माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥
न माया मरी, न मन मरा—शरीर बार-बार जन्मते और मरते रहे। आशा और तृष्णा कभी नहीं मरीं। दास कबीर कहते हैं कि इच्छाओं का अंत ही असली मृत्यु से मुक्ति है।
माया और मोह20 दोहे · अर्थ सहित
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥
न माया मरी, न मन मरा—शरीर बार-बार जन्मते और मरते रहे। आशा और तृष्णा कभी नहीं मरीं। दास कबीर कहते हैं कि इच्छाओं का अंत ही असली मृत्यु से मुक्ति है।
माया और मोहमाया छाया एक सी, बिरला जाने कोय।
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय॥
माया और छाया एक जैसी हैं, यह भेद कोई विरला ही समझता है। जो इसके पीछे भागता है उससे यह दूर भागती है, और जो इससे विमुख होकर भक्ति करता है उसके पीछे-पीछे चली आती है।
माया और मोहयह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो।
बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो केहो॥
यह माया नीच वृत्ति वाली है, इसे दूर ही रखो। यह बाप और बेटे तक को आपस में उलझा देती है और किसी का सगा साथ नहीं देती। माया का संग सर्वथा त्याज्य है।
माया और मोहको छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय।
ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै, त्यों-त्यों उरझत जाय॥
इस माया-जाल में फँसकर कौन छूट पाया है? पक्षी व्यर्थ ही छटपटाता है—जितना वह सुलझकर भागना चाहता है, उतना ही अधिक उलझता जाता है।
माया और मोहमाया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश।
जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश॥
माया ठगिनी बनकर सारे देश में सबको ठगती फिरती है। जिस ठग ने इस ठगिनी को ही ठग लिया, उस ठग को मेरा प्रणाम। माया को जीतने वाला ही सच्चा विजेता है।
माया और मोहपूत पियारौ पिता कों, गौहनि लागो घाइ।
लोभ-मिठाई हाथ दे, आपण गयो भुलाइ॥
पुत्र पिता को प्यारा है और पीछे-पीछे दौड़ा चला आता है। पिता उसके हाथ में लोभ रूपी मिठाई थमाकर स्वयं खिसक जाता है। माया ऐसे ही जीव को बहलाकर भटका देती है।
माया और मोहपरनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि।
खूणें बेसिर खाइय, परगट होइ दिवानि॥
पराई स्त्री में आसक्ति लहसुन खाने जैसी है—चाहे कोने में छिपकर खाओ, गंध प्रकट हो ही जाती है। दुराचार कभी छिपा नहीं रहता।
माया और मोहकबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ।
लालच लोभी मसकरा, तिनकूँ आदर होइ॥
कलियुग खोटा हो गया है, सच्चा मुनि कोई नहीं मिलता। लालची, लोभी और ठिठोली करने वालों का ही आदर होता है।
माया और मोहतृष्णा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ।
जवासा के रूष ज्यूँ, घण मेहां कुमिलाइ॥
तृष्णा सींचने से बुझती नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा वर्षा में और मुरझा जाता है—इच्छाएँ पूरी करने से घटती नहीं।
माया और मोहकबीर सो धन संचिये, जो आगे कू होइ।
सीस चढ़ाये गाठ की, जात न देख्या कोइ॥
वही धन संचित करो जो आगे काम आए। सिर पर लादी हुई गठरी को साथ जाते किसी ने नहीं देखा—पुण्य ही आगे चलता है।
माया और मोहकबीर माया पापरगी, फंध ले बैठी हाटि।
सब जग तौ फंधै पड़्या, गया कबीर काटि॥
माया पापिन फंदा लेकर बाजार में बैठी है। सारा जगत उस फंदे में फँस गया, केवल कबीर उसे काटकर निकल गया।
माया और मोहकबीर इस संसार का, झूठा माया मोह।
जिहि धारि जिता बाधावणा, तिहीं तिता अंदोह॥
इस संसार का माया-मोह झूठा है। जिसने जितने अधिक बंधन बाँध रखे हैं, उसे उतनी ही अधिक व्यथा भोगनी पड़ती है।
माया और मोहमाया तजी तौ क्या भया, मानि तजि नहीं जाइ।
मानि बड़े मुनियर मिले, मानि सबनि को खाइ॥
माया छोड़ देने से क्या हुआ, यदि मान-अभिमान नहीं छूटा? अभिमान ने बड़े-बड़े मुनियों को निगल लिया—यह सबको खा जाता है।
माया और मोहमाषी गुड़ में गड़ि रही, पंख रही लपटाई।
ताली पीटै सिरि घुनै, मीठै बोई माइ॥
मक्खी गुड़ में धँस गई और उसके पंख उसी में लिपट गए। अब वह हाथ मलती और सिर धुनती है। मीठे लोभ में फँसकर जीव ऐसे ही छटपटाता है।
माया और मोहकोई एक राखै साबधाँ, चेतनि पहरै जागि।
बस्तर बासन सूँ खिसै, चोर न सकई लागि॥
कोई विरला ही सावधान रहता है और चेतना का पहरा देकर जागता है। ऐसा व्यक्ति वस्त्र-बर्तन के मोह से हट जाता है, तब कोई चोर उसे लूट नहीं सकता।
माया और मोहआशा तजि माया तजै, मोह तजै अरु मान।
हरष शोक निंदा तजै, कहें कबीर संत जान॥
जो आशा, माया, मोह, मान, हर्ष, शोक और निंदा—इन सबका त्याग कर दे, कबीर कहते हैं उसी को संत जानो।
माया और मोहबोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम।
मद माया और इस्तरी, नहिं संतन के काम॥
ठिठोली, उपहास, व्यर्थ की हँसी-खेल, नशा, माया और विषय-आसक्ति—ये संतों के काम की वस्तुएँ नहीं हैं।
माया और मोहक्या करिये क्या जोड़िये, तोड़े जीवन काज।
छाड़ि छाड़ि सब जात है, देह गेह धन राज॥
क्या करें और क्या जोड़ें, जब जीवन का काम ही टूट जाता है? देह, घर, धन और राज—सब छोड़-छोड़कर जाना पड़ता है।
माया और मोहजो तू परा है फंद में, निकसेगा कब अंध।
माया मद तोकूँ चढ़ा, मत भूले मतिमंद॥
हे अंधे, तू फंदे में पड़ा है—निकलेगा कब? माया का नशा तुझ पर चढ़ा है, हे मंदबुद्धि, मत भूल।
माया और मोहमन मुवा माया मुई, संशय मुवा शरीर।
अविनाशी जो न मरे, तो क्यों मरे कबीर॥
मन मर गया, माया मरी, संशय और शरीर भी मरे। पर जो अविनाशी है वह नहीं मरता—फिर कबीर क्यों मरे?
माया और मोह