आज का दोहा › दया और परोपकार

दया और परोपकार पर कबीर के दोहे

13 दोहे · अर्थ सहित

011

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप॥

जहाँ दया है वहीं धर्म बसता है और जहाँ लोभ है वहाँ पाप। क्रोध पाप को जन्म देता है, जबकि क्षमा में स्वयं परमात्मा का वास है। मनुष्य के भाव ही उसके धर्म-अधर्म को तय करते हैं।

दया और परोपकार
031

दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय॥

कमजोर को कभी मत सताओ, उसकी आह बहुत भारी होती है। जैसे धौंकनी की निर्जीव फूँक से लोहा तक भस्म हो जाता है, वैसे ही निर्बल की आह विनाश कर देती है।

दया और परोपकार
032

दान दिए धन ना घटे, नदी न घटे नीर।
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर॥

दान देने से धन कम नहीं होता, जैसे बहने से नदी का जल नहीं घटता। कबीर कहते हैं—यह बात केवल सुनो मत, अपनी आँखों से परख लो। देने से ही बढ़ोतरी होती है।

दया और परोपकार
081

दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय।
साईं के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय॥

किस पर दया करें और किस पर निर्दय हों? चींटी हो या हाथी—सभी जीव उसी एक स्वामी के हैं। इसलिए दया में भेदभाव नहीं, सब पर समान करुणा होनी चाहिए।

दया और परोपकार
126

भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग।
भाँडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग॥

भूखा-भूखा कहकर लोगों को क्या सुनाते फिरते हो? जिसने यह देह रूपी पात्र गढ़ा और मुख दिया, वही भरने का प्रबंध भी करेगा। यही पूर्ण योग है—भरोसा।

दया और परोपकार
194

क्षमा बड़ेन को उचित है, छोटे को उत्पात।
कहा विष्णु का घटि गया, जो भृगु मारी लात॥

क्षमा करना बड़ों को शोभा देता है और उपद्रव करना छोटों का स्वभाव है। भृगु ऋषि ने लात मार दी तो विष्णु का क्या घट गया? बड़प्पन सहन करने में है।

दया और परोपकार
312

दुखिया भूखा दुख कों, सुखिया सुख कों झूरि।
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि॥

दुखी व्यक्ति दुःख में भूखा रहता है और सुखी सुख के लिए तरसता है। सदा आनंद में तो वे राम के जन हैं जिन्होंने सुख-दुःख दोनों को दूर कर दिया।

दया और परोपकार
329

कबीर मन मृतक भया, दुर्बल भया सरीर।
तब पैंडे लागा हरि फिरै, कहत कबीर कबीर॥

जब मन मर गया और शरीर दुर्बल हो गया, तब हरि स्वयं पीछे-पीछे 'कबीर-कबीर' पुकारते फिरने लगे। अहं मिटते ही ईश्वर स्वयं खोजने आते हैं।

दया और परोपकार
512

सदा कृपालु दुःख परिहरन, बैर भाव नहिं दोय।
छिमा ज्ञान सत भाखही, सिंह रहित तु होय॥

सदा कृपालु रहे, दूसरों के दुःख हरे, किसी से बैर न रखे, क्षमा और ज्ञान की बात कहे और हिंसा से रहित हो—ये संत के लक्षण हैं।

दया और परोपकार