शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन॥
शीलवान अर्थात् सदाचारी व्यक्ति सबसे बड़ा है—वह सभी रत्नों की खान है। तीनों लोकों की समस्त सम्पदा शील में ही समाई हुई है। चरित्र से बड़ी कोई पूँजी नहीं।
साधु के लक्षण99 दोहे · अर्थ सहित
शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन॥
शीलवान अर्थात् सदाचारी व्यक्ति सबसे बड़ा है—वह सभी रत्नों की खान है। तीनों लोकों की समस्त सम्पदा शील में ही समाई हुई है। चरित्र से बड़ी कोई पूँजी नहीं।
साधु के लक्षणहद चाले सो मानव, बेहद चले सो साध।
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध॥
जो सीमाओं के भीतर चलता है वह साधारण मनुष्य है, जो सीमा से परे चला जाए वह साधु है। पर जो सीमा और असीम—दोनों को छोड़ दे, उसकी अवस्था अथाह और अवर्णनीय है।
साधु के लक्षणसाधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय॥
साधु का स्वभाव सूप जैसा होना चाहिए—जो सार्थक है उसे रख ले और थोथे को उड़ा दे। विवेक यही है कि गुण ग्रहण करो और निस्सार को छोड़ दो।
साधु के लक्षणछीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार।
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार॥
सत्यनाम दूध के समान है और सांसारिक व्यवहार पानी के समान। कोई विरला साधु ही हंस के समान होता है, जो दूध और पानी अलग करके सत्य को छान लेता है।
साधु के लक्षणनहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय।
कबीरा शीतल संत जन, नाम सनेही सोय॥
न चंद्रमा इतना शीतल है, न बर्फ। कबीर कहते हैं—सबसे शीतल तो वे संतजन हैं जो नाम से स्नेह रखते हैं। उनकी संगति ही मन को असली ठंडक देती है।
साधु के लक्षणफूटी आँख विवेक की, लखे न संत असंत।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महंत॥
लोगों की विवेक-दृष्टि फूट गई है, वे संत और असंत में भेद नहीं कर पाते। जिसके साथ दस-बीस चेले दिख जाएँ, उसी को महंत मान लेते हैं। भीड़ को योग्यता का प्रमाण मान लेना भूल है।
साधु के लक्षणसंत ही में सत बाँटिए, रोटी में ते टूक।
कहे कबीर ता दास को, कबहूँ न आवे चूक॥
संतों के बीच सत्य बाँटो और अपनी रोटी में से भी टुकड़ा बाँटो। कबीर कहते हैं—ऐसे सेवक के जीवन में कभी कमी नहीं आती। बाँटने से घटता नहीं, बढ़ता है।
साधु के लक्षणसुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह।
शब्द बिना साधु नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह॥
शील सुख का सागर है, जिसकी थाह कोई नहीं पा सकता। जैसे धन के बिना कोई सेठ नहीं कहलाता, वैसे ही शब्द-ज्ञान के बिना कोई साधु नहीं होता।
साधु के लक्षणकबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा।
कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुन गा॥
कबीर कहते हैं—यह शरीर बीता जा रहा है, हो सके तो इसे किसी सार्थक ठिकाने लगा। या तो संतों की सेवा कर, या भगवान के गुण गा।
साधु के लक्षणऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय।
सोरन कलश सुरा भरी, साधु निंदा सोय॥
ऊँचे कुल में जन्म लेने से क्या, यदि करनी ऊँची न हो? सोने के कलश में भी यदि मदिरा भरी हो तो संत उसकी निंदा ही करते हैं। पात्र नहीं, भीतर की वस्तु महत्त्व रखती है।
साधु के लक्षणसंत पुरुष की आरसी, संतों की ही देह।
लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख लेह॥
संत का शरीर ही दर्पण है। जो उस अलक्ष्य परमात्मा को देखना चाहता है, वह संतों में ही उसे देख ले। संत के आचरण में ईश्वर का प्रतिबिंब दिखाई देता है।
साधु के लक्षणसाधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध।
आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध॥
साधु, सती और शूरवीर—इनकी बात अथाह है। ये तीनों देह के मोह की आशा छोड़ देते हैं और शरीर से अथक साधना करते हैं।
साधु के लक्षणगाँठि न थामहिं बाँधही, नहिं नारी सो नेह।
कह कबीर वा साधु की, हम चरनन की खेह॥
जो न धन की गाँठ बाँधता है और न विषय-आसक्ति में उलझता है—कबीर कहते हैं, हम ऐसे साधु के चरणों की धूल हैं। निर्लोभ और निर्मोह ही साधुता है।
साधु के लक्षणऋद्धि सिद्धि माँगो नहीं, माँगो तुम पै येह।
निसि दिन दरशन साधु को, प्रभु कबीर कहुँ देह॥
मैं ऋद्धि-सिद्धि नहीं माँगता, हे प्रभु! तुमसे बस इतना माँगता हूँ कि रात-दिन संतों के दर्शन होते रहें। कबीर की यही एकमात्र याचना है।
साधु के लक्षणब्राह्मण गुरु जगत् का, साधू का गुरु नाहिं।
उरझि-पुरझि करि भरि रह्या, चारिउं बेदा माहिं॥
ब्राह्मण संसार का गुरु भले हो, साधु का गुरु नहीं हो सकता—क्योंकि वह चारों वेदों के शब्दजाल में ही उलझा रह गया, अनुभव तक नहीं पहुँचा।
साधु के लक्षणहरिजन सेती रूसणा, संसारी सूँ हेत।
ते णर कदे न नीपजौ, ज्यूँ कालर का खेत॥
जो हरिभक्तों से रूठा रहता है और सांसारिक लोगों से प्रेम रखता है, वह कभी फलता-फूलता नहीं—जैसे ऊसर खेत में कोई फसल नहीं उगती।
साधु के लक्षणस्वाँग पहिरि सो रहा भया, खाया-पीया खूंदि।
जिहि तेरी साधु नीकले, सो तो मेल्ही मूंदि॥
साधु का स्वाँग पहनकर खा-पीकर सो गया। जिस मार्ग से सच्ची साधुता निकलती, उसे तो बंद ही कर दिया।
साधु के लक्षणनिरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह।
विषिया सूं न्यारा रहै, संतनि का अंग सह॥
किसी से बैर न रखना, निष्काम रहना, स्वामी से प्रेम करना और विषयों से अलग रहना—ये संतों के स्वाभाविक लक्षण हैं।
साधु के लक्षणहैवर गैवर सघन धन, छत्रपती की नारि।
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि॥
घोड़े, हाथी, अपार धन और छत्रपति की रानी—इन सबकी तुलना उस हरिभक्त की पनिहारिन से भी नहीं की जा सकती। भक्ति के आगे वैभव तुच्छ है।
साधु के लक्षणसंत न बाँधै गाठड़ी, पेट समाता-तेइ।
साईं सूं सनमुख रहै, जहाँ माँगे तहां देइ॥
संत गठरी नहीं बाँधता, केवल पेट भर लेता है। वह स्वामी के सम्मुख रहता है और जहाँ माँगता है वहीं मिल जाता है।
साधु के लक्षणकबीर चेरा संत का, दासनि का परदास।
कबीर ऐसें होइ रह्या, ज्यूँ पाऊँ तलि घास॥
मैं संतों का चेला हूँ और दासों का भी दास। कबीर ऐसा होकर रह गया है जैसे पैरों तले की घास। यह पूर्ण विनम्रता की अवस्था है।
साधु के लक्षणखूंदन तौ धरती सहै, बाढ़ सहै बनराइ।
कुसबद तौ हरिजन सहै, दूजै सह्या न जाइ॥
रौंदा जाना धरती सहती है और कटना वनराजि। कटु वचन तो केवल हरिभक्त ही सह सकता है, दूसरे से यह सहा नहीं जाता।
साधु के लक्षणपशुआ सों पालो परो, रहू-रहू हिया न खीज।
ऊसर बीज न उगसी, बोवै दूना बीज॥
यदि पशु जैसे व्यक्ति से पाला पड़ जाए तो बार-बार मन में खीझो मत। ऊसर भूमि में बीज नहीं उगता, चाहे दूना बीज बो दो।
साधु के लक्षणआँखों देखा घी भला, न मुख मेला तेल।
साधु सो झगड़ा भला, ना साकट सों मेल॥
आँखों से देखा हुआ घी भला, पर मुँह में डाला हुआ तेल भी अच्छा नहीं। साधु से झगड़ा भी भला, पर नास्तिक से मेल-जोल अच्छा नहीं।
साधु के लक्षणकबीर दर्शन साधु का, बड़े भाग दरशाय।
जो होवै सूली सजा, काँटे ई टरि जाय॥
साधु के दर्शन बड़े भाग्य से होते हैं। उनके प्रभाव से सूली की सजा भी काँटे की चुभन में बदल जाती है।
साधु के लक्षणकबीर सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय।
अंक भरे भरि भेटिये, पाप शरीर जाय॥
वही दिन भला है जिस दिन साधु मिल जाएँ। उन्हें गले लगाकर मिलने से शरीर के पाप दूर हो जाते हैं।
साधु के लक्षणकबीर दर्शन साधु के, करत न कीजै कानि।
ज्यों उद्यम से लक्ष्मी, आलस मन से हानि॥
साधु के दर्शन करने में संकोच मत करो। जैसे उद्यम से लक्ष्मी आती है और आलस्य से हानि होती है, वैसे ही यहाँ भी।
साधु के लक्षणकई बार नाहिं कर सके, दोय बखत करि लेय।
कबीर साधु दरश ते, काल दगा नहिं देय॥
यदि कई बार न कर सको तो दिन में दो बार ही साधु-दर्शन कर लो। इससे काल धोखा नहीं दे पाता।
साधु के लक्षणदूजे दिन नहिं करि सके, तीजे दिन करू जाय।
कबीर साधु दरश ते, मोक्ष मुक्ति फल पाय॥
यदि दूसरे दिन न कर सको तो तीसरे दिन जाकर कर लो। साधु के दर्शन से मोक्ष और मुक्ति का फल मिलता है।
साधु के लक्षणतीजे चौथे नहिं करे, बार-बार करू जाय।
यामें विलंब न कीजिये, कहें कबीर समुझाय॥
तीसरे-चौथे दिन भी न कर सको तो जब भी अवसर मिले जाओ। इसमें विलंब मत करो—कबीर समझाकर यही कहते हैं।
साधु के लक्षणदोय बखत नहिं करि सके, दिन में करूँ इक बार।
कबीर साधु दरश ते, उतरें भव जल पार॥
दो बार न कर सको तो दिन में एक बार ही कर लो। साधु के दर्शन से भवसागर पार हो जाता है।
साधु के लक्षणपाख-पाख नहिं करि सकै, मास मास करू जाय।
यामें देर न लाइये, कहें कबीर समुदाय॥
पखवाड़े में न कर सको तो महीने में एक बार जाओ। इसमें देर मत लगाओ—कबीर सबको यही समझाते हैं।
साधु के लक्षणबरस-बरस नाहिं करि सकै, ताको लागे दोष।
कहै कबीर वा जीव सो, कबहु न पावै योष॥
जो वर्ष में एक बार भी साधु-दर्शन न कर सके, उसे दोष लगता है। कबीर कहते हैं—ऐसा जीव कभी संतोष नहीं पाता।
साधु के लक्षणमास-मास नहिं करि सकै, उठे मास अलबत्त।
यामें ढील न कीजिये, कहै कबीर अविगत्त॥
महीने-महीने न कर सको तो जब भी अवसर उठे अवश्य कर लो। इसमें ढील मत करो—कबीर यह अटल बात कहते हैं।
साधु के लक्षणमात-पिता सुत इस्तरी, आलस्य बंधू कानि।
साधु दरश को जब चलें, ये अटकावै आनि॥
माता, पिता, पुत्र, पत्नी, आलस्य, भाई-बंधु और लोकलाज—जब साधु के दर्शन को चलो तो ये सब आकर रोकते हैं।
साधु के लक्षणसाधु चलत रो दीजिये, कीजै अति सनमान।
कहें कबीर कछु भेट धरूँ, अपने बित्त अनुमान॥
साधु जाने लगें तो उन्हें रोक लो और खूब सम्मान करो। कबीर कहते हैं—अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ भेंट अवश्य अर्पित करो।
साधु के लक्षणइन अटकाया न रुके, साधु दरश को जाय।
कहै कबीर सोई संतजन, मोक्ष मुक्ति फल पाय॥
जो इन बाधाओं से रुके नहीं और साधु के दर्शन को चल पड़े—कबीर कहते हैं, वही संतजन मोक्ष और मुक्ति का फल पाता है।
साधु के लक्षणखाली साधु न बिदा करूँ, सुन लीजै सब कोय।
कहै कबीर कछु भेंट धरूँ, जो तेरे घर होय॥
साधु को खाली हाथ विदा मत करो, यह सब सुन लें। कबीर कहते हैं—जो कुछ तुम्हारे घर में हो, वही भेंट कर दो।
साधु के लक्षणसुनिये पार जो पाइया, छाजन भोजन आनि।
कहै कबीर सतनं को, देत न कीजै कानि॥
जो पार पाना चाहते हो तो संतों को आश्रय और भोजन दो। कबीर कहते हैं—संतों को देने में कभी संकोच मत करो।
साधु के लक्षणकबीर दरशन साधु के, खाली हाथ न जाय।
यही सीख बुध लीजिए, कहै कबीर बुझाय॥
साधु के दर्शन को खाली हाथ मत जाओ। बुद्धिमान लोग यही शिक्षा ग्रहण करें—कबीर समझाकर कहते हैं।
साधु के लक्षणटूका माही टूक दे, चीर माहि सो चीर।
साधु देत न सकुचिये, यों कहि कहहिं कबीर॥
अपने टुकड़े में से टुकड़ा दो और अपने वस्त्र में से वस्त्र। साधु को देने में संकोच मत करो—कबीर यही कहते हैं।
साधु के लक्षणकबीर लोंग-इलायची, दातुन, माटी पानि।
कहै कबीर संतन को, देत न कीजै कानि॥
लौंग, इलायची, दातुन, मिट्टी और पानी—जो भी साधारण वस्तु हो, संतों को देने में संकोच मत करो। भाव बड़ा है, वस्तु नहीं।
साधु के लक्षणसाधु आवत देखिकर, हँसी हमारी देह।
माथा का ग्रह उतरा, नैनन बढ़ा सनेह॥
साधु को आते देखकर हमारा शरीर खिल उठा। माथे का बोझ उतर गया और आँखों में स्नेह उमड़ आया।
साधु के लक्षणसाधु शब्द समुद्र है, जामें रत्न भराय।
मंद भाग मट्ठी भरे, कंकर हाथ लगाय॥
साधु का वचन समुद्र है जिसमें रत्न भरे पड़े हैं। पर भाग्यहीन व्यक्ति मुट्ठी भरता है तो हाथ में कंकड़ ही आते हैं।
साधु के लक्षणसाधु आया पाहुना, माँगे चार रतन।
धूनी पानी साथरा, सरधा सेती अन्न॥
साधु अतिथि बनकर आए तो चार ही वस्तुएँ माँगता है—धूनी के लिए स्थान, पानी, बिछौना और श्रद्धा से दिया हुआ अन्न।
साधु के लक्षणसाधु आवत देखिके, मन में करै भरोर।
सो तो होसी चूहड़ा, बसै गाँव की ओर॥
साधु को आते देखकर जिसका मन कुढ़ने लगे, उसका भाव नीच है। भीतर की संकीर्णता ही व्यक्ति को छोटा बनाती है।
साधु के लक्षणसाधु बिरछ सतज्ञान फल, शीतल शब्द विचार।
जग में होते साधु नहिं, जर भरता संसार॥
साधु वह वृक्ष है जिस पर सत्यज्ञान के फल लगते हैं और जिसके शब्द शीतल छाया देते हैं। यदि जगत में साधु न होते तो संसार जलकर भस्म हो जाता।
साधु के लक्षणसाधु बड़े परमारथी, शीतल जिनके अंग।
तपन बुझावै ओर की, दे दे अपनो रंग॥
साधु बड़े परोपकारी होते हैं, उनका अंग-अंग शीतल है। वे दूसरों की तपन बुझाते हैं और अपना रंग भी दे देते हैं।
साधु के लक्षणआवत साधु न हरखिया, जात न दीया रोय।
कहै कबीर वा दास की, मुक्ति कहाँ से होय॥
साधु के आने पर जो प्रसन्न न हुआ और जाने पर जिसकी आँख न भरी—कबीर कहते हैं, उस व्यक्ति की मुक्ति कैसे होगी?
साधु के लक्षणछाजन भोजन प्रीति सो, दीजै साधु बुलाय।
जीवन जस है जगन में, अंत परम पद पाय॥
साधु को बुलाकर प्रेम से आश्रय और भोजन दो। इससे जीवन में यश मिलता है और अंत में परम पद की प्राप्ति होती है।
साधु के लक्षणसरवर तरवर संत जन, चौथा बरसे मेह।
परमारथ के कारने, चारों धारी देह॥
सरोवर, वृक्ष, संतजन और वर्षा—इन चारों ने परोपकार के लिए ही देह धारण की है। ये सब देने के लिए हैं, लेने के लिए नहीं।
साधु के लक्षणबिरछा कबहुँ न फल भखै, नदी न अंचय नीर।
परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर॥
वृक्ष कभी अपना फल नहीं खाता और नदी अपना जल नहीं पीती। इसी तरह साधु ने भी परोपकार के लिए ही शरीर धारण किया है।
साधु के लक्षणसुख देवै दुख को हरे, दूर करे अपराध।
कहै कबीर वह कब मिले, परम सनेही साध॥
जो सुख दे, दुःख हरे और अपराध दूर कर दे—कबीर कहते हैं, ऐसा परम स्नेही साधु कब मिलेगा?
साधु के लक्षणकह अकाश को फेर है, कह धरती को तोल।
कहा साध की जाति है, कह पारस का मोल॥
आकाश का घेरा कौन बता सकता है और धरती का वजन कौन तौल सकता है? वैसे ही साधु की जाति पूछना और पारस का मोल लगाना व्यर्थ है।
साधु के लक्षणसाधु सिद्ध बहु अंतरा, साधु मता परचंड।
सिद्ध जुवारे आपको, साधु तारि नौ खंड॥
साधु और सिद्ध में बड़ा अंतर है, साधु का मत कहीं अधिक प्रचंड है। सिद्ध केवल स्वयं को तार लेता है, पर साधु नौ खंडों को तार देता है।
साधु के लक्षणआशा वासा संत का, ब्रह्मा लखै न वेद।
षट दर्शन खटपट करै, बिरला पावै भेद॥
संत की आशा और निवास को ब्रह्मा और वेद तक नहीं जान पाते। छहों दर्शन आपस में खटपट करते रहते हैं, पर उस भेद को कोई विरला ही पाता है।
साधु के लक्षणकोटि-कोटि तीरथ करै, कोटि कोटि करु धाय।
जब लग साधु न सेवई, तब लग काचा काम॥
करोड़ों तीर्थ कर लो और करोड़ों बार दौड़ लगा लो—जब तक साधु की सेवा नहीं की, तब तक सारा काम कच्चा ही है।
साधु के लक्षणवेद थके, ब्रह्मा थके, याके सेस महेस।
गीता हूँ कि गत नहीं, संत किया परवेस॥
वेद थक गए, ब्रह्मा थके, शेष और महेश भी थके। गीता तक उस गति को नहीं पा सकी, पर संत ने उसमें प्रवेश कर लिया।
साधु के लक्षणसंत मिले जानि बीछुरों, बिछुरों यह मम प्रान।
शब्द सनेही ना मिले, प्राण देह में आन॥
संत मिल जाएँ तो मैं उनसे बिछड़ूँ नहीं, चाहे प्राण ही क्यों न बिछड़ जाएँ। जब तक शब्द का स्नेही न मिले, तब तक प्राण देह में अटके ही रहते हैं।
साधु के लक्षणसाधु ऐसा चाहिए, दुखै दुखावै नाहिं।
पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहिं॥
साधु ऐसा होना चाहिए जो न स्वयं दुखी हो, न किसी को दुखी करे। वह बगीचे में रहते हुए भी पत्ते-फूल को नहीं छेड़ता।
साधु के लक्षणसाधु कहावन कठिन है, ज्यों खाँड़े की धार।
डगमगाय तो गिर पड़े, निहचल उतरे पार॥
साधु कहलाना तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन है। जो डगमगाया वह गिर पड़ा, और जो अडिग रहा वही पार उतरा।
साधु के लक्षणसाधु कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर।
चढ़े तो चाखै प्रेम रस, गिरै तो चकनाचूर॥
साधु कहलाना खजूर के ऊँचे पेड़ पर चढ़ने जैसा है। चढ़ गया तो प्रेम-रस चखेगा और गिरा तो चकनाचूर हो जाएगा।
साधु के लक्षणसाधु चाल जु चालई, साधु की चाल।
बिन साधन तो सुधि नाहिं, साधु कहाँ ते होय॥
जो साधु की चाल चले, वही साधु है। साधना के बिना सुध ही नहीं आती, फिर साधुता कहाँ से आएगी?
साधु के लक्षणसाधु सोई जानिये, चलै साधु की चाल।
परमारथ राता रहै, बोलै बचन रसाल॥
साधु उसी को जानो जो साधु की चाल चले, परमार्थ में रँगा रहे और रसीले वचन बोले।
साधु के लक्षणसाधु भौरा जग कली, निशि दिन फिरै उदास।
टुक-टुक तहाँ विलंबिया, जहँ शीतल शब्द निवास॥
साधु भौंरा है और जगत कली। वह रात-दिन उदास घूमता रहता है और थोड़ी देर वहीं ठहरता है जहाँ शीतल शब्द का निवास हो।
साधु के लक्षणसाधू जन सब में रमें, दुख न काहू देहि।
अपने मत गाड़ा रहै, साधु न का मत येहि॥
साधुजन सबमें घुल-मिल जाते हैं और किसी को दुःख नहीं देते। वे अपने मत पर दृढ़ रहते हैं—साधु का यही स्वभाव है।
साधु के लक्षणसाधु सती और सूरमा, राखा रहै न ओट।
माथा बाँधि पताक सों, नेजा घालें चोट॥
साधु, सती और शूरवीर छिपकर नहीं रहते। वे माथे पर पताका बाँधकर सामने आते हैं और खुलकर वार करते हैं।
साधु के लक्षणसाधु-साधु सब एक है, जस अफीम का खेत।
कोई विवेकी लाल है, और सेत का सेत॥
देखने में सब साधु एक जैसे लगते हैं, जैसे अफीम का खेत। पर उनमें कोई विवेकी लाल फूल जैसा होता है और बाकी सफेद के सफेद।
साधु के लक्षणसाधु सती औ सिंह को, ज्यों ले घन त्यों शोभ।
सिंह न मारे मेढ़का, साधु न बाँधै लोभ॥
साधु, सती और सिंह की शोभा उनके स्वभाव में है। सिंह मेंढक नहीं मारता और साधु को लोभ नहीं बाँध सकता।
साधु के लक्षणसाधु तो हीरा भया, न फूटै धन खाय।
न वह बिनभ कुम्भ ज्यों, ना वह आवै जाय॥
साधु हीरे के समान हो गया—वह चोट खाकर भी टूटता नहीं। वह कच्चे घड़े की तरह नष्ट नहीं होता और न आवागमन में पड़ता है।
साधु के लक्षणदुख-सुख एक समान है, हरष शोक नहिं व्याप।
उपकारी निहकामता, उपजै छोह न ताप॥
जिसके लिए सुख-दुःख समान हैं, जिस पर हर्ष-शोक नहीं व्यापते, जो निष्काम भाव से उपकार करता है और जिसमें क्षोभ या ताप नहीं उपजता—वही संत है।
साधु के लक्षणमानपमान न चित धरै, औरन को सनमान।
जो कोई आशा करै, उपदेशै तेहि ज्ञान॥
मान-अपमान को मन में न रखे, दूसरों का सम्मान करे और जो कोई जिज्ञासा लेकर आए उसे ज्ञान का उपदेश दे।
साधु के लक्षणजौन चाल संसार की, जौ साधु को नाहिं।
डिंभ चाल करनी करे, साधु कहो मत ताहि॥
जो संसार की चाल है वह साधु की नहीं होती। जो पाखंड की चाल चले, उसे साधु मत कहो।
साधु के लक्षणशीलवंत दृढ़ ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय॥
शीलवान हो, ज्ञान में दृढ़ हो, अत्यंत उदार चित्त हो, लज्जाशील और निष्कपट हो तथा कोमल हृदय वाला हो—यही साधु का स्वरूप है।
साधु के लक्षणकोई आवै भाव ले, कोई अभाव लै आव।
साधु दोऊ को पोषते, भाव न गिनै अभाव॥
कोई श्रद्धा लेकर आता है और कोई विरोध लेकर। साधु दोनों का ही पोषण करते हैं, वे भाव और अभाव का भेद नहीं गिनते।
साधु के लक्षणसंत न छाड़ै संतता, कोटिक मिलै असंत।
मलय भुवंगय बेधिया, शीतलता न तजंत॥
करोड़ों दुर्जन मिल जाएँ तो भी संत अपनी संतता नहीं छोड़ता। चंदन का वृक्ष साँपों से लिपटा रहकर भी अपनी शीतलता नहीं त्यागता।
साधु के लक्षणकमल पत्र हैं साधुजन, बसें जगत के माहिं।
बालक केरि धाय ज्यों, अपना जानत नाहिं॥
साधुजन कमल-पत्र के समान हैं—संसार में रहते हुए भी उससे अलिप्त। जैसे धाय बालक को पालती है पर अपना नहीं मानती।
साधु के लक्षणबहता पानी निरमला, बंदा गंदा होय।
साधू जन रमा भला, दाग न लागै कोय॥
बहता पानी निर्मल रहता है और रुका हुआ गंदा हो जाता है। इसी तरह साधु का विचरते रहना अच्छा है, उससे कोई दाग नहीं लगता।
साधु के लक्षणबँधा पानी निरमला, जो टूक गहिरा होय।
साधु जन बैठा भला, जो कुछ साधन होय॥
रुका हुआ पानी भी निर्मल रहता है यदि वह पर्याप्त गहरा हो। इसी तरह साधु का एक स्थान पर बैठना भी अच्छा है, बशर्ते साधना गहरी हो।
साधु के लक्षणएक छाड़ि पय को गहें, ज्यों रे गऊ का बच्छ।
अवगुण छाड़ै गुण गहै, ऐसा साधु लच्छ॥
जैसे गाय का बछड़ा और सब छोड़कर दूध ही ग्रहण करता है, वैसे ही साधु अवगुण छोड़कर गुण ग्रहण करता है—यही उसका लक्षण है।
साधु के लक्षणजौन भाव उपर रहै, भितर बसावै सोय।
भीतर और न बसावई, ऊपर और न होय॥
जो भाव बाहर दिखे वही भीतर भी हो। भीतर कुछ और न बसा हो और बाहर कुछ और न दिखे—यही सरलता है।
साधु के लक्षणउड़गण और सुधाकरा, बसत नीर के संग।
यों साधू संसार में, कबीर फड़त न फंद॥
तारे और चंद्रमा जल में प्रतिबिंबित होकर भी उससे लिपटते नहीं। वैसे ही साधु संसार में रहकर भी उसके फंदे में नहीं फँसता।
साधु के लक्षणतन में शीतल शब्द है, बोले वचन रसाल।
कहें कबीर ता साधु को, गंजि सकै न काल॥
जिसके भीतर शीतल शब्द बसा है और जो रसीले वचन बोलता है—कबीर कहते हैं, उस साधु को काल भी नष्ट नहीं कर सकता।
साधु के लक्षणतूटै बरत आकाश सों, कौन सकत है झेल।
साधु सती और सूर का, अनी ऊपर का खेल॥
आकाश से गिरती बिजली को कौन झेल सकता है? साधु, सती और शूरवीर का खेल भी वैसा ही है—भाले की नोक पर चलने जैसा।
साधु के लक्षणढोल दमामा गड़झड़ी, सहनाई और तूर।
तीनों निकसि न बाहुरें, साधु सती औ सूर॥
ढोल, नगाड़े, शहनाई और तुरही बजने के बीच जो निकल पड़ते हैं—साधु, सती और शूरवीर—ये तीनों फिर पीछे नहीं लौटते।
साधु के लक्षणजुवा चोरी मुखबिरी, ब्याज बिरानी नारि।
जो चाहै दीदार को, इतनी वस्तु निवारि॥
जुआ, चोरी, चुगली, ब्याजखोरी और पराई स्त्री—जो प्रभु के दर्शन चाहता है, वह इन सबका त्याग कर दे।
साधु के लक्षणकबीर मेरा कोइ नहीं, हम काहू के नाहिं।
पारै पहुँची नाव ज्यों, मिलि कै बिछुरी जाहिं॥
मेरा कोई नहीं और मैं भी किसी का नहीं। जैसे नाव पार पहुँचते ही यात्री मिलकर बिछड़ जाते हैं, वैसा ही यह संसार है।
साधु के लक्षणसंत समागम परम सुख, जान अल्प सुख और।
मान सरोवर हंस है, बगुला ठौरे ठौर॥
संतों का समागम ही परम सुख है, बाकी सब सुख तुच्छ हैं। हंस केवल मानसरोवर में मिलता है, बगुले तो जगह-जगह मिल जाते हैं।
साधु के लक्षणसंत मिले सुख ऊपजै, दुष्ट मिले दुख होय।
सेवा कीजै साधु की, जन्म कृतारथ होय॥
संत मिलने से सुख उपजता है और दुष्ट मिलने से दुःख। साधु की सेवा करो, जन्म कृतार्थ हो जाएगा।
साधु के लक्षणयह कलियुग आयो अबै, साधु न जाने कोय।
कामी क्रोधी मस्खरा, तिनकी पूजा होय॥
अब कलियुग आ गया है, साधु को कोई नहीं पहचानता। कामी, क्रोधी और ठिठोली करने वालों की ही पूजा होती है।
साधु के लक्षणसाधु दरशन महाफल, कोटि यज्ञ फल लेह।
इक मंदिर को का पड़ी, नगर शुद्ध करि लेह॥
साधु के दर्शन का महाफल है, करोड़ों यज्ञों का फल मिल जाता है। एक मंदिर की क्या बात, वे तो पूरे नगर को शुद्ध कर देते हैं।
साधु के लक्षणसाधु दरश को जाइये, जेता धरिये पाँय।
डग-डग पे असमेध जग, है कबीर समुझाय॥
साधु के दर्शन को जाते हुए जितने कदम रखे जाएँ, हर कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है—कबीर यही समझाते हैं।
साधु के लक्षणसंत मता गजराज का, चालै बंधन छोड़।
जग कुत्ता पीछे फिरें, सुनै न वाको सोर॥
संत का मत गजराज जैसा है—वह बंधन तोड़कर अपनी चाल चलता है। संसार रूपी कुत्ते पीछे भौंकते फिरते हैं, पर वह उनका शोर सुनता ही नहीं।
साधु के लक्षणआज काल दिन पाँच में, बरस पाँच जुग पंच।
जब तब साधू तारसी, और सकल पर पंच॥
आज-कल, पाँच दिन, पाँच वर्ष या पाँच युग—देर-सबेर साधु ही तारेंगे। बाकी सब तो केवल पंचायती बातें हैं।
साधु के लक्षणसाधु ऐसा चाहिए, जहाँ रहै तहँ गैब।
बानी के बिस्तार में, ताकूँ कोटिक ऐब॥
साधु ऐसा चाहिए जो जहाँ रहे, गुप्त-सा रहे। जो वाणी के विस्तार में लगा रहता है, उसमें करोड़ों दोष आ जाते हैं।
साधु के लक्षणसंत होत हैं हेत के, हेतु तहाँ चलि जाय।
कहें कबीर के हेत बिन, गरज कहाँ पितयाय॥
संत प्रेम के वश होते हैं और जहाँ प्रेम हो वहीं चले जाते हैं। कबीर कहते हैं—प्रेम के बिना केवल गरज से कहाँ विश्वास बनता है?
साधु के लक्षणहेत बिना आवै नहीं, हेत तहाँ चलि जाय।
कबीर जल और संतजन, नवें तहाँ ठहराय॥
प्रेम के बिना संत नहीं आते, और जहाँ प्रेम हो वहाँ स्वयं चले जाते हैं। जल और संतजन—दोनों वहीं ठहरते हैं जहाँ झुकाव हो।
साधु के लक्षणसाधु ऐसा चाहिए, जाका पूरा मंग।
विपत्ति पड़े छाड़ै नहीं, चढ़े चौगुना रंग॥
साधु ऐसा चाहिए जिसका संकल्प पूरा हो। विपत्ति पड़ने पर भी वह साथ न छोड़े, बल्कि उसका रंग चौगुना चढ़ जाए।
साधु के लक्षणसंत सेव गुरु बंदगी, गुरु सुमिरन वैराग।
येता तबही पाइये, पूरन मस्तक भाग॥
संतों की सेवा, गुरु की वंदना, गुरु का स्मरण और वैराग्य—ये सब तभी मिलते हैं जब मस्तक का भाग्य पूर्ण हो।
साधु के लक्षण