को छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय।
ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै, त्यों-त्यों उरझत जाय॥
इस माया-जाल में फँसकर कौन छूट पाया है? पक्षी व्यर्थ ही छटपटाता है—जितना वह सुलझकर भागना चाहता है, उतना ही अधिक उलझता जाता है।
माया और मोह