आज का दोहा › संतोष और त्याग

संतोष और त्याग पर कबीर के दोहे

19 दोहे · अर्थ सहित

008

साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥

हे प्रभु! मुझे इतना ही दीजिए जिसमें मेरा परिवार भरण-पोषण पा सके—न मैं भूखा रहूँ और न मेरे द्वार से कोई साधु भूखा लौटे। यह संतोष और सादगी की प्रार्थना है, धन-संचय की नहीं।

संतोष और त्याग
023

आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर॥

जो इस संसार में आया है वह जाएगा ही—चाहे राजा हो, गरीब हो या फकीर। कोई सिंहासन पर सवार होकर विदा होता है, कोई जंजीरों में बँधकर; पर जाना सबको है।

संतोष और त्याग
107

साधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय।
आगे-पीछे हरि खड़े, जब भोगे तब देय॥

साधु कल के लिए गाँठ नहीं बाँधता, केवल पेट भर लेता है। आगे-पीछे स्वयं हरि खड़े हैं—जब आवश्यकता होगी तब वे स्वयं दे देंगे। संग्रह अविश्वास का चिह्न है।

संतोष और त्याग
120

जो तू चाहे मुक्ति को, छोड़े दे सब आस।
मुक्त ही जैसा हो रहे, बस कुछ तेरे पास॥

यदि तू मुक्ति चाहता है तो सारी आशाएँ छोड़ दे। जब तू मुक्त जैसा हो जाएगा, तब सब कुछ अपने आप तेरे पास होगा। इच्छाओं का त्याग ही मुक्ति का द्वार है।

संतोष और त्याग
261

खूब खाँड है खीचड़ी, माहि पड्याँ टुक लून।
देख पराई चूपड़ी, जी ललचावे कौन॥

थोड़ा-सा नमक पड़ी खिचड़ी भी शक्कर जैसी मीठी है। फिर पराई चुपड़ी रोटी देखकर मन क्यों ललचाए? अपने में संतोष हो तो दूसरे का वैभव नहीं खलता।

संतोष और त्याग
337

बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार।
दुहुँ चूका रीता पड़ै, वाकूँ वार न पार॥

वैरागी वही भला जो सचमुच विरक्त हो और गृहस्थ वही जिसका चित्त उदार हो। जो दोनों में चूक जाए, वह खाली रह जाता है और उसका कोई ठिकाना नहीं।

संतोष और त्याग
567

उदर समाता माँगि ले, ताको नाहिं दोष।
कहें कबीर अधिका गहै, ताकि गति न मोष॥

पेट भर के लिए माँग लेने में कोई दोष नहीं। कबीर कहते हैं—जो आवश्यकता से अधिक ग्रहण करता है, उसकी न गति होती है न मोक्ष।

संतोष और त्याग
569

माँगन गै सो भर रहै, भरे जु माँगन जाहिं।
तिन ते पहिले वे मरे, होत करत है नाहिं॥

जो माँगने गया वह भरा नहीं और जो भरे थे वे भी माँगने चले गए। ऐसे लोग जीते-जी ही मरे हुए हैं—उनसे कुछ बनता-होता नहीं।

संतोष और त्याग
573

सहत मिलै सो दूध है, माँगि मिलै सा पानि।
कहें कबीर वह रक्त है, जामें एंचातानि॥

जो सहज मिल जाए वह दूध है, माँगकर मिले वह पानी। कबीर कहते हैं—जिसमें खींचतान करनी पड़े, वह तो रक्त के समान है।

संतोष और त्याग
574

अनमाँगा उत्तम कहा, मध्यम माँगि जो लेय।
कहें कबीर निकृष्टि सो, पर धर धरना देय॥

बिना माँगे मिले वह उत्तम, माँगकर लिया जाए वह मध्यम। कबीर कहते हैं—सबसे निकृष्ट वह है जो दूसरे के द्वार पर धरना देकर ले।

संतोष और त्याग
575

अनमाँगा तो अति भला, माँगि लिया नहिं दोष।
उदर समाता माँगि ले, निश्चय पावै योष॥

बिना माँगे मिलना अत्यंत उत्तम है, और पेट भर के लिए माँग लेने में भी दोष नहीं। उतने से ही संतोष निश्चित मिल जाता है।

संतोष और त्याग