आज का दोहा › प्रेम और विरह

प्रेम और विरह पर कबीर के दोहे

23 दोहे · अर्थ सहित

038

मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न कोय।
मोको रोवे सोई जन, जो शब्द बोध का होय॥

मैं संसार की दशा देखकर रोता हूँ, पर मेरे लिए कोई नहीं रोता। मेरे लिए वही रोएगा जिसे शब्द और ज्ञान का बोध होगा। सच्ची पीड़ा को केवल ज्ञानी ही पहचानता है।

प्रेम और विरह
059

लगी लगन छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय।
मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय॥

एक बार सच्ची लगन लग जाए तो वह छूटती नहीं, चाहे जीभ और चोंच जल जाए। अंगारे में कौन-सी मिठास है जो चकोर उसे चबाता है? प्रेम तर्क से परे है।

प्रेम और विरह
064

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा-प्रजा जोहि रुचे, शीश देई ले जाय॥

प्रेम न किसी बगीचे में उगता है और न बाजार में बिकता है। राजा हो या प्रजा—जिसे चाहिए, वह अपना शीश देकर ही ले जा सकता है। प्रेम का मूल्य समर्पण है।

प्रेम और विरह
065

प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय॥

जो प्रेम का प्याला पीता है, वह अपना सिर दक्षिणा में दे देता है। लोभी व्यक्ति सिर नहीं दे सकता, वह केवल प्रेम का नाम भर लेता है। कथनी और करनी का यही अंतर है।

प्रेम और विरह
083

छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय।
अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय॥

जो क्षण भर में चढ़ जाए और क्षण भर में उतर जाए, वह प्रेम नहीं। जो कभी घटे नहीं और हृदय रूपी पिंजरे में स्थायी रूप से बसा रहे, वही सच्चा प्रेम कहलाता है।

प्रेम और विरह
106

आग जो लागी समुद्र में, धुआँ न प्रकट होय।
सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय॥

समुद्र में लगी आग का धुआँ बाहर दिखाई नहीं देता। उस विरह की जलन को वही जानता है जो स्वयं उसमें जल चुका है। भीतर की पीड़ा बाहर से नहीं दिखती।

प्रेम और विरह
163

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान।
जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिन प्रान॥

जिस हृदय में प्रेम का संचार नहीं, उसे श्मशान के समान समझो। वह लोहार की धौंकनी की तरह है—साँस तो लेती है, पर उसमें प्राण नहीं होते।

प्रेम और विरह
183

ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुइँ धरे, तब बैठें घर माँहि॥

यह प्रेम का घर है, मौसी का घर नहीं कि सहज ही चले आओ। यहाँ तो सिर उतारकर भूमि पर रखना पड़ता है, तभी भीतर बैठने को मिलता है। प्रेम पूर्ण समर्पण माँगता है।

प्रेम और विरह
189

साँझ पड़े दिन बीतबै, चकवी दीन्ही रोय।
चल चकवा वा देश को, जहाँ रैन नहिं होय॥

साँझ होते ही दिन बीत गया और चकवी विरह में रो पड़ी। वह कहती है—हे चकवा, चलो उस देश को जहाँ रात होती ही नहीं। जीव उस अखंड प्रकाश के लोक को तरसता है।

प्रेम और विरह
202

कबीरा प्रेम न चषिया, चषि न लिया साव।
सूने घर का पाहुणा, ज्यूँ आया त्यूँ जाव॥

जिसने प्रेम का स्वाद नहीं चखा और उसका रस नहीं लिया, वह सूने घर के अतिथि जैसा है—जैसे आया था वैसे ही खाली लौट जाता है।

प्रेम और विरह
205

बिरह-भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम-बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥

विरह रूपी साँप शरीर में बस गया है, जिस पर कोई मंत्र काम नहीं करता। राम का वियोगी जीवित नहीं रह पाता, और यदि जीवित रहे तो बावला हो जाता है।

प्रेम और विरह
210

सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त।
और न कोई सुणि सकै, कै साईं के चित्त॥

यह शरीर रबाब है और सारी नसें उसके तार—विरह उन्हें नित्य बजाता रहता है। इस संगीत को और कोई नहीं सुन सकता, केवल स्वामी का मन ही सुनता है।

प्रेम और विरह
211

जो रोऊँ तो बल घटै, हँसों तो राम रिसाइ।
मन ही माँहि बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहि खाइ॥

रोऊँ तो शक्ति क्षीण होती है और हँसूँ तो राम अप्रसन्न होते हैं। इसलिए मन ही मन घुटता रहता हूँ, जैसे घुन भीतर ही भीतर लकड़ी को खा जाता है।

प्रेम और विरह
212

कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त।
बिन रोयां क्यूँ पाइये, प्रेम पियारा मित्त॥

हँसी-ठिठोली छोड़ो और मन को रोने की ओर लगाओ। बिना विरह में रोए वह प्रेम का प्यारा मित्र कैसे मिलेगा? आँसू भक्ति की सच्ची कसौटी हैं।

प्रेम और विरह
214

परबति परबति मैं फिरया, नैन गंवाए रोइ।
सो बूटी पाऊँ नहीं, जा ते जीवनि होइ॥

पर्वत-पर्वत भटकता फिरा और रो-रोकर आँखें गँवा दीं, पर वह संजीवनी बूटी नहीं मिली जिससे जीवन मिलता है। बाहर खोजने से वह तत्त्व नहीं मिलता।

प्रेम और विरह
217

जा कारणि मैं ढूँढ़ती, सनमुख मिलिया आइ।
धन मैली पिव ऊजला, लागि न सकों पाइ॥

जिसे ढूँढ़ती फिरती थी, वह सामने आ मिला। पर मैं (जीवात्मा) मैली हूँ और प्रियतम उज्ज्वल—इसलिए उसके चरणों में लग भी नहीं पा रही। पात्रता के बिना मिलन अधूरा है।

प्रेम और विरह
244

कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई।
सिर सोंपे सोई पिवै, नहीं तौ पिया न जाई॥

प्रेम की मधुशाला में बहुत लोग आकर बैठ जाते हैं, पर पीता वही है जो अपना सिर सौंप दे। समर्पण के बिना यह रस पिया नहीं जा सकता।

प्रेम और विरह
304

राम वियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्हे कोई।
तंबोली के पान ज्यूँ, दिन-दिन पीला होई॥

राम के वियोग में शरीर व्याकुल रहता है, पर इसे कोई पहचान नहीं पाता। वह तंबोली के पान की तरह दिन-प्रतिदिन पीला पड़ता जाता है।

प्रेम और विरह
317

मानि महतम प्रेम-रस, गरवातण गुण नेह।
ए सबही अहला गया, जबही कह्या कुछ देह॥

मान, महत्ता, प्रेम-रस, गौरव, गुण और स्नेह—ये सब उसी क्षण नष्ट हो गए जब मुँह से 'कुछ दो' कह दिया। याचना सारी गरिमा हर लेती है।

प्रेम और विरह
342

गोव्यंद के गुण बहुत हैं, लिखै जु हिरदै माहिं।
डरता पाणी जा पीऊँ, मति वै धोये जाहिं॥

गोविंद के अनेक गुण हृदय पर लिखे हैं। मैं पानी पीने भी डरते हुए जाता हूँ कि कहीं वे धुल न जाएँ। यह प्रेम की अत्यंत कोमल अभिव्यक्ति है।

प्रेम और विरह