प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय।
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय॥
एक प्रेमभाव होना चाहिए, भेष चाहे जितने बना लो। फिर चाहे गृहस्थ रहो या वन में चले जाओ—स्थान से नहीं, भाव से भक्ति होती है।
पाखंड और आडंबर
एक प्रेमभाव होना चाहिए, भेष चाहे जितने बना लो। फिर चाहे गृहस्थ रहो या वन में चले जाओ—स्थान से नहीं, भाव से भक्ति होती है।
पाखंड और आडंबर
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥
हाथ में माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मन की चंचलता और विकार नहीं बदले। कबीर कहते हैं—हाथ की माला छोड़ो और मन के मनके को फेरो; बाहरी दिखावे से नहीं, भीतर के सुधार से भक्ति होती है।
पाखंड और आडंबरकबीरा माला मनहि की, और संसारी भीख।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख॥
सच्ची माला तो मन की होती है, बाकी सब सांसारिक दिखावा है। यदि केवल माला फेरने से ही भगवान मिल जाते, तो रहट में गले-गले माला-सी घूमती घड़ियाँ सबसे पहले उन्हें पा लेतीं।
पाखंड और आडंबरकबीरा जपना काठ की, क्या दिखलावे मोय।
हृदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय॥
कबीर कहते हैं—काठ की माला दिखाकर मुझे क्या प्रभावित करना चाहते हो? जब हृदय से नाम का जप ही नहीं होगा, तो यह माला किस काम की? आडंबर भक्ति का विकल्प नहीं।
पाखंड और आडंबरज्यों तिल माहीं तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा साईं तुझमें, बस जाग सके तो जाग॥
जैसे तिल में तेल छिपा है और चकमक पत्थर में आग—वैसे ही तेरा स्वामी तेरे ही भीतर बसा है। बस जाग सके तो जाग जा। ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है।
पाखंड और आडंबर