आज का दोहा › साधु के लक्षण

साधु के लक्षण पर कबीर के दोहे

99 दोहे · अर्थ सहित

016

शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन॥

शीलवान अर्थात् सदाचारी व्यक्ति सबसे बड़ा है—वह सभी रत्नों की खान है। तीनों लोकों की समस्त सम्पदा शील में ही समाई हुई है। चरित्र से बड़ी कोई पूँजी नहीं।

साधु के लक्षण
046

हद चाले सो मानव, बेहद चले सो साध।
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध॥

जो सीमाओं के भीतर चलता है वह साधारण मनुष्य है, जो सीमा से परे चला जाए वह साधु है। पर जो सीमा और असीम—दोनों को छोड़ दे, उसकी अवस्था अथाह और अवर्णनीय है।

साधु के लक्षण
058

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय॥

साधु का स्वभाव सूप जैसा होना चाहिए—जो सार्थक है उसे रख ले और थोथे को उड़ा दे। विवेक यही है कि गुण ग्रहण करो और निस्सार को छोड़ दो।

साधु के लक्षण
068

छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार।
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार॥

सत्यनाम दूध के समान है और सांसारिक व्यवहार पानी के समान। कोई विरला साधु ही हंस के समान होता है, जो दूध और पानी अलग करके सत्य को छान लेता है।

साधु के लक्षण
072

नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय।
कबीरा शीतल संत जन, नाम सनेही सोय॥

न चंद्रमा इतना शीतल है, न बर्फ। कबीर कहते हैं—सबसे शीतल तो वे संतजन हैं जो नाम से स्नेह रखते हैं। उनकी संगति ही मन को असली ठंडक देती है।

साधु के लक्षण
079

फूटी आँख विवेक की, लखे न संत असंत।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महंत॥

लोगों की विवेक-दृष्टि फूट गई है, वे संत और असंत में भेद नहीं कर पाते। जिसके साथ दस-बीस चेले दिख जाएँ, उसी को महंत मान लेते हैं। भीड़ को योग्यता का प्रमाण मान लेना भूल है।

साधु के लक्षण
088

संत ही में सत बाँटिए, रोटी में ते टूक।
कहे कबीर ता दास को, कबहूँ न आवे चूक॥

संतों के बीच सत्य बाँटो और अपनी रोटी में से भी टुकड़ा बाँटो। कबीर कहते हैं—ऐसे सेवक के जीवन में कभी कमी नहीं आती। बाँटने से घटता नहीं, बढ़ता है।

साधु के लक्षण
092

सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह।
शब्द बिना साधु नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह॥

शील सुख का सागर है, जिसकी थाह कोई नहीं पा सकता। जैसे धन के बिना कोई सेठ नहीं कहलाता, वैसे ही शब्द-ज्ञान के बिना कोई साधु नहीं होता।

साधु के लक्षण
097

कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा।
कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुन गा॥

कबीर कहते हैं—यह शरीर बीता जा रहा है, हो सके तो इसे किसी सार्थक ठिकाने लगा। या तो संतों की सेवा कर, या भगवान के गुण गा।

साधु के लक्षण
109

ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय।
सोरन कलश सुरा भरी, साधु निंदा सोय॥

ऊँचे कुल में जन्म लेने से क्या, यदि करनी ऊँची न हो? सोने के कलश में भी यदि मदिरा भरी हो तो संत उसकी निंदा ही करते हैं। पात्र नहीं, भीतर की वस्तु महत्त्व रखती है।

साधु के लक्षण
125

संत पुरुष की आरसी, संतों की ही देह।
लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख लेह॥

संत का शरीर ही दर्पण है। जो उस अलक्ष्य परमात्मा को देखना चाहता है, वह संतों में ही उसे देख ले। संत के आचरण में ईश्वर का प्रतिबिंब दिखाई देता है।

साधु के लक्षण
158

गाँठि न थामहिं बाँधही, नहिं नारी सो नेह।
कह कबीर वा साधु की, हम चरनन की खेह॥

जो न धन की गाँठ बाँधता है और न विषय-आसक्ति में उलझता है—कबीर कहते हैं, हम ऐसे साधु के चरणों की धूल हैं। निर्लोभ और निर्मोह ही साधुता है।

साधु के लक्षण
193

ऋद्धि सिद्धि माँगो नहीं, माँगो तुम पै येह।
निसि दिन दरशन साधु को, प्रभु कबीर कहुँ देह॥

मैं ऋद्धि-सिद्धि नहीं माँगता, हे प्रभु! तुमसे बस इतना माँगता हूँ कि रात-दिन संतों के दर्शन होते रहें। कबीर की यही एकमात्र याचना है।

साधु के लक्षण
234

ब्राह्मण गुरु जगत् का, साधू का गुरु नाहिं।
उरझि-पुरझि करि भरि रह्या, चारिउं बेदा माहिं॥

ब्राह्मण संसार का गुरु भले हो, साधु का गुरु नहीं हो सकता—क्योंकि वह चारों वेदों के शब्दजाल में ही उलझा रह गया, अनुभव तक नहीं पहुँचा।

साधु के लक्षण
277

हरिजन सेती रूसणा, संसारी सूँ हेत।
ते णर कदे न नीपजौ, ज्यूँ कालर का खेत॥

जो हरिभक्तों से रूठा रहता है और सांसारिक लोगों से प्रेम रखता है, वह कभी फलता-फूलता नहीं—जैसे ऊसर खेत में कोई फसल नहीं उगती।

साधु के लक्षण
301

निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह।
विषिया सूं न्यारा रहै, संतनि का अंग सह॥

किसी से बैर न रखना, निष्काम रहना, स्वामी से प्रेम करना और विषयों से अलग रहना—ये संतों के स्वाभाविक लक्षण हैं।

साधु के लक्षण
307

हैवर गैवर सघन धन, छत्रपती की नारि।
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि॥

घोड़े, हाथी, अपार धन और छत्रपति की रानी—इन सबकी तुलना उस हरिभक्त की पनिहारिन से भी नहीं की जा सकती। भक्ति के आगे वैभव तुच्छ है।

साधु के लक्षण
318

संत न बाँधै गाठड़ी, पेट समाता-तेइ।
साईं सूं सनमुख रहै, जहाँ माँगे तहां देइ॥

संत गठरी नहीं बाँधता, केवल पेट भर लेता है। वह स्वामी के सम्मुख रहता है और जहाँ माँगता है वहीं मिल जाता है।

साधु के लक्षण
331

कबीर चेरा संत का, दासनि का परदास।
कबीर ऐसें होइ रह्या, ज्यूँ पाऊँ तलि घास॥

मैं संतों का चेला हूँ और दासों का भी दास। कबीर ऐसा होकर रह गया है जैसे पैरों तले की घास। यह पूर्ण विनम्रता की अवस्था है।

साधु के लक्षण
457

आँखों देखा घी भला, न मुख मेला तेल।
साधु सो झगड़ा भला, ना साकट सों मेल॥

आँखों से देखा हुआ घी भला, पर मुँह में डाला हुआ तेल भी अच्छा नहीं। साधु से झगड़ा भी भला, पर नास्तिक से मेल-जोल अच्छा नहीं।

साधु के लक्षण
460

कबीर दर्शन साधु के, करत न कीजै कानि।
ज्यों उद्यम से लक्ष्मी, आलस मन से हानि॥

साधु के दर्शन करने में संकोच मत करो। जैसे उद्यम से लक्ष्मी आती है और आलस्य से हानि होती है, वैसे ही यहाँ भी।

साधु के लक्षण
471

साधु चलत रो दीजिये, कीजै अति सनमान।
कहें कबीर कछु भेट धरूँ, अपने बित्त अनुमान॥

साधु जाने लगें तो उन्हें रोक लो और खूब सम्मान करो। कबीर कहते हैं—अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ भेंट अवश्य अर्पित करो।

साधु के लक्षण
472

इन अटकाया न रुके, साधु दरश को जाय।
कहै कबीर सोई संतजन, मोक्ष मुक्ति फल पाय॥

जो इन बाधाओं से रुके नहीं और साधु के दर्शन को चल पड़े—कबीर कहते हैं, वही संतजन मोक्ष और मुक्ति का फल पाता है।

साधु के लक्षण
476

टूका माही टूक दे, चीर माहि सो चीर।
साधु देत न सकुचिये, यों कहि कहहिं कबीर॥

अपने टुकड़े में से टुकड़ा दो और अपने वस्त्र में से वस्त्र। साधु को देने में संकोच मत करो—कबीर यही कहते हैं।

साधु के लक्षण
477

कबीर लोंग-इलायची, दातुन, माटी पानि।
कहै कबीर संतन को, देत न कीजै कानि॥

लौंग, इलायची, दातुन, मिट्टी और पानी—जो भी साधारण वस्तु हो, संतों को देने में संकोच मत करो। भाव बड़ा है, वस्तु नहीं।

साधु के लक्षण
479

साधु शब्द समुद्र है, जामें रत्न भराय।
मंद भाग मट्ठी भरे, कंकर हाथ लगाय॥

साधु का वचन समुद्र है जिसमें रत्न भरे पड़े हैं। पर भाग्यहीन व्यक्ति मुट्ठी भरता है तो हाथ में कंकड़ ही आते हैं।

साधु के लक्षण
483

साधु बिरछ सतज्ञान फल, शीतल शब्द विचार।
जग में होते साधु नहिं, जर भरता संसार॥

साधु वह वृक्ष है जिस पर सत्यज्ञान के फल लगते हैं और जिसके शब्द शीतल छाया देते हैं। यदि जगत में साधु न होते तो संसार जलकर भस्म हो जाता।

साधु के लक्षण
491

कह अकाश को फेर है, कह धरती को तोल।
कहा साध की जाति है, कह पारस का मोल॥

आकाश का घेरा कौन बता सकता है और धरती का वजन कौन तौल सकता है? वैसे ही साधु की जाति पूछना और पारस का मोल लगाना व्यर्थ है।

साधु के लक्षण
493

साधु सिद्ध बहु अंतरा, साधु मता परचंड।
सिद्ध जुवारे आपको, साधु तारि नौ खंड॥

साधु और सिद्ध में बड़ा अंतर है, साधु का मत कहीं अधिक प्रचंड है। सिद्ध केवल स्वयं को तार लेता है, पर साधु नौ खंडों को तार देता है।

साधु के लक्षण
494

आशा वासा संत का, ब्रह्मा लखै न वेद।
षट दर्शन खटपट करै, बिरला पावै भेद॥

संत की आशा और निवास को ब्रह्मा और वेद तक नहीं जान पाते। छहों दर्शन आपस में खटपट करते रहते हैं, पर उस भेद को कोई विरला ही पाता है।

साधु के लक्षण
497

संत मिले जानि बीछुरों, बिछुरों यह मम प्रान।
शब्द सनेही ना मिले, प्राण देह में आन॥

संत मिल जाएँ तो मैं उनसे बिछड़ूँ नहीं, चाहे प्राण ही क्यों न बिछड़ जाएँ। जब तक शब्द का स्नेही न मिले, तब तक प्राण देह में अटके ही रहते हैं।

साधु के लक्षण
498

साधु ऐसा चाहिए, दुखै दुखावै नाहिं।
पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहिं॥

साधु ऐसा होना चाहिए जो न स्वयं दुखी हो, न किसी को दुखी करे। वह बगीचे में रहते हुए भी पत्ते-फूल को नहीं छेड़ता।

साधु के लक्षण
500

साधु कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर।
चढ़े तो चाखै प्रेम रस, गिरै तो चकनाचूर॥

साधु कहलाना खजूर के ऊँचे पेड़ पर चढ़ने जैसा है। चढ़ गया तो प्रेम-रस चखेगा और गिरा तो चकनाचूर हो जाएगा।

साधु के लक्षण
503

साधु भौरा जग कली, निशि दिन फिरै उदास।
टुक-टुक तहाँ विलंबिया, जहँ शीतल शब्द निवास॥

साधु भौंरा है और जगत कली। वह रात-दिन उदास घूमता रहता है और थोड़ी देर वहीं ठहरता है जहाँ शीतल शब्द का निवास हो।

साधु के लक्षण
504

साधू जन सब में रमें, दुख न काहू देहि।
अपने मत गाड़ा रहै, साधु न का मत येहि॥

साधुजन सबमें घुल-मिल जाते हैं और किसी को दुःख नहीं देते। वे अपने मत पर दृढ़ रहते हैं—साधु का यही स्वभाव है।

साधु के लक्षण
506

साधु-साधु सब एक है, जस अफीम का खेत।
कोई विवेकी लाल है, और सेत का सेत॥

देखने में सब साधु एक जैसे लगते हैं, जैसे अफीम का खेत। पर उनमें कोई विवेकी लाल फूल जैसा होता है और बाकी सफेद के सफेद।

साधु के लक्षण
508

साधु तो हीरा भया, न फूटै धन खाय।
न वह बिनभ कुम्भ ज्यों, ना वह आवै जाय॥

साधु हीरे के समान हो गया—वह चोट खाकर भी टूटता नहीं। वह कच्चे घड़े की तरह नष्ट नहीं होता और न आवागमन में पड़ता है।

साधु के लक्षण
511

दुख-सुख एक समान है, हरष शोक नहिं व्याप।
उपकारी निहकामता, उपजै छोह न ताप॥

जिसके लिए सुख-दुःख समान हैं, जिस पर हर्ष-शोक नहीं व्यापते, जो निष्काम भाव से उपकार करता है और जिसमें क्षोभ या ताप नहीं उपजता—वही संत है।

साधु के लक्षण
519

शीलवंत दृढ़ ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय॥

शीलवान हो, ज्ञान में दृढ़ हो, अत्यंत उदार चित्त हो, लज्जाशील और निष्कपट हो तथा कोमल हृदय वाला हो—यही साधु का स्वरूप है।

साधु के लक्षण
521

संत न छाड़ै संतता, कोटिक मिलै असंत।
मलय भुवंगय बेधिया, शीतलता न तजंत॥

करोड़ों दुर्जन मिल जाएँ तो भी संत अपनी संतता नहीं छोड़ता। चंदन का वृक्ष साँपों से लिपटा रहकर भी अपनी शीतलता नहीं त्यागता।

साधु के लक्षण
522

कमल पत्र हैं साधुजन, बसें जगत के माहिं।
बालक केरि धाय ज्यों, अपना जानत नाहिं॥

साधुजन कमल-पत्र के समान हैं—संसार में रहते हुए भी उससे अलिप्त। जैसे धाय बालक को पालती है पर अपना नहीं मानती।

साधु के लक्षण
523

बहता पानी निरमला, बंदा गंदा होय।
साधू जन रमा भला, दाग न लागै कोय॥

बहता पानी निर्मल रहता है और रुका हुआ गंदा हो जाता है। इसी तरह साधु का विचरते रहना अच्छा है, उससे कोई दाग नहीं लगता।

साधु के लक्षण
524

बँधा पानी निरमला, जो टूक गहिरा होय।
साधु जन बैठा भला, जो कुछ साधन होय॥

रुका हुआ पानी भी निर्मल रहता है यदि वह पर्याप्त गहरा हो। इसी तरह साधु का एक स्थान पर बैठना भी अच्छा है, बशर्ते साधना गहरी हो।

साधु के लक्षण
525

एक छाड़ि पय को गहें, ज्यों रे गऊ का बच्छ।
अवगुण छाड़ै गुण गहै, ऐसा साधु लच्छ॥

जैसे गाय का बछड़ा और सब छोड़कर दूध ही ग्रहण करता है, वैसे ही साधु अवगुण छोड़कर गुण ग्रहण करता है—यही उसका लक्षण है।

साधु के लक्षण
527

उड़गण और सुधाकरा, बसत नीर के संग।
यों साधू संसार में, कबीर फड़त न फंद॥

तारे और चंद्रमा जल में प्रतिबिंबित होकर भी उससे लिपटते नहीं। वैसे ही साधु संसार में रहकर भी उसके फंदे में नहीं फँसता।

साधु के लक्षण
530

ढोल दमामा गड़झड़ी, सहनाई और तूर।
तीनों निकसि न बाहुरें, साधु सती औ सूर॥

ढोल, नगाड़े, शहनाई और तुरही बजने के बीच जो निकल पड़ते हैं—साधु, सती और शूरवीर—ये तीनों फिर पीछे नहीं लौटते।

साधु के लक्षण
533

कबीर मेरा कोइ नहीं, हम काहू के नाहिं।
पारै पहुँची नाव ज्यों, मिलि कै बिछुरी जाहिं॥

मेरा कोई नहीं और मैं भी किसी का नहीं। जैसे नाव पार पहुँचते ही यात्री मिलकर बिछड़ जाते हैं, वैसा ही यह संसार है।

साधु के लक्षण
534

संत समागम परम सुख, जान अल्प सुख और।
मान सरोवर हंस है, बगुला ठौरे ठौर॥

संतों का समागम ही परम सुख है, बाकी सब सुख तुच्छ हैं। हंस केवल मानसरोवर में मिलता है, बगुले तो जगह-जगह मिल जाते हैं।

साधु के लक्षण
543

साधु दरशन महाफल, कोटि यज्ञ फल लेह।
इक मंदिर को का पड़ी, नगर शुद्ध करि लेह॥

साधु के दर्शन का महाफल है, करोड़ों यज्ञों का फल मिल जाता है। एक मंदिर की क्या बात, वे तो पूरे नगर को शुद्ध कर देते हैं।

साधु के लक्षण
545

संत मता गजराज का, चालै बंधन छोड़।
जग कुत्ता पीछे फिरें, सुनै न वाको सोर॥

संत का मत गजराज जैसा है—वह बंधन तोड़कर अपनी चाल चलता है। संसार रूपी कुत्ते पीछे भौंकते फिरते हैं, पर वह उनका शोर सुनता ही नहीं।

साधु के लक्षण
548

संत होत हैं हेत के, हेतु तहाँ चलि जाय।
कहें कबीर के हेत बिन, गरज कहाँ पितयाय॥

संत प्रेम के वश होते हैं और जहाँ प्रेम हो वहीं चले जाते हैं। कबीर कहते हैं—प्रेम के बिना केवल गरज से कहाँ विश्वास बनता है?

साधु के लक्षण
549

हेत बिना आवै नहीं, हेत तहाँ चलि जाय।
कबीर जल और संतजन, नवें तहाँ ठहराय॥

प्रेम के बिना संत नहीं आते, और जहाँ प्रेम हो वहाँ स्वयं चले जाते हैं। जल और संतजन—दोनों वहीं ठहरते हैं जहाँ झुकाव हो।

साधु के लक्षण