आज का दोहा › माया और मोह

माया और मोह पर कबीर के दोहे

20 दोहे · अर्थ सहित

017

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥

न माया मरी, न मन मरा—शरीर बार-बार जन्मते और मरते रहे। आशा और तृष्णा कभी नहीं मरीं। दास कबीर कहते हैं कि इच्छाओं का अंत ही असली मृत्यु से मुक्ति है।

माया और मोह
027

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय।
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय॥

माया और छाया एक जैसी हैं, यह भेद कोई विरला ही समझता है। जो इसके पीछे भागता है उससे यह दूर भागती है, और जो इससे विमुख होकर भक्ति करता है उसके पीछे-पीछे चली आती है।

माया और मोह
114

यह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो।
बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो केहो॥

यह माया नीच वृत्ति वाली है, इसे दूर ही रखो। यह बाप और बेटे तक को आपस में उलझा देती है और किसी का सगा साथ नहीं देती। माया का संग सर्वथा त्याज्य है।

माया और मोह
144

को छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय।
ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै, त्यों-त्यों उरझत जाय॥

इस माया-जाल में फँसकर कौन छूट पाया है? पक्षी व्यर्थ ही छटपटाता है—जितना वह सुलझकर भागना चाहता है, उतना ही अधिक उलझता जाता है।

माया और मोह
179

माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश।
जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश॥

माया ठगिनी बनकर सारे देश में सबको ठगती फिरती है। जिस ठग ने इस ठगिनी को ही ठग लिया, उस ठग को मेरा प्रणाम। माया को जीतने वाला ही सच्चा विजेता है।

माया और मोह
215

पूत पियारौ पिता कों, गौहनि लागो घाइ।
लोभ-मिठाई हाथ दे, आपण गयो भुलाइ॥

पुत्र पिता को प्यारा है और पीछे-पीछे दौड़ा चला आता है। पिता उसके हाथ में लोभ रूपी मिठाई थमाकर स्वयं खिसक जाता है। माया ऐसे ही जीव को बहलाकर भटका देती है।

माया और मोह
227

परनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि।
खूणें बेसिर खाइय, परगट होइ दिवानि॥

पराई स्त्री में आसक्ति लहसुन खाने जैसी है—चाहे कोने में छिपकर खाओ, गंध प्रकट हो ही जाती है। दुराचार कभी छिपा नहीं रहता।

माया और मोह
245

तृष्णा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ।
जवासा के रूष ज्यूँ, घण मेहां कुमिलाइ॥

तृष्णा सींचने से बुझती नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा वर्षा में और मुरझा जाता है—इच्छाएँ पूरी करने से घटती नहीं।

माया और मोह
252

माया तजी तौ क्या भया, मानि तजि नहीं जाइ।
मानि बड़े मुनियर मिले, मानि सबनि को खाइ॥

माया छोड़ देने से क्या हुआ, यदि मान-अभिमान नहीं छूटा? अभिमान ने बड़े-बड़े मुनियों को निगल लिया—यह सबको खा जाता है।

माया और मोह
275

माषी गुड़ में गड़ि रही, पंख रही लपटाई।
ताली पीटै सिरि घुनै, मीठै बोई माइ॥

मक्खी गुड़ में धँस गई और उसके पंख उसी में लिपट गए। अब वह हाथ मलती और सिर धुनती है। मीठे लोभ में फँसकर जीव ऐसे ही छटपटाता है।

माया और मोह
338

कोई एक राखै साबधाँ, चेतनि पहरै जागि।
बस्तर बासन सूँ खिसै, चोर न सकई लागि॥

कोई विरला ही सावधान रहता है और चेतना का पहरा देकर जागता है। ऐसा व्यक्ति वस्त्र-बर्तन के मोह से हट जाता है, तब कोई चोर उसे लूट नहीं सकता।

माया और मोह
737

क्या करिये क्या जोड़िये, तोड़े जीवन काज।
छाड़ि छाड़ि सब जात है, देह गेह धन राज॥

क्या करें और क्या जोड़ें, जब जीवन का काम ही टूट जाता है? देह, घर, धन और राज—सब छोड़-छोड़कर जाना पड़ता है।

माया और मोह