मानि महतम प्रेम-रस, गरवातण गुण नेह।
ए सबही अहला गया, जबही कह्या कुछ देह॥
मान, महत्ता, प्रेम-रस, गौरव, गुण और स्नेह—ये सब उसी क्षण नष्ट हो गए जब मुँह से 'कुछ दो' कह दिया। याचना सारी गरिमा हर लेती है।
प्रेम और विरह