आज का दोहा › पाखंड और आडंबर

पाखंड और आडंबर पर कबीर के दोहे

29 दोहे · अर्थ सहित

003

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥

हाथ में माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मन की चंचलता और विकार नहीं बदले। कबीर कहते हैं—हाथ की माला छोड़ो और मन के मनके को फेरो; बाहरी दिखावे से नहीं, भीतर के सुधार से भक्ति होती है।

पाखंड और आडंबर
006

कबीरा माला मनहि की, और संसारी भीख।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख॥

सच्ची माला तो मन की होती है, बाकी सब सांसारिक दिखावा है। यदि केवल माला फेरने से ही भगवान मिल जाते, तो रहट में गले-गले माला-सी घूमती घड़ियाँ सबसे पहले उन्हें पा लेतीं।

पाखंड और आडंबर
043

कबीरा जपना काठ की, क्या दिखलावे मोय।
हृदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय॥

कबीर कहते हैं—काठ की माला दिखाकर मुझे क्या प्रभावित करना चाहते हो? जब हृदय से नाम का जप ही नहीं होगा, तो यह माला किस काम की? आडंबर भक्ति का विकल्प नहीं।

पाखंड और आडंबर
069

ज्यों तिल माहीं तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा साईं तुझमें, बस जाग सके तो जाग॥

जैसे तिल में तेल छिपा है और चकमक पत्थर में आग—वैसे ही तेरा स्वामी तेरे ही भीतर बसा है। बस जाग सके तो जाग जा। ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है।

पाखंड और आडंबर
121

साईं आगे साँच है, साईं साँच सुहाय।
चाहे बोले केस रख, चाहे घोंट मुंडाय॥

प्रभु के सामने केवल सच्चाई चलती है, उन्हें सत्य ही भाता है। फिर चाहे कोई केश रखे या सिर मुँड़ा ले—बाहरी वेश से कुछ नहीं होता। भीतर की सच्चाई ही मायने रखती है।

पाखंड और आडंबर
128

प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय।
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय॥

एक प्रेमभाव होना चाहिए, भेष चाहे जितने बना लो। फिर चाहे गृहस्थ रहो या वन में चले जाओ—स्थान से नहीं, भाव से भक्ति होती है।

पाखंड और आडंबर
170

न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय।
मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय॥

नहाने-धोने से क्या हुआ यदि मन का मैल न गया? मछली सदा जल में ही रहती है, फिर भी उसकी दुर्गंध धोने से नहीं जाती। बाहरी शुद्धि भीतरी शुद्धि नहीं है।

पाखंड और आडंबर
173

पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहार।
याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार॥

यदि पत्थर पूजने से भगवान मिलते तो मैं पूरा पहाड़ ही पूज लेता। इससे तो वह चक्की भली है जिससे पीसकर संसार भोजन पाता है। निर्जीव पूजा से उपयोगी वस्तु बेहतर है।

पाखंड और आडंबर
178

मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय।
बार-बार के मुड़ते, भेड़ न बैकुंठ जाय॥

यदि सिर मुँड़ाने से भगवान मिलते तो सब मुँड़ा लेते। भेड़ तो बार-बार मुँड़ती है, फिर भी वह बैकुंठ नहीं जाती। बाहरी क्रिया से मुक्ति नहीं मिलती।

पाखंड और आडंबर
258

काजी-मुल्ला भ्रमिया, चल्या युनीं कै साथ।
दिल थे दीन बिसारिया, करद लई जब हाथ॥

काजी और मुल्ला भी भ्रम में पड़कर भीड़ के साथ चल दिए। जब हाथ में छुरी उठा ली, तब दिल से धर्म को ही भुला बैठे। हिंसा में धर्म नहीं बचता।

पाखंड और आडंबर
263

तीरथ तो सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाय।
कबीर मूल निकंदिया, कौण हलाहल खाय॥

तीर्थ केवल फैली हुई बेलें हैं जिन्होंने सारे जगत को ढँक रखा है। कबीर ने तो जड़ ही उखाड़ दी—अब वह विष कौन खाए? बाहरी कर्मकांड की जड़ भ्रम है।

पाखंड और आडंबर
264

जप-तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत बेसास।
सूवै सैंबल सेविया, यौ जग चल्या निरास॥

जप-तप थोथे दिखाई देते हैं और तीर्थ-व्रत का भरोसा भी व्यर्थ। जैसे तोता सेमल के फल की आस में बैठा रहता है और खाली हाथ लौटता है, वैसे ही यह जग निराश चला जाता है।

पाखंड और आडंबर
265

जेती देखौ आत्म, तेता सालिगराम।
राधू प्रतषि देव है, नहीं पाथ सूँ काम॥

जितनी आत्माएँ दिखती हैं, उतने ही शालिग्राम हैं। साधु प्रत्यक्ष देवता है—पत्थर की मूर्ति से कोई काम नहीं। जीवित चेतना ही सच्चा देवस्थान है।

पाखंड और आडंबर
266

कबीर दुनिया देहुरै, सीत नवावन गंग जाइ।
हिरदा भीतर हरि बसै, तू ताहि सौ ल्यो लाइ॥

दुनिया मंदिर-मंदिर सिर नवाती है और गंगा नहाने जाती है। पर हरि तो हृदय के भीतर बसते हैं—तू अपना मन उन्हीं से लगा।

पाखंड और आडंबर
269

उज्ज्वल देखि न धीजिये, बग ज्यूँ माडै ध्यान।
धीर बौठि चपेटसी, यूँ ले बूड ज्ञान॥

उजला रंग देखकर विश्वास मत करो—बगुला भी ध्यान लगाए बैठा दिखता है। वह धीरे से झपट्टा मारता है और ज्ञान को डुबो देता है। दिखावटी साधु से सावधान रहो।

पाखंड और आडंबर
295

बैसनो भया तौ क्या भया, बूझा नहीं बबेक।
छापा तिलक बनाइ करि, दगहया अनेक॥

वैष्णव बन जाने से क्या हुआ, यदि विवेक नहीं समझा? छाप-तिलक लगाकर अनेकों को ठग लिया। चिह्न धारण करना धर्म नहीं है।

पाखंड और आडंबर
298

एष ले बूढ़ी पथमी, झूठे कुल की लार।
अलष बिसारयो भेष में, बूड़े काली धार॥

झूठे कुल के अभिमान की लार में सारी पृथ्वी डूब गई। भेष के चक्कर में उस अलक्ष्य को भुला दिया और काली धार में डूब गए।

पाखंड और आडंबर
438

झिरमिर झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेह।
माटी गलि पानी भई, पाहन वाही नेह॥

पत्थर पर रिमझिम वर्षा होती रही। मिट्टी तो गलकर पानी हो गई, पर पत्थर वैसा का वैसा ही रहा। कठोर हृदय पर उपदेश का असर नहीं होता।

पाखंड और आडंबर
553

बाना पहिरे सिंह का, चलै भेड़ की चाल।
बोली बोले सियार की, कुत्ता खवै फाल॥

पहनावा सिंह का और चाल भेड़ की, बोली सियार जैसी—ऐसे व्यक्ति की दुर्दशा निश्चित है। बाहरी वेश भीतर की कायरता नहीं ढकता।

पाखंड और आडंबर
565

धारा तो दोनों भली, बिरही के बैराग।
गिरही दासातन करे, बैरागी अनुराग॥

दोनों ही धाराएँ भली हैं। गृहस्थ सेवा-भाव निभाए और वैरागी अनुराग में रहे—दोनों अपने-अपने मार्ग पर श्रेष्ठ हैं।

पाखंड और आडंबर