छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय।
अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय॥
जो क्षण भर में चढ़ जाए और क्षण भर में उतर जाए, वह प्रेम नहीं। जो कभी घटे नहीं और हृदय रूपी पिंजरे में स्थायी रूप से बसा रहे, वही सच्चा प्रेम कहलाता है।
प्रेम और विरह