सबै रसाइण मैं किया, हरि सा और न कोई।
तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई॥
मैंने सारी रसायन-विधियाँ आजमा लीं, हरि-नाम जैसी कोई नहीं। यह तिल भर भी भीतर उतर जाए तो सारा शरीर कंचन हो जाता है।
भक्ति और नाम-स्मरण