आज का दोहा › भक्ति और नाम-स्मरण

भक्ति और नाम-स्मरण पर कबीर के दोहे

115 दोहे · अर्थ सहित

001

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय॥

दुःख पड़ने पर हर कोई ईश्वर को याद करता है, पर सुख के दिनों में कोई नहीं। कबीर कहते हैं—यदि मनुष्य सुख के समय भी प्रभु का स्मरण करता रहे, तो उसके जीवन में दुःख आने का अवसर ही न आए।

भक्ति और नाम-स्मरण
007

सुख में सुमिरन ना किया, दुःख में किया याद।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद॥

जिसने सुख के दिनों में कभी ईश्वर को याद न किया और केवल दुःख आने पर पुकारा, कबीर कहते हैं—उस स्वार्थी भक्त की पुकार भला कौन सुनेगा? भक्ति निरंतर होनी चाहिए, आवश्यकता पड़ने पर नहीं।

भक्ति और नाम-स्मरण
009

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट॥

राम-नाम का यह अनमोल खजाना खुला पड़ा है—जितना लूट सको लूट लो। जब प्राण देह छोड़ देंगे, तब पछताने से कुछ हाथ न आएगा। भजन का अवसर जीवित रहते ही है।

भक्ति और नाम-स्मरण
014

पाँच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय॥

दिन के पाँच पहर कामकाज में और तीन पहर नींद में बीत गए। जब एक पहर भी हरि-नाम के लिए नहीं निकाला, तो मुक्ति कैसे मिलेगी? समय का यह विभाजन ही जीवन की दिशा तय करता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
015

कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान॥

कबीर कहते हैं—सोते रहने से क्या लाभ? उठकर भगवान का भजन कर। जब यमराज आत्मा को ले जाएँगे, तब यह शरीर रूपी म्यान यहीं पड़ी रह जाएगी। देह नश्वर है, नाम ही साथ जाता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
020

नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग।
और रसायन छाड़ि के, नाम रसायन लाग॥

अधिक नींद मृत्यु का ही चिह्न है—हे कबीर, उठ और जाग जा। बाकी सब औषधियाँ और उपाय छोड़कर नाम रूपी रसायन का सेवन कर, यही जीवन की सच्ची दवा है।

भक्ति और नाम-स्मरण
029

क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन माँहि।
साँस-साँस सुमिरन करो, और यतन कुछ नाहिं॥

इस शरीर का क्या भरोसा—यह क्षण भर में नष्ट हो सकता है। इसलिए हर साँस के साथ प्रभु का स्मरण करो; इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।

भक्ति और नाम-स्मरण
039

सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप।
यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप॥

सोए हुए साधु को जगा देना चाहिए ताकि वह नाम-जप कर सके। पर नास्तिक, शेर और साँप—ये तीनों सोते ही भले हैं, क्योंकि जागने पर ये हानि ही पहुँचाते हैं।

भक्ति और नाम-स्मरण
050

सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन।
प्राण तजे बिन बिछड़े, संत कबीर कह दीन॥

प्रभु-स्मरण में मन ऐसे लगाओ जैसे मछली का पानी से लगाव होता है—वह जल से बिछड़ते ही प्राण त्याग देती है। संत कबीर विनम्रता से यही सीख देते हैं।

भक्ति और नाम-स्मरण
056

कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करे कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय॥

कामी, क्रोधी और लालची व्यक्ति से भक्ति नहीं हो सकती। भक्ति तो कोई वीर ही कर पाता है, जो जाति, वर्ण और कुल के अभिमान को त्याग दे।

भक्ति और नाम-स्मरण
060

भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय।
कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहाँ रंक कहाँ राय॥

भक्ति खेल के मैदान की गेंद जैसी है—जिसे भावे वही ले जाए। कबीर कहते हैं इसमें कोई भेदभाव नहीं; न गरीब देखा जाता है, न राजा। भक्ति सबके लिए समान रूप से खुली है।

भक्ति और नाम-स्मरण
061

घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार।
बाल सनेही साइयाँ, आवा अंत का यार॥

हृदय का परदा हटाकर सामने दर्शन दे दो। हे बचपन के स्नेही स्वामी, तुम्हीं अंत तक साथ निभाने वाले सच्चे मित्र हो। भक्त की यह आर्त पुकार है।

भक्ति और नाम-स्मरण
062

अंतर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार।
जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार॥

हे प्रभु! तुम्हीं एकमात्र अंतर्यामी हो और आत्मा के आधार हो। यदि तुमने हाथ छोड़ दिया तो इस भवसागर से मुझे पार कौन उतारेगा? पूर्ण समर्पण का भाव।

भक्ति और नाम-स्मरण
066

सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग।
कहें कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग॥

स्मरण में मन ऐसे लगाओ जैसे हिरन नाद (संगीत) में लीन हो जाता है। कबीर कहते हैं—वह उसे भूलता नहीं, प्राण तक उसी में त्याग देता है। तन्मयता ही सच्ची भक्ति है।

भक्ति और नाम-स्मरण
067

सुमिरत सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल।
बाहर का पट बंद कर, अंदर का पट खोल॥

स्मरण करते हुए भीतर की सुरति जगाओ, मुख से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। बाहरी इंद्रियों के द्वार बंद करो और भीतर का द्वार खोलो। भक्ति अंतर्मुखी होकर ही फलती है।

भक्ति और नाम-स्मरण
071

जबही नाम हिरदे धरा, भया पाप का नाश।
मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास॥

जैसे ही नाम हृदय में धारण किया, पापों का नाश हो गया—मानो आग की एक चिंगारी सूखी पुरानी घास पर गिर पड़ी हो। नाम का प्रभाव तत्काल और पूर्ण है।

भक्ति और नाम-स्मरण
074

जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय।
नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावें सोय॥

जब तक संसार से आसक्ति का नाता बना है, तब तक सच्ची भक्ति नहीं होती। जो मोह का नाता तोड़कर हरि का भजन करे, वही सच्चा भक्त कहलाता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
075

जल ज्यों प्यारा माहरी, लोभी प्यारा दाम।
माता प्यारा बालका, भगति प्यारा नाम॥

जैसे मछली को जल प्यारा है, लोभी को धन, और माता को अपना बच्चा—वैसे ही भक्त को प्रभु का नाम प्यारा होता है। यह सहज और अटूट लगाव है।

भक्ति और नाम-स्मरण
078

जब लगि भगति सकाम है, तब लग निष्फल सेव।
कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव॥

जब तक भक्ति में कामना है, तब तक सारी सेवा निष्फल है। कबीर कहते हैं—जो देव स्वयं निष्काम हैं, वे सकाम भक्त को कैसे मिलेंगे? भक्ति निःस्वार्थ होनी चाहिए।

भक्ति और नाम-स्मरण
084

जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं वहाँ काम।
दोनों कबहूँ नहिं मिले, रवि रजनी इक धाम॥

जहाँ वासना है वहाँ नाम नहीं टिकता, और जहाँ नाम है वहाँ वासना नहीं रहती। ये दोनों कभी एक साथ नहीं मिलते, जैसे सूर्य और रात्रि एक स्थान पर नहीं रह सकते।

भक्ति और नाम-स्मरण
090

जब ही नाम हृदय धरयो, भयो पाप का नाश।
मानो चिनगी अग्नि की, परि पुरानी घास॥

जिस क्षण नाम हृदय में धारण किया, उसी क्षण पाप नष्ट हो गए—जैसे आग की चिंगारी पुरानी सूखी घास पर गिरते ही सब भस्म कर देती है।

भक्ति और नाम-स्मरण
093

बाहर क्या दिखलाए, अंतर जपिए राम।
कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम॥

बाहरी दिखावा किसलिए? भीतर ही भीतर राम का जप करो। संसार को दिखाने से क्या प्रयोजन, तुम्हारा काम तो उस स्वामी से है।

भक्ति और नाम-स्मरण
096

कथा-कीर्तन कुल विशे, भवसागर की नाव।
कहत कबीरा या जगत में, नाहिं और उपाव॥

कथा और कीर्तन ही इस भवसागर को पार कराने वाली नाव हैं। कबीर कहते हैं—इस संसार में इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।

भक्ति और नाम-स्मरण
110

सुमरण की सुध यों करो, ज्यों गागर पनिहार।
होले-होले सुरत में, कहें कबीर विचार॥

स्मरण की सुध ऐसे रखो जैसे पनिहारिन बातें करती हुई भी सिर पर रखी गागर की सुध नहीं छोड़ती। कबीर कहते हैं—काम करते हुए भी भीतर सुरत लगी रहनी चाहिए।

भक्ति और नाम-स्मरण
122

अपने-अपने साख की, सबही लीनी मान।
हरि की बातें दुरंतरा, पूरी ना कहूँ जान॥

सबने अपनी-अपनी समझ और गवाही को ही सही मान लिया है। किंतु हरि की बातें बहुत गहरी हैं, उन्हें पूरी तरह कोई नहीं जान पाया। मत-मतांतर अधूरे अनुभव से जन्मते हैं।

भक्ति और नाम-स्मरण
137

उज्ज्वल पहरे कापड़ा, पान-सुपारी खाय।
एक हरि के नाम बिन, बाँधा यमपुर जाय॥

उजले वस्त्र पहनना और पान-सुपारी खाना—यह सब ठाठ किस काम का? एक हरि-नाम के बिना मनुष्य बँधकर यमपुरी ही जाता है। बाहरी सज-धज मुक्ति नहीं देती।

भक्ति और नाम-स्मरण
152

कबीरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार।
एक दिना है सोवना, लांबे पाँव पसार॥

सोते रहने से क्या लाभ? जागो और भगवान का जप करो। एक दिन तो लंबे पाँव पसारकर सदा के लिए सोना ही है। तब तक का समय भजन के लिए है।

भक्ति और नाम-स्मरण
167

ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत।
प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत॥

वे दिन व्यर्थ ही बीत गए जिनमें संतों की संगति न मिली। प्रेम के बिना जीवन पशु के समान है और भक्ति के बिना भगवान नहीं मिलते।

भक्ति और नाम-स्मरण
168

तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय।
माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय॥

तीर और बंदूक से लड़ने वाला सच्चा शूरवीर नहीं। असली वीर वह है जो माया को त्यागकर भक्ति करे—भीतर के शत्रुओं को जीतना कठिन है।

भक्ति और नाम-स्मरण
181

मथुरा भावै द्वारिका, भावे जो जगन्नाथ।
साधु संग हरि भजन बिनु, कछु न आवे हाथ॥

चाहे मथुरा जाओ, चाहे द्वारिका, चाहे जगन्नाथ—साधु की संगति और हरि के भजन के बिना कुछ हाथ नहीं आता। तीर्थाटन भाव का विकल्प नहीं है।

भक्ति और नाम-स्मरण
185

राम नाम चीन्हा नहीं, कीना पिंजर बास।
नैन न आवे नींद रे, अलग न आवे भास॥

राम-नाम को पहचाना नहीं और इस देह रूपी पिंजरे में ही बसे रहे। ऐसे में न आँखों में चैन की नींद आती है, न भीतर कोई प्रकाश उतरता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
195

राम-नाम कै पटंतरै, देबे कों कुछ नाहिं।
क्या ले गुर संतोषिए, हों स रही मन माँहि॥

राम-नाम के बदले देने योग्य मेरे पास कुछ भी नहीं। गुरु को क्या देकर संतुष्ट करूँ—यह कसक मन में ही रह जाती है। गुरु का ऋण चुकाया नहीं जा सकता।

भक्ति और नाम-स्मरण
201

राम पियारा छाँड़ि करि, करै आन का जाप।
बेस्या केरा पूत ज्यूँ, कहै कौन सूँ बाप॥

प्यारे राम को छोड़कर जो किसी और का जाप करता है, उसकी दशा उस बालक जैसी है जो नहीं जानता कि किसे पिता कहे। अनेक जगह भटकने से निष्ठा नहीं बनती।

भक्ति और नाम-स्मरण
204

लंबा मारग, दूरि घर, विकट पंथ, बहुमार।
कहौ संतों, क्यूँ पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार॥

मार्ग लंबा है, घर दूर है, रास्ता कठिन है और बीच में अनेक बाधाएँ हैं। हे संतो, बताओ—ऐसे में हरि के दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हों? यह साधक की व्याकुल जिज्ञासा है।

भक्ति और नाम-स्मरण
206

यह तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं।
लेखनि करूँ करंक की, लिखी-लिखी राम पठाउं॥

इस देह को जलाकर स्याही बना लूँ और उससे राम का नाम लिखूँ। हड्डियों की कलम बनाकर लिख-लिखकर राम को संदेश भेजूँ। यह विरह की चरम तीव्रता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
207

अंदेसड़ा न भाजिसी, सदै सो कहियां।
के हरि आयां भाजिसी, कै हरि ही पास गयां॥

मन की यह चिंता कहने भर से नहीं मिटेगी। यह तभी दूर होगी जब या तो हरि स्वयं आ जाएँ, या मैं ही हरि के पास पहुँच जाऊँ। मिलन के बिना बेचैनी नहीं जाती।

भक्ति और नाम-स्मरण
208

इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव।
लोही सींचो तेल ज्यूँ, कब मुख देख पठिउं॥

इस शरीर का दीपक बनाऊँ, जीव को बाती बनाऊँ और रक्त को तेल की तरह सींचूँ—तब कहीं जाकर प्रियतम का मुख देख पाऊँ। भक्ति में सर्वस्व होम करने का भाव।

भक्ति और नाम-स्मरण
209

अंषड़ियाँ झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।
जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि-पुकारि॥

राह देखते-देखते आँखों में झाइयाँ पड़ गईं और राम-राम पुकारते-पुकारते जीभ पर छाले पड़ गए। प्रतीक्षा की यह पीड़ा भक्त के समर्पण की गहराई बताती है।

भक्ति और नाम-स्मरण
219

दीठा है तो कस कहूँ, कह्या न को पितयाइ।
हरि जैसा है तैसा रहो, तू हरिष-हरिष गुण गाइ॥

जो देखा है उसे कहूँ कैसे, और कहूँ तो कोई विश्वास नहीं करता। हरि जैसे हैं वैसे ही रहें—तू बस प्रसन्न होकर उनके गुण गाता रह।

भक्ति और नाम-स्मरण
220

भारी कहों तो बहु डरों, हलका कहूँ तौ झूठ।
मैं का जाणी राम कों, नैनूं कबहूँ न दीठ॥

उसे भारी कहूँ तो डर लगता है और हलका कहूँ तो झूठ होगा। मैं राम को क्या जानूँ, आँखों से कभी देखा ही नहीं। यह ईश्वर के अवर्णनीय होने की विनम्र स्वीकृति है।

भक्ति और नाम-स्मरण
222

कबीर रेख स्यंदूर की, काजल दिया न जाइ।
नैनूं रमैया रमि रह्या, दूजा कहाँ समाइ॥

जहाँ सिंदूर की रेखा हो वहाँ काजल नहीं लगाया जा सकता। इन नेत्रों में तो राम ही रम रहे हैं, फिर दूसरा कोई कहाँ समाए? पूर्ण निष्ठा में द्वैत की जगह नहीं।

भक्ति और नाम-स्मरण
223

कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउं।
गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउं॥

मैं राम का कुत्ता हूँ और मोतिया मेरा नाम है। गले में राम की रस्सी बँधी है—वे जिधर खींचते हैं, मैं उधर ही चला जाता हूँ। यह पूर्ण समर्पण का भाव है।

भक्ति और नाम-स्मरण
226

भगति बिगाड़ी कामिया, इंद्री केरै स्वादि।
हीरा खोया हाथ थैं, जनम गँवाया बादि॥

कामी व्यक्ति ने इंद्रियों के स्वाद के लिए अपनी भक्ति बिगाड़ ली। हाथ आया हीरा खो दिया और सारा जन्म व्यर्थ गँवा दिया।

भक्ति और नाम-स्मरण
232

स्वामी हूवा सीतका, पैलाकार पचास।
राम-नाम काठें रह्या, करै सिषां की आंस॥

गुरु बनने की होड़ ऐसी लगी कि पचासों खड़े हो गए। राम-नाम तो एक ओर धरा रह गया और वे केवल शिष्यों से मिलने वाली भेंट की आशा लगाए बैठे हैं।

भक्ति और नाम-स्मरण
241

सबै रसाइण मैं किया, हरि सा और न कोई।
तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई॥

मैंने सारी रसायन-विधियाँ आजमा लीं, हरि-नाम जैसी कोई नहीं। यह तिल भर भी भीतर उतर जाए तो सारा शरीर कंचन हो जाता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
242

हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार।
मैमंता घूमत रहै, नाहिं तन की सार॥

हरि-रस पीना तभी माना जाए जब उसका नशा कभी न उतरे। पीने वाला मतवाला होकर घूमता रहता है और उसे अपने शरीर तक की सुध नहीं रहती।

भक्ति और नाम-स्मरण
243

कबीर हरि-रस यों पिया, बाकी रही न थाकि।
पाका कलस कुम्भार का, बहुरि न चढ़ई चाकि॥

कबीर ने हरि-रस ऐसे पिया कि कुछ बाकी न रहा। जैसे कुम्हार का पका हुआ घड़ा फिर चाक पर नहीं चढ़ता, वैसे ही सिद्ध जीव फिर जन्म-चक्र में नहीं आता।

भक्ति और नाम-स्मरण
254

कबीर पढ़ियो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाइ।
बावन आषिर सोधि करि, ररै ममैं चित्त लाइ॥

पढ़ने का अहंकार दूर करो और पोथियाँ बहा दो। बावन अक्षरों में से बस 'र' और 'म' को शुद्ध करके मन में बसा लो—राम-नाम ही पर्याप्त है।

भक्ति और नाम-स्मरण
255

मैं जान्यूँ पाढ़िबो भलो, पाढ़िबा थे भलो जोग।
राम-नाम सूं प्रीती करि, भल भल नींयो लोग॥

मैं समझता था पढ़ना अच्छा है, फिर लगा पढ़ने से योग अच्छा है। पर अंत में जाना कि राम-नाम से प्रीति करने वाले ही सबसे भले निकले।

भक्ति और नाम-स्मरण
260

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै में साँच है, ताके हिरदै हरि आप॥

सत्य के समान कोई तप नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य बसता है, उसके हृदय में स्वयं हरि निवास करते हैं।

भक्ति और नाम-स्मरण
268

मेरे संगी दोइ जरग, एक वैष्णौ एक राम।
वो है दाता मुक्ति का, वो सुमिरावै नाम॥

मेरे दो ही साथी हैं—एक वैष्णव संत और एक राम। राम मुक्ति के दाता हैं और संत नाम का स्मरण कराते रहते हैं।

भक्ति और नाम-स्मरण
273

कबीरा बन-बन में फिरा, कारणि आपणै राम।
राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सवेरे काम॥

अपने राम के लिए वन-वन भटकता फिरा। अंत में राम जैसे संत जन मिल गए और उन्होंने सारे काम सहज ही बना दिए।

भक्ति और नाम-स्मरण
286

जिनके नौबति बाजती, भगलैं बंधते बारि।
एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि॥

जिनके द्वार पर नौबत बजती थी और हाथी बँधते थे—एक हरि-नाम के बिना वे भी जन्म हारकर चले गए। वैभव मुक्ति नहीं देता।

भक्ति और नाम-स्मरण
289

नान्हा कातौ चित्त दे, महँगे मोल बिलाइ।
गाहक राजा राम है, और न नेडा आइ॥

मन लगाकर महीन सूत कातो, वह ऊँचे दाम बिकेगा। इसका ग्राहक स्वयं राजा राम है, और कोई पास भी नहीं फटकता। साधना निष्ठा से करो।

भक्ति और नाम-स्मरण
290

कबीर केवल राम की, तू जिनि छाँड़ै ओट।
घण-अहरनि बिचि लौह ज्यूँ, घणी सहै सिर चोट॥

केवल राम की ओट कभी मत छोड़ना। जैसे लोहा हथौड़े और निहाई के बीच रहकर चोटें सहता है और आकार पाता है, वैसे ही साधक को भी सहना पड़ता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
294

माला पहरयां कुछ नहीं, भगति न आई हाथ।
माथौ मूँछ मुंडाइ करि, चल्या जगत् के साथ॥

माला पहनने से कुछ नहीं हुआ, भक्ति हाथ नहीं आई। सिर और मूँछ मुँड़ाकर बस भीड़ के साथ चल पड़ा—भेड़चाल से साधना नहीं होती।

भक्ति और नाम-स्मरण
297

चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात।
एक निस प्रेही निरधार का, गाहक गोपीनाथ॥

चतुराई से हरि नहीं मिलते, यह तो केवल बातों की बात है। जो निष्कपट प्रेमी और निराधार है, उसके ग्राहक स्वयं गोपीनाथ हैं।

भक्ति और नाम-स्मरण
299

कबीर हरि का भावता, झीणां पंजर मांस।
रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मांस॥

हरि का सच्चा प्रेमी दुबला और क्षीण हो जाता है। रात को उसे नींद नहीं आती और शरीर पर मांस नहीं चढ़ता। विरह देह को गला देता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
302

जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूँ छाना होइ।
जतन-जतन करि दाबिये, तऊ उजाला सोइ॥

जिसके हृदय में हरि आ बसे, वह छिपा कैसे रह सकता है? लाख यत्न करके दबाओ, फिर भी उसका उजाला बाहर फूट पड़ता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
305

पावक रूपी राम है, घटि-घटि रह्या समाइ।
चित चकमक लागै नहीं, ता थै घूवाँ है-है जाइ॥

राम अग्नि के समान हर हृदय में समाए हैं। पर चित्त की चकमक रगड़ती नहीं, इसलिए ज्वाला नहीं उठती और सब धुआँ बनकर उड़ जाता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
309

कबीर कुल तौ सो भला, जिहि कुल उपजै दास।
जिहिं कुल दास न उपजै, सो कुल आक-पलास॥

वही कुल श्रेष्ठ है जिसमें कोई हरि का भक्त जन्म ले। जिस कुल में भक्त न उपजे, वह आक और पलाश जैसा निरर्थक है।

भक्ति और नाम-स्मरण
310

क्यूँ नृप-नारी नींदिये, क्यूँ पनिहारी कौ मान।
वा माँग सँवारे पील कौ, या नित उठि सुमिरै राम॥

रानी की निंदा और पनिहारिन का सम्मान क्यों? क्योंकि रानी केवल शृंगार में लगी रहती है, जबकि पनिहारिन नित्य उठकर राम का स्मरण करती है। मूल्य आचरण से तय होता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
311

काबा फिर कासी भया, राम भया रे रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम॥

काबा ही काशी बन गया और राम ही रहीम हो गए। मोटा आटा छनकर मैदा हो गया—अब कबीर बैठकर आराम से भोजन कर रहा है। भेदभाव मिट जाने का उल्लास।

भक्ति और नाम-स्मरण
314

कबीर का तू चितवै, का तेरा च्यंत्या होइ।
अनच्यंत्या हरिजी करै, जो तोहि च्यंत न होइ॥

तू किस बात की चिंता करता है, तेरे चिंता करने से क्या होगा? हरि वह सब कर देते हैं जिसकी तुझे चिंता तक नहीं थी।

भक्ति और नाम-स्मरण
321

जिस मरनै यै जग डरै, सो मेरे आनंद।
कब मरिहूँ कब देखिहूँ, पूरन परमानंद॥

जिस मृत्यु से यह सारा जगत डरता है, वही मेरे लिए आनंद है। कब मरूँ और कब उस पूर्ण परमानंद के दर्शन करूँ—भक्त के लिए मृत्यु मिलन का द्वार है।

भक्ति और नाम-स्मरण
324

कबीर हरि सब कूँ भजै, हरि कूँ भजै न कोइ।
जब लग आस सरीर की, तब लग दास न होइ॥

हरि तो सबका ध्यान रखते हैं, पर हरि को कोई नहीं भजता। जब तक शरीर के सुख की आशा बनी है, तब तक कोई सच्चा दास नहीं बन सकता।

भक्ति और नाम-स्मरण
325

सिर साटैं हरि सेवइये, छाँड़ि जीव की बाणि।
जे सिर दीया हरि मिलै, तब लगि हाणि न जाणि॥

जीवन के मोह की आदत छोड़कर सिर देकर हरि की सेवा करो। यदि सिर देने से हरि मिल जाएँ तो इसे घाटा मत समझो।

भक्ति और नाम-स्मरण
336

कबीर हरि के नाव सूँ, प्रीति रहै इकवार।
तौ मुख तैं मोती झड़ै, हीरे अंत न पार॥

यदि हरि के नाम से एक बार भी सच्ची प्रीति हो जाए तो मुख से मोती झड़ने लगते हैं और हीरों का कोई अंत नहीं रहता।

भक्ति और नाम-स्मरण
434

कबीर गुरु की भक्ति बिन, राजा ससभ होय।
माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय॥

गुरु की भक्ति के बिना राजा भी गधे जैसा है, जो कुम्हार की मिट्टी ढोता रहता है और कोई उसे घास तक नहीं डालता।

भक्ति और नाम-स्मरण
435

कबीर गुरु की भक्ति बिन, नारी कूकरी होय।
गली-गली भूँकत फिरै, टूक न डारै कोय॥

गुरु की भक्ति के बिना जीवन कुतिया जैसा है, जो गली-गली भौंकती फिरती है और कोई उसे टुकड़ा तक नहीं डालता।

भक्ति और नाम-स्मरण
468

छठे मास नहिं करि सके, बरस दिना करि लेय।
कहें कबीर सो भक्तजन, जमहिं चुनौती देय॥

छह महीने में भी न कर सको तो वर्ष में एक बार कर लो। कबीर कहते हैं—ऐसा भक्त यमराज को भी चुनौती दे देता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
542

कुलवंता कोटिक मिले, पंडित कोटि पचीस।
सुपच भक्त की पनहि में, तुलै न काहू शीश॥

करोड़ों कुलीन और पच्चीस करोड़ पंडित मिल जाएँ, तो भी उनका सिर एक नीच कुल के भक्त की जूती के बराबर भी नहीं तुलता।

भक्ति और नाम-स्मरण
557

गिरही सुवै साधु को, भाव भक्ति आनंद।
कहें कबीर बैरागी को, निरबानी निरदुंद॥

गृहस्थ के लिए साधु की सेवा, भाव, भक्ति और आनंद का मार्ग है। कबीर कहते हैं—वैरागी के लिए निर्वाण और निर्द्वंद्व अवस्था।

भक्ति और नाम-स्मरण
566

घर में रहै तो भक्ति करूँ, ना तरू करू बैराग।
बैरागी बंध करै, ताका बड़ा अभाग॥

घर में रहो तो भक्ति करो, नहीं तो वैराग्य ले लो। पर जो वैरागी होकर भी बंधन बना ले, उससे बड़ा अभागा कोई नहीं।

भक्ति और नाम-स्मरण
628

दासातन हिरदै बसै, साधु न सो अधीन।
कहें कबीर सो दास है, प्रेम भक्ति लवलीन॥

जिसके हृदय में दासभाव बसा हो और जो साधुओं के अधीन रहे—कबीर कहते हैं, वही सच्चा दास है, प्रेम-भक्ति में लीन।

भक्ति और नाम-स्मरण
630

भक्ति कठिन अति दुर्लभ, भेष सुगम नित सोय।
भक्ति जु न्यारी भेष से, यह जनै सब कोय॥

भक्ति अत्यंत कठिन और दुर्लभ है, जबकि वेश धारण करना सहज है। भक्ति वेश से सर्वथा भिन्न है—यह सब जान लें।

भक्ति और नाम-स्मरण
631

भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनंत।
ऊँच-नीच धर अवतरै, होय संत का अंत॥

भक्ति का बीज कभी नष्ट नहीं होता, चाहे अनंत युग बीत जाएँ। वह ऊँचे या नीचे कुल में जन्म लेकर भी अंततः संत बना ही देता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
632

भक्ति भाव भादों नदी, सबै चली घहराय।
सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय॥

भादों की नदी की तरह भक्ति-भाव सबमें उमड़ता है। पर सराहने योग्य वही नदी है जो जेठ की तपती गर्मी में भी बहती रहे।

भक्ति और नाम-स्मरण
633

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय॥

भक्ति मुक्ति की सीढ़ी है, जिस पर भक्त प्रसन्न होकर चढ़ता है। और कोई इस पर नहीं चढ़ सकता—अपने मन में यह समझ लो।

भक्ति और नाम-स्मरण
635

भक्ति पदारथ तब मिलै, जब गुरु होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय॥

भक्ति रूपी पदार्थ तभी मिलता है जब गुरु सहायक हों। प्रेम और प्रीति की भक्ति पूर्ण भाग्य से ही प्राप्त होती है।

भक्ति और नाम-स्मरण
636

भक्ति भेष बहु अंतरा, जैसे धरनि अकाश।
भक्त लीन गुरु चरण में, भेष जगत की आश॥

भक्ति और वेश में धरती-आकाश का अंतर है। भक्त गुरु के चरणों में लीन रहता है, जबकि वेशधारी जगत से आशा लगाए रहता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
638

भक्ति दुवारा साँकरा, राई दशवें भाय।
मन को मैगल होय रहा, कैसे आवै जाय॥

भक्ति का द्वार राई के दसवें भाग जितना सँकरा है। मन तो मतवाला हाथी बन बैठा है—वह उसमें से कैसे आ-जा सकेगा?

भक्ति और नाम-स्मरण
639

भक्ति बिना नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय।
शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय॥

भक्ति के बिना कोई पार नहीं उतरता, चाहे लाख उपाय कर ले। जो शब्द का स्नेही हो जाता है, वही अपने घर पहुँचता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
640

भक्ति नसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब धाय।
जिन-जिन आलस किया, जनम जनम पछिताय॥

भक्ति मुक्ति की सीढ़ी है, जिस पर संत दौड़कर चढ़ जाते हैं। जिन्होंने आलस्य किया, वे जन्म-जन्म पछताते हैं।

भक्ति और नाम-स्मरण
641

गुरु भक्ति अति कठिन है, ज्यों खाँड़े की धार।
बिना साँच पहुँचे नहीं, महा कठिन व्यवहार॥

गुरु-भक्ति तलवार की धार जैसी कठिन है। सच्चाई के बिना वहाँ पहुँचा नहीं जा सकता—यह अत्यंत कठिन व्यवहार है।

भक्ति और नाम-स्मरण
642

भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव।
भक्ति भाव इक रूप है, दोऊ एक सुभाव॥

भाव के बिना भक्ति नहीं और भक्ति के बिना भाव नहीं। भक्ति और भाव एक ही रूप हैं, दोनों का स्वभाव एक है।

भक्ति और नाम-स्मरण
643

कबीर गुरु की भक्ति का, मन में बहुत हुलास।
मन मनसा माजै नहीं, होन चहत है दास॥

गुरु-भक्ति का मन में बहुत उत्साह है, पर मन की कामनाएँ माँजी नहीं गईं—और चाहता है दास बनना। भीतर की सफाई पहले चाहिए।

भक्ति और नाम-स्मरण
644

कबीर गुरु की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार।
धुवाँ का सा धौरहरा, बिनसत लगै न बार॥

गुरु की भक्ति के बिना संसार का जीवन धिक्कार योग्य है। यह धुएँ के महल जैसा है, जिसे मिटने में देर नहीं लगती।

भक्ति और नाम-स्मरण
645

जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चितलाय।
कहें कबीर सतगुरु मिलै, आवागमन नशाय॥

जाति, वर्ण और कुल का अभिमान खोकर जो चित्त लगाकर भक्ति करता है—कबीर कहते हैं, उसे सतगुरु मिलते हैं और आवागमन मिट जाता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
646

देखा देखी भक्ति का, कबहुँ न चढ़ सी रंग।
बिपति पड़े यों छाड़सी, केचुलि तजत भुजंग॥

देखा-देखी की भक्ति का रंग कभी नहीं चढ़ता। विपत्ति पड़ते ही वह ऐसे छूट जाती है जैसे साँप केंचुल त्याग देता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
647

आरत है गुरु भक्ति करूँ, सब कारज सिध होय।
करम जाल भौजाल में, भक्त फँसे नहिं कोय॥

आर्त भाव से गुरु की भक्ति करो, सारे कार्य सिद्ध हो जाएँगे। कर्म-जाल और भव-जाल में सच्चा भक्त कभी नहीं फँसता।

भक्ति और नाम-स्मरण
649

निष्पक्षा की भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान।
निर्द्वंद्वी की भक्ति है, निर्लोभी निर्बान॥

भक्ति निष्पक्ष की होती है और ज्ञान निर्मोही का। निर्द्वंद्व की भक्ति सधती है और निर्लोभी को ही निर्वाण मिलता है।

भक्ति और नाम-स्मरण
650

तिमिर गया रवि देखते, कुमति गयी गुरु ज्ञान।
सुमति गयी अति लोभ ते, भक्ति गयी अभिमान॥

सूर्य देखते ही अंधकार गया और गुरु-ज्ञान से कुबुद्धि। पर अति लोभ से सद्बुद्धि चली गई और अभिमान से भक्ति।

भक्ति और नाम-स्मरण
651

खेत बिगारेउ खरतुआ, सभा बिगारी कूर।
भक्ति बिगारी लालची, ज्यों केसर में घूर॥

खरपतवार खेत बिगाड़ देता है और मूर्ख सभा को। लालची भक्ति को बिगाड़ देता है—जैसे केसर में कूड़ा मिल जाए।

भक्ति और नाम-स्मरण
652

ज्ञान सपूरण न भिदा, हिरदा नाहिं जुड़ाय।
देखा देखी भक्ति का, रंग नहीं ठहराय॥

जब तक ज्ञान पूरी तरह भीतर नहीं बिंधता, हृदय शांत नहीं होता। देखा-देखी की भक्ति का रंग ठहरता ही नहीं।

भक्ति और नाम-स्मरण
653

भक्ति पंथ बहुत कठिन है, रती न चालै खोट।
निराधार का खोल है, अधर धार की चोट॥

भक्ति का मार्ग बहुत कठिन है, इसमें रत्ती भर भी खोट नहीं चलती। यह निराधार पर टिकने और अधर धार की चोट सहने जैसा है।

भक्ति और नाम-स्मरण
654

भक्तन की यह रीति है, बंधे करे जो भाव।
परमारथ के कारने, यह तन रहो कि जाव॥

भक्तों की यही रीति है कि वे जिस भाव से बँध जाएँ उसे निभाते हैं। परमार्थ के लिए यह शरीर रहे या जाए, उन्हें परवाह नहीं।

भक्ति और नाम-स्मरण
655

भक्ति महल बहु ऊँच है, दूरिह ते दरशाय।
जो कोई जन भक्ति करे, शोभा बरनि न जाय॥

भक्ति का महल बहुत ऊँचा है, वह दूर से ही दिखाई देता है। जो कोई सच्ची भक्ति करता है, उसकी शोभा वर्णन से परे है।

भक्ति और नाम-स्मरण
656

और कर्म सब कर्म है, भक्ति कर्म निहकर्म।
कहें कबीर पुकारि के, भक्ति करो तजि भर्म॥

बाकी सब कर्म बंधन में डालने वाले कर्म हैं, केवल भक्ति ही निष्काम कर्म है। कबीर पुकारकर कहते हैं—भ्रम छोड़कर भक्ति करो।

भक्ति और नाम-स्मरण
657

विषय त्याग बैराग है, समता कहिये ज्ञान।
सुखदाई सब जीव सों, यही भक्ति परमान॥

विषयों का त्याग ही वैराग्य है और समता ही ज्ञान। सब जीवों के प्रति सुखदायी होना—यही भक्ति का प्रमाण है।

भक्ति और नाम-स्मरण
658

भक्ति निसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब आय।
नीचे बाधिनि लकु रही, कुचल पड़े कू खाय॥

भक्ति मुक्ति की सीढ़ी है जिस पर संत चढ़ जाते हैं। पर नीचे माया रूपी बाघिन घात लगाए बैठी है—जो फिसला, उसे वह दबोच लेती है।

भक्ति और नाम-स्मरण
659

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने मेव।
पूरण भक्ति जब मिलै, कृपा करे गुरुदेव॥

भक्ति-भक्ति सब कहते हैं, पर भक्ति का मर्म कोई नहीं जानता। पूर्ण भक्ति तभी मिलती है जब गुरुदेव कृपा करें।

भक्ति और नाम-स्मरण
703

कुल खोये कुल ऊबरै, कुल राखे कुल जाय।
राम निकुल कुल भेटिया, सब कुल गया बिलाय॥

कुल का अभिमान खो देने से कुल उबर जाता है और उसे पकड़े रखने से डूब जाता है। जो निष्कुल राम से मिल गया, उसका सारा कुल-भेद मिट गया।

भक्ति और नाम-स्मरण
705

दुनिया सेती दोसती, मुआ होत भजन में भंग।
एका एकी राम सों, कै साधु न के संग॥

दुनिया से दोस्ती करने पर भजन में विघ्न पड़ता है और जीवन यों ही बीत जाता है। नाता या तो अकेले राम से रखो या साधुओं के संग।

भक्ति और नाम-स्मरण
724

भय से भक्ति करै सबै, भय से पूजा होय।
भय पारस है जीव को, निरभय होय न कोय॥

भय से ही सब भक्ति करते हैं और भय से ही पूजा होती है। भय जीव के लिए पारस है—पूर्ण निर्भय तो कोई हो ही नहीं सकता।

भक्ति और नाम-स्मरण