रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय।
हीरा जन्म अनमोल था, कौड़ी बदले जाय॥
रात सोने में और दिन खाने-पीने में बीत गया। यह मनुष्य-जन्म हीरे के समान अनमोल था, पर कौड़ियों के मोल गँवा दिया गया। जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, आत्म-कल्याण है।
काल और मृत्यु121 दोहे · अर्थ सहित
रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय।
हीरा जन्म अनमोल था, कौड़ी बदले जाय॥
रात सोने में और दिन खाने-पीने में बीत गया। यह मनुष्य-जन्म हीरे के समान अनमोल था, पर कौड़ियों के मोल गँवा दिया गया। जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, आत्म-कल्याण है।
काल और मृत्युदुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारंबार।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार॥
मनुष्य-जन्म अत्यंत दुर्लभ है, यह देह बार-बार नहीं मिलती। जैसे वृक्ष से गिरा पत्ता फिर उसी डाली पर नहीं लगता, वैसे ही बीता जीवन लौटकर नहीं आता।
काल और मृत्युमाँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख॥
माँगना मृत्यु के समान है—किसी से भीख मत माँगो। सतगुरु की शिक्षा यही है कि हाथ फैलाने से मर जाना बेहतर है। स्वाभिमान और परिश्रम से जीना ही मनुष्य की शोभा है।
काल और मृत्युदस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन।
रहे को अचरज है, गए अचंभा कौन॥
यह शरीर दस द्वारों वाला पिंजरा है, इसमें रहने वाला जीव-पक्षी किसी का अपना नहीं। आश्चर्य तो इसका ठहरे रहने पर है; उड़ जाने पर अचरज कैसा? मृत्यु स्वाभाविक है, जीवन ही विस्मय है।
काल और मृत्युबँधे मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार॥
बंधन में पड़ा मरा, रोगी मरा, सारा संसार ही मरता रहा। एक कबीर नहीं मरा, क्योंकि उसका आधार राम-नाम है। नाम का सहारा जिसे मिल जाए, वह अमर हो जाता है।
काल और मृत्युसमझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय।
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए॥
समझाने पर भी जो नहीं समझता और दूसरों के बहकावे में बिक जाता है—मैं तुझे अपनी ओर खींच रहा हूँ, और तू यमपुरी की ओर बढ़ा जा रहा है। हठ अंततः पतन कराता है।
काल और मृत्युकाया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय।
काया वैद्य ईश बस, मर्म न काहू पाय॥
यह शरीर लकड़ी है और काल घुन के समान, जो धीरे-धीरे उसे खाता रहता है। इस काया का वैद्य केवल ईश्वर है; इसका रहस्य कोई नहीं पा सका।
काल और मृत्युलोग भरोसे कौन के, बैठे रहें उरगाय।
जीय रही लूटत जम फिरे, मूढ़ा लूटे कसाय॥
लोग किसके भरोसे निश्चिंत होकर बैठे हैं? यमराज चारों ओर जीवन लूटता फिर रहा है और मूर्ख को कसाई की तरह लूट ले जाता है। यह प्रमाद के विरुद्ध चेतावनी है।
काल और मृत्युखेत ना छोड़े सूरमा, जूझे दो दल मोह।
आशा जीवन मरण की, मन में राखें नोह॥
सच्चा वीर रणभूमि नहीं छोड़ता, चाहे दोनों ओर से मोह के दल घेर लें। वह जीने-मरने की आशा मन में नहीं रखता। साधना में भी ऐसी ही अडिगता चाहिए।
काल और मृत्युकेतन दिन ऐसे गए, अन रूचे का नेह।
अवसर बोवे उपजे नहीं, जो नहीं बरसे मेह॥
कितने ही दिन ऐसे बीत गए जिनमें बेमन का स्नेह निभाया गया। जैसे वर्षा न हो तो बोया बीज नहीं उगता, वैसे ही भाव के बिना संबंध फलते नहीं।
काल और मृत्युकहे कबीर देय तू, जब तक तेरी देह।
देह खेह हो जाएगी, कौन कहेगा देह॥
कबीर कहते हैं—जब तक यह देह है तब तक दान करता जा। जब यह देह मिट्टी हो जाएगी, तब तुझसे देने को कौन कहेगा? अवसर देह के रहते ही है।
काल और मृत्युकबीर यह जग कुछ नहीं, खिन खारा खिन मीठ।
काल्ह जो बैठा भंडपै, आज मसाने दीठ॥
यह संसार कुछ भी नहीं—क्षण में खारा, क्षण में मीठा। जो कल सिंहासन पर बैठा दिखता था, आज श्मशान में दिखाई दे रहा है। सब कुछ क्षणभंगुर है।
काल और मृत्युचलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोय॥
चलती चक्की देखकर कबीर रो पड़े—दो पाटों के बीच आकर कोई साबुत नहीं बचा। इसी तरह काल के दो पाटों के बीच पिसकर कोई भी बचा नहीं रह पाता।
काल और मृत्युझूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद।
जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद॥
लोग झूठे सुख को ही सुख कहते हैं और मन उसी में प्रसन्न रहता है। पर यह सारा जगत काल का चबेना है—कुछ उसके मुँह में है और कुछ गोद में रखा है।
काल और मृत्युपानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।
देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात॥
मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले जैसा है। देखते ही देखते वह मिट जाएगा, जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं। जीवन अत्यंत क्षणिक है।
काल और मृत्युपत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय।
अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय॥
पत्ता वृक्ष से बोला—हे वनराज, सुनो! अब बिछुड़ गए तो फिर मिलना न होगा, बहुत दूर जा पड़ेंगे। यह जीवन के अनिवार्य वियोग का मार्मिक चित्र है।
काल और मृत्युमाली आवत देख के, कलियन करी पुकार।
फूल-फूल चुन लिए, काल हमारी बार॥
माली को आते देखकर कलियाँ पुकार उठीं—आज खिले फूल चुन लिए गए, कल हमारी बारी है। काल सबको क्रमशः ले जाता है, कोई बचा नहीं रहता।
काल और मृत्युलकड़ी कहै लुहार की, तू मति जारे मोहि।
एक दिन ऐसा होयगा, मैं जारूँगी तोहि॥
लकड़ी लुहार से कहती है—तू मुझे मत जला, एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुझे जलाऊँगी। जो आज दूसरे को कष्ट देता है, कल उसी की बारी आती है।
काल और मृत्युतीरथ करि-करि जग मुवा, डूंधै पाणी न्हाइ।
रामहि राम जपंता, काल घसीटया जाइ॥
तीर्थ कर-करके और गंदे पानी में नहाकर सारा जग मर गया। राम-राम रटते हुए भी काल उन्हें घसीटकर ले जाता है—क्रिया भर से भीतर नहीं बदलता।
काल और मृत्युएक दिन ऐसा होएगा, सब सूँ पड़े बिछोइ।
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होइ॥
एक दिन ऐसा आएगा जब सबसे बिछोह हो जाएगा। हे राजा, राणा, छत्रपति—अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते?
काल और मृत्युकबीर नौबत आपणी, दिन-दस लेहू बजाइ।
ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ॥
अपनी नौबत दस दिन बजा लो। ये नगर, ये कस्बे और ये गलियाँ फिर लौटकर देखने को नहीं मिलेंगी।
काल और मृत्युकबीर घोड़ा प्रेम का, चेतनि चाढ़ि असवार।
ज्ञान खड्ग गहि काल सिरि, भली मचाई मार॥
प्रेम का घोड़ा है और चेतना उस पर सवार। ज्ञान की तलवार थामकर काल के सिर पर ऐसी मार मचाई कि वह भी हार गया।
काल और मृत्युजीवन थैं मरिबो भलौ, जो मरि जानै कोइ।
मरनै पहली जे मरै, जो कलि अजरावर होइ॥
यदि कोई मरना जान ले तो जीने से मरना भला है। जो मृत्यु से पहले ही अहंकार को मार दे, वह अजर-अमर हो जाता है।
काल और मृत्युबारी-बारी आपणी, चले पियारे म्यंत।
तेरी बारी रे जिया, नेड़ी आवै नित्त॥
एक-एक करके सारे प्यारे मित्र चले गए। हे जीव! तेरी बारी भी नित्य निकट आती जा रही है।
काल और मृत्युसुरति करौ मेरे साइयाँ, हम हैं भोजन माँहि।
आपे ही बहि जाहिंगे, जौ नहिं पकरौ बाँहि॥
हे मेरे स्वामी, मेरी सुध लो—मैं तो काल के भोजन में पड़ा हूँ। यदि तुमने बाँह न पकड़ी तो अपने आप बहा चला जाऊँगा।
काल और मृत्युसाधु मिलै यह सब हलै, काल जाल जम चोट।
शीश नवावत ढहि परै, अघ पावन को पोट॥
साधु मिल जाएँ तो काल का जाल और यम की चोट—सब हट जाते हैं। सिर झुकाते ही पापों की गठरी ढहकर गिर जाती है।
काल और मृत्युआज काल के लोग हैं, मिलि कै बिछुरी जाहिं।
लाहा कारण आपने, सौगंध राम कि खाहिं॥
आजकल के लोग मिलते हैं और बिछड़ जाते हैं। अपने लाभ के लिए वे राम की सौगंध तक खा लेते हैं।
काल और मृत्युकबीर मंदिर लाख का, जड़िया हीरा लाल।
दिवस चारि का पेखना, विनशि जायगा काल॥
लाखों का महल हो और उसमें हीरे-लाल जड़े हों—यह चार दिन का तमाशा है, काल आते ही सब नष्ट हो जाएगा।
काल और मृत्युकबीर धूल सकेलि के, पुड़ी जो बाँधी येह।
दिवस चार का पेखना, अंत खेह की खेह॥
धूल बटोरकर यह देह रूपी पुड़िया बाँधी गई है। यह चार दिन का तमाशा है—अंत में धूल की धूल ही रह जाएगी।
काल और मृत्युकबीर थोड़ा जीवना, माढ़ै बहुत मढ़ान।
सबही ऊभ पंथ सिर, राव रंक सुल्तान॥
जीवन थोड़ा है और मनुष्य बहुत बड़े-बड़े निर्माण करता जाता है। राजा, रंक और सुल्तान—सब उसी एक मार्ग पर खड़े हैं।
काल और मृत्युकबीर नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय।
यह पुर पटृन यह गली, बहुरि न देखहु आय॥
अपनी नौबत दस दिन बजा लो। यह नगर, यह कस्बा और यह गली—फिर लौटकर देखने को नहीं मिलेगी।
काल और मृत्युकबीर जो दिन आज है, सो दिन नहीं काल।
चेति सकै तो चेत ले, मीच परी है ख्याल॥
जो दिन आज है वह कल नहीं रहेगा। यदि चेत सको तो अभी चेत जाओ—मृत्यु तुम पर नजर रखे हुए है।
काल और मृत्युकबीर खेत किसान का, मिरगन खाया झारि।
खेत बिचारा क्या करे, धनी करे नहिं बारि॥
किसान का खेत हिरनों ने चरकर साफ कर दिया। बेचारा खेत क्या करे, जब मालिक ने बाड़ ही नहीं लगाई? असावधानी की हानि अपनी ही होती है।
काल और मृत्युकबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल।
दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूल॥
यह संसार सेमल के फूल जैसा है—देखने में सुंदर, पर भीतर खोखला। दस दिन के इस व्यवहार में झूठे रंग पर मत भूलो।
काल और मृत्युकबीर सपने रैन के, ऊधरी आये नैन।
जीव परा बहू लूट में, जागूँ लेन न देन॥
रात के सपने में आँख खुली तो देखा कि जीव भारी लूट में पड़ा है। जागने पर न कुछ लेना निकला न देना—सब स्वप्नवत् है।
काल और मृत्युकबीर जंत्र न बाजई, टूटि गये सब तार।
जंत्र बिचारा क्याय करे, गया बजावन हार॥
यह वाद्य अब बजता नहीं, इसके सारे तार टूट गए। बेचारा वाद्य क्या करे—बजाने वाला ही चला गया। देह वैसी ही है जब प्राण निकल जाएँ।
काल और मृत्युकबीर रसरी पाँव में, कहँ सोवै सुख-चैन।
साँस नगारा कुँच का, बाजत है दिन-रैन॥
पाँव में काल की रस्सी बँधी है, फिर सुख-चैन की नींद कहाँ? हर साँस कूच का नगाड़ा है जो दिन-रात बजता रहता है।
काल और मृत्युकबीर नाव तो झाँझरी, भरी बिराने भाए।
केवट सो परचै नहीं, क्यों कर उतरे पाए॥
नाव छेदों से भरी है और उस पर पराया बोझ लदा है। केवट यानी गुरु से परिचय भी नहीं—फिर पार कैसे उतरोगे?
काल और मृत्युकबीर पाँच पखेरूआ, राखा पोष लगाय।
एक जु आया पारधी, लइ गया सबै उड़ाय॥
पाँच इंद्रिय रूपी पक्षियों को बड़े जतन से पाला-पोसा। पर एक बहेलिया आया और सबको उड़ा ले गया।
काल और मृत्युकबीर बेड़ा जरजरा, कूड़ा खेनहार।
हरूये-हरूये तरि गये, बूड़े जिन सिर भार॥
नाव जर्जर है और खेने वाला भी निकम्मा। जो हलके थे वे तर गए और जिनके सिर पर बोझ था वे डूब गए।
काल और मृत्युएक दिन ऐसा होयगा, सबसों परै बिछोह।
राजा राना राव एक, सावधान क्यों नहिं होय॥
एक दिन ऐसा आएगा जब सबसे बिछोह हो जाएगा। राजा, राणा और राव—सब एक समान हैं, फिर सावधान क्यों नहीं होते?
काल और मृत्युमरेंगे मरि जायँगे, कोई न लेगा नाम।
ऊजड़ जाय बसायेंगे, छेड़ि बसंता गाम॥
मरेंगे और मर जाएँगे, फिर कोई नाम तक नहीं लेगा। बसा हुआ गाँव छोड़कर उजाड़ में जा बसना पड़ेगा।
काल और मृत्युकबीर पानी हौज की, देखत गया बिलाय।
ऐसे ही जीव जायगा, काल जु पहुँचा आय॥
हौज का पानी देखते ही देखते सूख गया। इसी तरह जीव भी चला जाएगा, क्योंकि काल आ पहुँचा है।
काल और मृत्युकबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजदीक।
कान पकरि के ले चला, ज्यों अजियाहि खटीक॥
हे लापरवाह, अब क्या करेगा—काल निकट आ गया। वह कान पकड़कर ऐसे ले चला जैसे कसाई बकरी को ले जाता है।
काल और मृत्युहाड़ जरै जस लाकड़ी, केस जरै ज्यों घास।
सब जग जरता देखि करि, भये कबीर उदास॥
हड्डियाँ लकड़ी की तरह जलती हैं और केश घास की तरह। सारे जगत को यों जलता देखकर कबीर उदास हो गए।
काल और मृत्युआज काल के बीच में, जंगल होगा वास।
ऊपर ऊपर हल फिरै, ढोर चरेंगे घास॥
आज-कल में ही यहाँ जंगल हो जाएगा। इस जगह पर हल चलेगा और मवेशी घास चरेंगे। वैभव के अवशेष भी नहीं बचते।
काल और मृत्युऊजड़ खेड़े टेकरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार।
रावन जैसा चलि गया, लंका का सरदार॥
उजड़े गाँव की टीलों पर कितने ही कुम्हार घड़े गढ़-गढ़कर चले गए। लंका का सरदार रावण जैसा भी चला गया—कोई नहीं ठहरा।
काल और मृत्युपाव पलक की सुधि नहीं, करै काल का साज।
काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज॥
एक पल की भी खबर नहीं और लंबी योजनाएँ बनाता रहता है। काल अचानक ऐसे मारेगा जैसे बाज तीतर को झपट लेता है।
काल और मृत्युआज कहै मैं कल भजूँ, काल फिर काल।
आज काल के करत ही, औसर जासी चाल॥
आज कहता है कल भजन करूँगा, फिर कल और कल। इसी आज-कल में अवसर हाथ से निकल जाएगा।
काल और मृत्युकहा चुनावै मेड़िया, चूना माटी लाय।
मीच सुनेगी पापिनी, दौरि के लेगी आय॥
चूना और मिट्टी लाकर ऊँची अटारियाँ क्यों बनवाता है? पापिन मृत्यु सुन लेगी तो दौड़कर ले जाएगी।
काल और मृत्युसातों शब्द जु बाजते, घर-घर होते राग।
ते मंदिर खाले पड़े, बैठने लागे काग॥
जहाँ सातों स्वर बजते थे और घर-घर संगीत होता था, वे भवन आज खाली पड़े हैं और उन पर कौए बैठने लगे हैं।
काल और मृत्युऊँचा महल चुनाइया, सुबरदन कली ढुलाय।
वे मंदिर खाले पड़े, रहै मसाना जाय॥
ऊँचे महल बनवाए और सोने के कलश चढ़वाए। आज वे भवन खाली पड़े हैं और बनवाने वाले श्मशान जा पहुँचे।
काल और मृत्युऊँचा दीसे धौहरा, भागे चीती पोल।
एक गुरु के नाम बिन, जम मरेंगे रोज॥
ऊँचे महल दिखाई देते हैं और चित्रित द्वार शोभा पाते हैं। पर एक गुरु के नाम के बिना मनुष्य रोज मरता रहता है।
काल और मृत्युपाव पलक तो दूर है, मो पै कहा न जाय।
ना जानो क्या होयगा, पाव के चौथे भाय॥
एक पल की बात तो दूर, मुझसे तो कुछ कहा ही नहीं जाता। पता नहीं पल के चौथाई भाग में ही क्या हो जाए।
काल और मृत्युहाड़ जले लकड़ी जले, जले जलवान हार।
अजहुँ झोला बहुत है, घर आवै तब जान॥
हड्डियाँ जलती हैं, लकड़ी जलती है और जलाने वाला भी अंततः जलता है। अभी बहुत झंझट शेष है—घर पहुँचने पर ही मानना।
काल और मृत्युपाँच तत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम।
दिना चार के कारने, फिर-फिर रोके ठाम॥
पाँच तत्वों का यह पुतला है, जिसका नाम मनुष्य रख दिया गया। चार दिन के लिए वह बार-बार ठिकाने बनाता और रोकता फिरता है।
काल और मृत्युकहा चुनावै मेड़िया, लम्बी भीत उसारि।
घर तो साढ़े तीन हाथ, घना तो पौने चारि॥
लंबी दीवारें उठाकर बड़ी अटारियाँ क्यों बनवाते हो? अंतिम घर तो साढ़े तीन हाथ का है, अधिक से अधिक पौने चार का।
काल और मृत्युयह तन काँचा कुंभ है, लिया फिरै थे साथ।
टपका लागा फुटि गया, कछु न आया हाथ॥
यह शरीर कच्चा घड़ा है जिसे साथ लिए फिरते हो। एक बूँद पड़ी और फूट गया—हाथ कुछ न आया।
काल और मृत्युजनमै मरन विचार के, कूरे काम निवारि।
जिन पंथा तोहि चालना, सोई पंथ सँवारि॥
जन्म और मरण पर विचार करके व्यर्थ के काम छोड़ दो। जिस मार्ग पर तुम्हें चलना है, उसी मार्ग को सँवारो।
काल और मृत्युदुनिया के धोखे मुआ, चला कुटुम की कानि।
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा मसानि॥
दुनिया के धोखे में और कुटुंब की लाज निभाते-निभाते मर गया। जब श्मशान में ले जाकर रख दिया जाएगा, तब कुल की कौन-सी लाज बचेगी?
काल और मृत्युजंगल ढेरी राख की, उपरि उपरि हरियाय।
ते भी होते मानवी, करते रंग रलियाय॥
जंगल में राख के ढेर पड़े हैं जिन पर ऊपर से हरियाली छा गई है। वे भी कभी मनुष्य थे और रंगरेलियाँ मनाते थे।
काल और मृत्युमहलन माही पौढ़ते, परिमल अंग लगाय।
ते सपने दीसे नहीं, देखत गये बिलाय॥
जो महलों में सुगंध लगाकर सोते थे, वे अब सपने में भी दिखाई नहीं देते—देखते ही देखते मिट गए।
काल और मृत्युकुल करनी के कारने, ढिग ही रहिगो राम।
कुल का की लाजि है, जब जम की धूम धाम॥
कुल और लोकाचार के चक्कर में राम पास रहकर भी छूट गए। जब यम की धूमधाम मचेगी, तब कुल की कौन-सी लाज काम आएगी?
काल और मृत्युमैं मेरी तू जानि करै, मेरी मूल बिनास।
मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फाँस॥
'मैं' और 'मेरी' को जानो—यही मूल का नाश करने वाली है। 'मेरी' पैरों की बेड़ी है और गले का फंदा है।
काल और मृत्युज्यों कोरी रेजा बुनै, नीरा आवै छोर।
ऐसा लेखा मीच का, दौरि सकै तो दौर॥
जैसे जुलाहा कपड़ा बुनता है और छोर पास आता जाता है, वैसा ही मृत्यु का हिसाब है। दौड़ सको तो दौड़ लो।
काल और मृत्युइत पर धर उत है धरा, बनिजन आये हाथ।
करम करीना बेचि के, उठि करि चालो काट॥
यहाँ भी धरा है और वहाँ भी—व्यापार करने आए हो तो सौदा कर लो। कर्म का माल बेचकर सौदा निपटाकर उठ चलो।
काल और मृत्युजिसको रहना उत घरा, सो क्यों जोड़े मित्र।
जैसे पर घर पाहुना, रहै उठाये चित्त॥
जिसे उस लोक में रहना है, वह यहाँ नाता क्यों जोड़े? जैसे पराए घर का मेहमान चित्त उचटाए रहता है, वैसा ही रहना चाहिए।
काल और मृत्युमैं भौंरो तोहि बरजिया, बन बन बास न लेय।
अटकेगा कहुँ बेलि में, तड़फि-तड़फि जिय देय॥
हे भौंरे, मैंने तुझे मना किया था कि वन-वन सुगंध मत ले। कहीं किसी बेल में अटक जाएगा और तड़प-तड़पकर प्राण देगा।
काल और मृत्युतू मति जानै बावरे, मेरा है यह कोय।
प्रान पिंड सो बँधि रहा, सो नहिं अपना होय॥
हे बावले, यह मत समझ कि यहाँ कोई तेरा है। जिस देह से प्राण बँधे हैं, वह भी अपनी नहीं है।
काल और मृत्युकाल चक्र चक्की चलै, बहुत दिवस औ रात।
सुगन अगुन दोउ पाटला, तामें जीव पिसात॥
काल की चक्की दिन-रात चलती रहती है। गुण और अवगुण उसके दो पाट हैं, जिनके बीच जीव पिसता रहता है।
काल और मृत्युएक दिन ऐसा होयगा, कोय काहु का नाहिं।
घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहिं॥
एक दिन ऐसा आएगा जब कोई किसी का नहीं रहेगा। घर के संबंधों की तो बात ही क्या, देह का साथ भी छूट जाएगा।
काल और मृत्युचले गये सो ना मिले, किसको पूछूँ जात।
मात-पिता-सुत बांधवा, झूठा सब संघात॥
जो चले गए वे फिर नहीं मिले, अब जाकर किससे पूछूँ? माता, पिता, पुत्र और भाई-बंधु—यह सारा साथ झूठा है।
काल और मृत्युहे मतिहीनी माछरी, राखि न सकी शरीर।
सो सरवर सेवा नहीं, जाल काल नहिं कीर॥
हे बुद्धिहीन मछली, तू अपना शरीर न बचा सकी। तूने ऐसे सरोवर की सेवा नहीं की जहाँ न जाल हो, न काल और न बहेलिया।
काल और मृत्युमछरी यह छोड़ी नहीं, धीमर तेरो काल।
जिहि जिहि डाबर धर करो, तहँ तहँ मेले जाल॥
हे मछली, धीवर तेरा काल है और वह तुझे छोड़ेगा नहीं। जिस-जिस गड्ढे में तू ठिकाना बनाएगी, वहीं-वहीं वह जाल डाल देगा।
काल और मृत्युपरदा रहती पदुमिनी, करती कुल की कान।
घड़ी जु पहुँची काल की, छोड़ भई मैदान॥
जो सुंदरी परदे में रहती थी और कुल की मर्यादा निभाती थी—काल की घड़ी आते ही सब छोड़कर खुले मैदान में आ पड़ी।
काल और मृत्युजागो लोगों मत सुवो, ना करूँ नींद से प्यार।
जैसा सपना रैन का, ऐसा यह संसार॥
हे लोगो, जागो! सोओ मत और नींद से प्रेम मत करो। यह संसार वैसा ही है जैसा रात का सपना।
काल और मृत्युजिन घर नौबत बाजती, होत छतीसों राग।
सो घर भी खाली पड़े, बैठने लागे काग॥
जिन घरों में नौबत बजती थी और छत्तीसों राग गूँजते थे, वे घर भी आज खाली पड़े हैं और उन पर कौए बैठने लगे हैं।
काल और मृत्युनर नारायन रूप है, तू मति समझे देह।
जो समझै तो समझ ले, खलक पलक में खोह॥
मनुष्य नारायण का ही रूप है, उसे केवल देह मत समझ। समझना हो तो अभी समझ ले—यह संसार पल भर में मिट जाता है।
काल और मृत्युमरूँ-मरूँ सब कोइ कहै, मेरी मरै बलाय।
मरना था तो मरि चुका, अब को मरने जाय॥
सब कहते हैं मैं मरूँगा, मरूँगा। मेरी बला मरे! जो मरना था वह अहंकार तो मर ही चुका—अब मरने कौन जाए?
काल और मृत्युएक बूँद के कारने, रोता सब संसार।
अनेक बूँद खाली गये, तिनका नहीं विचार॥
एक बूँद के लिए सारा संसार रोता है, पर अनेक बूँदें व्यर्थ चली गईं—उनका कोई विचार नहीं करता।
काल और मृत्युमूरख शब्द न मानई, धर्म न सुनै विचार।
सत्य शब्द नहिं खोजई, जावै जम के द्वार॥
मूर्ख शब्द को नहीं मानता, धर्म का विचार नहीं सुनता और सत्य को नहीं खोजता—इसलिए यम के द्वार पर जाता है।
काल और मृत्युचेत सवेरे बाचरे, फिर पाछे पछिताय।
तोको जाना दूर है, कहें कबीर बुझाय॥
सवेरे ही चेत जा और बच जा, नहीं तो बाद में पछताएगा। तुझे बहुत दूर जाना है—कबीर समझाकर कहते हैं।
काल और मृत्युक्यों खोवे नरतन वृथा, परि विषयन के साथ।
पाँच कुल्हाड़ी मारही, मूरख अपने हाथ॥
विषयों के संग पड़कर यह मनुष्य-देह व्यर्थ क्यों खोता है? मूर्ख अपने ही हाथों पाँच विकारों की कुल्हाड़ी अपने ऊपर चला रहा है।
काल और मृत्युआँखि न देखे बावरा, शब्द सुनै नहिं कान।
सिर के केस उज्ज्वल भये, अबहु निपट अजान॥
बावला आँखों से देखता नहीं और कानों से शब्द सुनता नहीं। सिर के बाल सफेद हो गए, फिर भी बिलकुल अनजान बना हुआ है।
काल और मृत्युज्ञानी होय सो मानही, बूझै शब्द हमार।
कहें कबीर सो बाँचि है, और सकल जमधार॥
जो ज्ञानी होगा वही हमारे शब्द को मानेगा और समझेगा। कबीर कहते हैं—वही बचेगा, बाकी सब यम की धार में जाएँगे।
काल और मृत्युजोबन मिकदारी तजी, चली निशान बजाय।
सिर पर सेत सिरायचा, दिया बुढ़ापै आय॥
यौवन अपनी हद छोड़कर डंका बजाता हुआ चला गया। बुढ़ापे ने आकर सिर पर सफेद चादर ओढ़ा दी।
काल और मृत्युकबीर टुक-टुक चोंगता, पल-पल गयी बिहाय।
जिव जंजाले पड़ि रहा, दियरा दममा आय॥
थोड़ा-थोड़ा करके पल-पल बीतता चला गया। जीव जंजाल में पड़ा रहा और दीपक बुझने का समय आ पहुँचा।
काल और मृत्युकाल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय।
कहें कबीर मैं क्या करूँ, कोई नहीं पितयाय॥
काल जीव को निगल जाता है—यह बहुत समझाकर कह दिया। कबीर कहते हैं, मैं क्या करूँ, कोई विश्वास ही नहीं करता।
काल और मृत्युनिश्चय काल गरासही, बहुत कहा समुझाय।
कहें कबीर मैं का कहूँ, देखत न पितयाय॥
काल निश्चित रूप से ग्रास लेगा—यह बहुत समझाकर कहा। कबीर कहते हैं, मैं और क्या कहूँ—लोग आँखों से देखकर भी विश्वास नहीं करते।
काल और मृत्युजो उगै तो आथवै, फूलै सो कुम्हिलाय।
जो चुने सो ढहि पड़ै, जनमें सो मरि जाय॥
जो उगेगा वह अस्त होगा, जो खिलेगा वह मुरझाएगा। जो चुना जाएगा वह ढहेगा और जो जन्मेगा वह मरेगा।
काल और मृत्युकुशल-कुशल जो पूछता, जग में रहा न कोय।
जरा मुई न भय मुवा, कुशल कहाँ ते होय॥
कुशल-क्षेम पूछने वाला जगत में कोई नहीं रहा। जब बुढ़ापा और भय ही नहीं मरे, तो कुशल कहाँ से होगी?
काल और मृत्युजरा श्वान जोबन ससा, काल अहेरी नित्त।
दो बैरी बिच झोंपड़ा, कुशल कहाँ सो मित्त॥
बुढ़ापा कुत्ता है, यौवन खरगोश और काल नित्य शिकारी। दो शत्रुओं के बीच झोंपड़ा पड़ा है—हे मित्र, कुशल कहाँ से होगी?
काल और मृत्युबिरिया बीती बल घटा, केश पलटि भये और।
बिगरा काज सँभारि ले, करि छूटने की ठौर॥
समय बीत गया, बल घट गया और केश का रंग बदल गया। बिगड़ा काम अभी सँभाल ले और छूटने का ठिकाना बना ले।
काल और मृत्युयह जीव आया दूर ते, जाना है बहु दूर।
बिच के बासे बसि गया, काल रहा सिर पूर॥
यह जीव बहुत दूर से आया है और उसे बहुत दूर जाना है। पर वह बीच के पड़ाव में ही बस गया, जबकि काल सिर पर मँडरा रहा है।
काल और मृत्युकबीर गाफिल क्यों फिरै, क्या सोता घनघोर।
तेरे सिराने जम खड़ा, ज्यों अँधियारे चोर॥
हे लापरवाह, क्यों बेसुध फिरता है और घोर नींद में सोता है? तेरे सिरहाने यम ऐसे खड़ा है जैसे अँधेरे में चोर।
काल और मृत्युकबीर पगरा दूर है, बीच पड़ी है रात।
न जानों क्या होयेगा, ऊगंता परभात॥
मंजिल दूर है और बीच में रात पड़ी है। पता नहीं प्रभात होते-होते क्या हो जाए।
काल और मृत्युकबीर मंदिर आपने, नित उठि करता आल।
मरहट देखी डरपता, चौडढ़े दीया डाल॥
अपने घर में नित्य उठकर नए-नए बहाने बनाता रहा। श्मशान देखकर डर गया, पर फिर भी उसे भुलाकर आगे बढ़ गया।
काल और मृत्युधरती करते एक पग, समुंद्र करते फाल।
हाथों परबत लौलते, ते भी खाये काल॥
जो एक पग में धरती नाप लेते थे, समुद्र लाँघ जाते थे और हाथों से पर्वत उठा लेते थे—काल ने उन्हें भी खा लिया।
काल और मृत्युआस पास जोधा खड़े, सबै बजावै गाल।
मंझ महल से ले चला, ऐसा परबल काल॥
आसपास योद्धा खड़े अपनी बड़ाई हाँकते रहे। पर काल इतना प्रबल है कि महल के बीच से ही उठाकर ले चला।
काल और मृत्युचारों ओर पक्का किला था और नगर के बीच महल। हर खिड़की पर पहरेदार तैनात थे, दरबार में हाथी बँधे थे और चारों ओर हथियारबंद योद्धा खड़े थे। सब देखते ही रह गए और काल इस शरीर को मात देकर ले गया। सुरक्षा का कोई प्रबंध काल को नहीं रोक सकता।
काल और मृत्युहम जाने थे खायेंगे, बहुत जिमि बहु माल।
ज्यों का त्यों ही रहि गया, पकरि ले गया काल॥
हम सोचते थे बहुत भोगेंगे, बहुत भूमि और बहुत धन जमा करेंगे। सब ज्यों का त्यों धरा रह गया और काल पकड़कर ले गया।
काल और मृत्युकाची काया मन अथिर, थिर थिर कर्म करंत।
ज्यों-ज्यों नर निधड़क फिरै, त्यों-त्यों काल हसंत॥
काया कच्ची है और मन अस्थिर, फिर भी मनुष्य स्थायी होने के भरोसे कर्म करता जाता है। ज्यों-ज्यों वह निडर होकर फिरता है, त्यों-त्यों काल हँसता है।
काल और मृत्युसंसै काल शरीर में, विषम काल है दूर।
जाको कोई जाने नहीं, जारि करै सब धूर॥
संशय रूपी काल शरीर में ही बसा है, विकट काल दूर नहीं। जिसे कोई नहीं जानता, वह जलाकर सब धूल कर देता है।
काल और मृत्युबालपना भोले गया, और जुवा महमंत।
वृद्धपने आलस गयो, चला जरंते अंत॥
बचपन भोलेपन में बीता, यौवन मस्ती और मद में। बुढ़ापा आलस्य में चला गया और अंत में जलते-जलते विदा हो गया।
काल और मृत्युबेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावै थाल।
आवन-जावन होय रहा, ज्यों कीड़ी का नाल॥
पुत्र हुआ तो क्या हुआ, थाली क्यों बजाते हो? यह आना-जाना तो चींटियों की कतार की तरह चलता ही रहता है।
काल और मृत्युताजी छूटा शहर ते, कसबे पड़ी पुकार।
दरवाजा जड़ा ही रहा, निकस गया असवार॥
घोड़ा शहर से छूट गया और कस्बे में हल्ला मच गया। दरवाजा बंद ही रहा और सवार निकल गया—प्राण के जाने को कोई रोक नहीं सकता।
काल और मृत्युखुलि खेलो संसार में, बाँधि न सक्कै कोय।
घाट जगाती क्या करै, सिर पर पोट न होय॥
संसार में खुलकर खेलो, कोई बाँध नहीं सकेगा। चुंगी वसूलने वाला क्या करेगा, जब सिर पर गठरी ही न हो?
काल और मृत्युसंसै काल शरीर में, जारि करै सब धूरि।
काल से बाँचे दास जन, जिन पै ढ्याल हुजूर॥
संशय रूपी काल शरीर में ही है जो सब जलाकर धूल कर देता है। काल से वही भक्त बचते हैं जिन पर स्वामी की ढाल है।
काल और मृत्युऐसे साँच न मानई, तिलकी देखो जाय।
जारि बारि कोयला करे, जम ते देखा सोय॥
यदि यह सच न लगे तो जाकर देख लो। शरीर को जलाकर कोयला कर दिया जाता है—यम का यह दृश्य सबने देखा है।
काल और मृत्युजारि बारि मिस्सी करे, मिस्सी करि है छार।
कहें कबीर कोइला करै, फिर दै दै औतार॥
जलाकर राख कर दिया जाता है और राख भी अंततः मिट्टी हो जाती है। कबीर कहते हैं—यही क्रम बार-बार अवतार लेकर चलता रहता है।
काल और मृत्युकाल पाय जब ऊपजो, काल पाय सब जाय।
काल पाय सब बिनश है, काल काल कहँ खाय॥
समय आने पर सब उपजता है और समय आने पर सब चला जाता है। समय पर ही सब नष्ट होता है—काल ही सबको खा जाता है।
काल और मृत्युपात झरंता देखि के, हँसती कूपलियाँ।
हम चाले तुम चालिहों, धीरी बापलियाँ॥
पत्तों को झड़ता देखकर नई कोंपलें हँसीं। तब पत्तों ने कहा—धीरज रखो बहनो, आज हम चले हैं, कल तुम भी चलोगी।
काल और मृत्युफागुन आवत देखि के, मन झूरे बनराय।
जिन डाली हम केलि, सो ही ब्योरे जाय॥
फागुन आते देखकर वनराजि का मन मुरझा जाता है। जिस डाली पर हमने क्रीड़ा की, वही अब सूनी हुई जा रही है।
काल और मृत्युमूस्या डरपें काल सों, कठिन काल को जोर।
स्वर्ग भूमि पाताल में, जहाँ जाँव तहँ गोर॥
सब काल से डरते हैं, काल का बल बहुत कठोर है। स्वर्ग, भूमि या पाताल—जहाँ भी जाओ, वहीं कब्र तैयार है।
काल और मृत्युसब जग डरपै काल सों, ब्रह्मा, विष्णु महेश।
सुर नर मुनि औ लोक सब, सात रसातल सेस॥
सारा जगत काल से डरता है—ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी। देवता, मनुष्य, मुनि, सब लोक और सातों रसातल तक इसी भय में हैं।
काल और मृत्युकबीरा पगरा दूरि है, आय पहुँची साँझ।
जन-जन को मन राखता, वेश्या रहि गयी बाँझ॥
मंजिल दूर है और साँझ आ पहुँची। जो सबका मन रखने में लगा रहा, उसका जीवन निष्फल ही रह गया।
काल और मृत्युजाय झरोखे सोवता, फूलन सेज बिछाय।
सो अब कहँ दीसै नहीं, छिन में गयो बोलाय॥
जो झरोखे में फूलों की सेज बिछाकर सोता था, वह अब कहीं दिखाई नहीं देता—क्षण भर में बुलावा आ गया।
काल और मृत्युकाल फिरे सिर ऊपरै, हाथों धरी कमान।
कहें कबीर गहु ज्ञान को, छोड़ सकल अभिमान॥
काल सिर के ऊपर कमान थामे मँडरा रहा है। कबीर कहते हैं—सारा अभिमान छोड़कर ज्ञान को थाम लो।
काल और मृत्युकाल काल सब कोई कहै, काल न चीन्है कोय।
जेती मन की कल्पना, काल कहवै सोय॥
काल-काल सब कहते हैं, पर काल को कोई पहचानता नहीं। मन की जितनी कल्पनाएँ हैं, वही असल में काल है।
काल और मृत्युकाल काम तत्काल है, बुरा न कीजै कोय।
भले भलई पेल है, बुरे बुराई होय॥
काल का काम तत्काल होता है, इसलिए किसी का बुरा मत करो। भले के साथ भलाई होती है और बुरे के साथ बुराई।
काल और मृत्युकाल काम तत्काल है, बुरा न कीजै कोय।
अनबोवे लुनता नहीं, बोवे लुनता होय॥
काल तत्काल फल देता है, इसलिए किसी का बुरा मत करो। बिना बोए कुछ नहीं काटा जाता—जो बोओगे वही काटोगे।
काल और मृत्यु