तैरती है; बड़प्पन की यही रीति है।
सत्संग और संगतिसाधू संगत परिहरै, करै विषय का संग।
कूप खनी जल बावरे, त्याग दिया जल गंग॥
जो साधु की संगति छोड़कर विषयों का संग करता है, वह बावला गंगा का जल छोड़कर कुआँ खोदने बैठ जाता है।
सत्संग और संगतिसंगति ऐसी कीजिये, सरसा नर सो संग।
लर-लर लोई हेत है, तऊ न छौड़ रंग॥
संगति ऐसे रसिक और सज्जन व्यक्ति से करो जिसका रंग कभी न छूटे—चाहे कितनी ही रगड़ पड़े, वह अपना स्नेह नहीं छोड़ता।
सत्संग और संगतितेल तिली सौ ऊपजै, सदा तेल को तेल।
संगति को बेरो भयो, ता ते नाम फुलेल॥
तेल तिल से उपजता है और तेल ही रहता है। पर फूलों की संगति मिल जाए तो वही तेल फुलेल कहलाने लगता है।
सत्संग और संगतिसाधु संग गुरु भक्ति अरु, बढ़त बढ़त बढ़ि जाय।
ओछी संगत खर शब्द रु, घटत-घटत घटि जाय॥
साधु-संग और गुरु-भक्ति बढ़ते-बढ़ते बढ़ती जाती है। ओछी संगति और कटु वचन घटते-घटते सब कुछ घटा देते हैं।
सत्संग और संगतिसंगत कीजै साधु की, होवे दिन-दिन हेत।
साकुट काली कामली, धोते होय न सेत॥
साधु की संगति करो, उससे दिन-प्रतिदिन प्रेम बढ़ता है। नास्तिक तो काली कमली जैसा है, धोने पर भी सफेद नहीं होता।
सत्संग और संगतिचर्चा करूँ तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय।
ध्यान धरो तब एकिला, और न दूजा कोय॥
चर्चा करनी हो तो चौराहे पर, ज्ञान की बात हो तो दो लोग पर्याप्त हैं। पर ध्यान धरना हो तो अकेले ही—वहाँ दूसरा कोई नहीं चाहिए।
सत्संग और संगतिसंत सुरसरी गंगा जल, आनि पखारा अंग।
मैले से निरमल भये, साधू जन को संग॥
संत गंगाजल के समान हैं, उनके संग से अंग धुल जाते हैं। साधुजन की संगति से मैले भी निर्मल हो जाते हैं।
सत्संग और संगतिढोल दमामा दुरबरी, सहनाई संग भेरि।
औसर चले बजाय के, है कोई रखै फेरि॥
ढोल, नगाड़े, शहनाई और भेरी बजाते हुए अवसर निकल जाता है। क्या कोई उसे लौटाकर रख सकता है?
सत्संग और संगतिकुल करनी के कारने, हंसा गया बिगोय।
तब कुल काको लाजि है, चाकिर पाँव का होय॥
कुल और लोकाचार के कारण हंस रूपी जीव नष्ट हो गया। तब कुल की क्या लाज, जब चरणों का सेवक बनना ही श्रेष्ठ था?
सत्संग और संगतिदीन गवाँयो दूनि संग, दुनी न चली साथ।
पाँच कुल्हाड़ी मारिया, मूरख अपने हाथ॥
दुनिया के संग में धर्म गँवा दिया और दुनिया साथ भी न चली। मूर्ख ने पाँच विकारों की कुल्हाड़ी अपने ही हाथों अपने ऊपर चला ली।
सत्संग और संगतिकबीर काया पाहुनी, हंस बटाऊ माहिं।
ना जानूँ कब जायगा, मोहि भरोसा नाहिं॥
यह काया अतिथिशाला है और हंस रूपी जीव उसमें राहगीर। पता नहीं वह कब चल देगा—मुझे कोई भरोसा नहीं।
सत्संग और संगति