मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न कोय।
मोको रोवे सोई जन, जो शब्द बोध का होय॥
मैं संसार की दशा देखकर रोता हूँ, पर मेरे लिए कोई नहीं रोता। मेरे लिए वही रोएगा जिसे शब्द और ज्ञान का बोध होगा। सच्ची पीड़ा को केवल ज्ञानी ही पहचानता है।
प्रेम और विरह