आज का दोहा › काल और मृत्यु

काल और मृत्यु पर कबीर के दोहे

121 दोहे · अर्थ सहित

019

रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय।
हीरा जन्म अनमोल था, कौड़ी बदले जाय॥

रात सोने में और दिन खाने-पीने में बीत गया। यह मनुष्य-जन्म हीरे के समान अनमोल था, पर कौड़ियों के मोल गँवा दिया गया। जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, आत्म-कल्याण है।

काल और मृत्यु
022

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारंबार।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार॥

मनुष्य-जन्म अत्यंत दुर्लभ है, यह देह बार-बार नहीं मिलती। जैसे वृक्ष से गिरा पत्ता फिर उसी डाली पर नहीं लगता, वैसे ही बीता जीवन लौटकर नहीं आता।

काल और मृत्यु
025

माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख।
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख॥

माँगना मृत्यु के समान है—किसी से भीख मत माँगो। सतगुरु की शिक्षा यही है कि हाथ फैलाने से मर जाना बेहतर है। स्वाभिमान और परिश्रम से जीना ही मनुष्य की शोभा है।

काल और मृत्यु
033

दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन।
रहे को अचरज है, गए अचंभा कौन॥

यह शरीर दस द्वारों वाला पिंजरा है, इसमें रहने वाला जीव-पक्षी किसी का अपना नहीं। आश्चर्य तो इसका ठहरे रहने पर है; उड़ जाने पर अचरज कैसा? मृत्यु स्वाभाविक है, जीवन ही विस्मय है।

काल और मृत्यु
045

बँधे मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार॥

बंधन में पड़ा मरा, रोगी मरा, सारा संसार ही मरता रहा। एक कबीर नहीं मरा, क्योंकि उसका आधार राम-नाम है। नाम का सहारा जिसे मिल जाए, वह अमर हो जाता है।

काल और मृत्यु
051

समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय।
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए॥

समझाने पर भी जो नहीं समझता और दूसरों के बहकावे में बिक जाता है—मैं तुझे अपनी ओर खींच रहा हूँ, और तू यमपुरी की ओर बढ़ा जा रहा है। हठ अंततः पतन कराता है।

काल और मृत्यु
091

काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय।
काया वैद्य ईश बस, मर्म न काहू पाय॥

यह शरीर लकड़ी है और काल घुन के समान, जो धीरे-धीरे उसे खाता रहता है। इस काया का वैद्य केवल ईश्वर है; इसका रहस्य कोई नहीं पा सका।

काल और मृत्यु
118

लोग भरोसे कौन के, बैठे रहें उरगाय।
जीय रही लूटत जम फिरे, मूढ़ा लूटे कसाय॥

लोग किसके भरोसे निश्चिंत होकर बैठे हैं? यमराज चारों ओर जीवन लूटता फिर रहा है और मूर्ख को कसाई की तरह लूट ले जाता है। यह प्रमाद के विरुद्ध चेतावनी है।

काल और मृत्यु
123

खेत ना छोड़े सूरमा, जूझे दो दल मोह।
आशा जीवन मरण की, मन में राखें नोह॥

सच्चा वीर रणभूमि नहीं छोड़ता, चाहे दोनों ओर से मोह के दल घेर लें। वह जीने-मरने की आशा मन में नहीं रखता। साधना में भी ऐसी ही अडिगता चाहिए।

काल और मृत्यु
131

केतन दिन ऐसे गए, अन रूचे का नेह।
अवसर बोवे उपजे नहीं, जो नहीं बरसे मेह॥

कितने ही दिन ऐसे बीत गए जिनमें बेमन का स्नेह निभाया गया। जैसे वर्षा न हो तो बोया बीज नहीं उगता, वैसे ही भाव के बिना संबंध फलते नहीं।

काल और मृत्यु
149

कहे कबीर देय तू, जब तक तेरी देह।
देह खेह हो जाएगी, कौन कहेगा देह॥

कबीर कहते हैं—जब तक यह देह है तब तक दान करता जा। जब यह देह मिट्टी हो जाएगी, तब तुझसे देने को कौन कहेगा? अवसर देह के रहते ही है।

काल और मृत्यु
156

कबीर यह जग कुछ नहीं, खिन खारा खिन मीठ।
काल्ह जो बैठा भंडपै, आज मसाने दीठ॥

यह संसार कुछ भी नहीं—क्षण में खारा, क्षण में मीठा। जो कल सिंहासन पर बैठा दिखता था, आज श्मशान में दिखाई दे रहा है। सब कुछ क्षणभंगुर है।

काल और मृत्यु
161

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोय॥

चलती चक्की देखकर कबीर रो पड़े—दो पाटों के बीच आकर कोई साबुत नहीं बचा। इसी तरह काल के दो पाटों के बीच पिसकर कोई भी बचा नहीं रह पाता।

काल और मृत्यु
166

झूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद।
जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद॥

लोग झूठे सुख को ही सुख कहते हैं और मन उसी में प्रसन्न रहता है। पर यह सारा जगत काल का चबेना है—कुछ उसके मुँह में है और कुछ गोद में रखा है।

काल और मृत्यु
172

पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।
देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात॥

मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले जैसा है। देखते ही देखते वह मिट जाएगा, जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं। जीवन अत्यंत क्षणिक है।

काल और मृत्यु
174

पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय।
अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय॥

पत्ता वृक्ष से बोला—हे वनराज, सुनो! अब बिछुड़ गए तो फिर मिलना न होगा, बहुत दूर जा पड़ेंगे। यह जीवन के अनिवार्य वियोग का मार्मिक चित्र है।

काल और मृत्यु
182

माली आवत देख के, कलियन करी पुकार।
फूल-फूल चुन लिए, काल हमारी बार॥

माली को आते देखकर कलियाँ पुकार उठीं—आज खिले फूल चुन लिए गए, कल हमारी बारी है। काल सबको क्रमशः ले जाता है, कोई बचा नहीं रहता।

काल और मृत्यु
190

लकड़ी कहै लुहार की, तू मति जारे मोहि।
एक दिन ऐसा होयगा, मैं जारूँगी तोहि॥

लकड़ी लुहार से कहती है—तू मुझे मत जला, एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुझे जलाऊँगी। जो आज दूसरे को कष्ट देता है, कल उसी की बारी आती है।

काल और मृत्यु
238

तीरथ करि-करि जग मुवा, डूंधै पाणी न्हाइ।
रामहि राम जपंता, काल घसीटया जाइ॥

तीर्थ कर-करके और गंदे पानी में नहाकर सारा जग मर गया। राम-राम रटते हुए भी काल उन्हें घसीटकर ले जाता है—क्रिया भर से भीतर नहीं बदलता।

काल और मृत्यु
323

कबीर घोड़ा प्रेम का, चेतनि चाढ़ि असवार।
ज्ञान खड्ग गहि काल सिरि, भली मचाई मार॥

प्रेम का घोड़ा है और चेतना उस पर सवार। ज्ञान की तलवार थामकर काल के सिर पर ऐसी मार मचाई कि वह भी हार गया।

काल और मृत्यु
349

सुरति करौ मेरे साइयाँ, हम हैं भोजन माँहि।
आपे ही बहि जाहिंगे, जौ नहिं पकरौ बाँहि॥

हे मेरे स्वामी, मेरी सुध लो—मैं तो काल के भोजन में पड़ा हूँ। यदि तुमने बाँह न पकड़ी तो अपने आप बहा चला जाऊँगा।

काल और मृत्यु
666

कबीर थोड़ा जीवना, माढ़ै बहुत मढ़ान।
सबही ऊभ पंथ सिर, राव रंक सुल्तान॥

जीवन थोड़ा है और मनुष्य बहुत बड़े-बड़े निर्माण करता जाता है। राजा, रंक और सुल्तान—सब उसी एक मार्ग पर खड़े हैं।

काल और मृत्यु
670

कबीर खेत किसान का, मिरगन खाया झारि।
खेत बिचारा क्या करे, धनी करे नहिं बारि॥

किसान का खेत हिरनों ने चरकर साफ कर दिया। बेचारा खेत क्या करे, जब मालिक ने बाड़ ही नहीं लगाई? असावधानी की हानि अपनी ही होती है।

काल और मृत्यु
673

कबीर जंत्र न बाजई, टूटि गये सब तार।
जंत्र बिचारा क्याय करे, गया बजावन हार॥

यह वाद्य अब बजता नहीं, इसके सारे तार टूट गए। बेचारा वाद्य क्या करे—बजाने वाला ही चला गया। देह वैसी ही है जब प्राण निकल जाएँ।

काल और मृत्यु
686

ऊजड़ खेड़े टेकरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार।
रावन जैसा चलि गया, लंका का सरदार॥

उजड़े गाँव की टीलों पर कितने ही कुम्हार घड़े गढ़-गढ़कर चले गए। लंका का सरदार रावण जैसा भी चला गया—कोई नहीं ठहरा।

काल और मृत्यु
699

पाँच तत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम।
दिना चार के कारने, फिर-फिर रोके ठाम॥

पाँच तत्वों का यह पुतला है, जिसका नाम मनुष्य रख दिया गया। चार दिन के लिए वह बार-बार ठिकाने बनाता और रोकता फिरता है।

काल और मृत्यु
700

कहा चुनावै मेड़िया, लम्बी भीत उसारि।
घर तो साढ़े तीन हाथ, घना तो पौने चारि॥

लंबी दीवारें उठाकर बड़ी अटारियाँ क्यों बनवाते हो? अंतिम घर तो साढ़े तीन हाथ का है, अधिक से अधिक पौने चार का।

काल और मृत्यु
704

दुनिया के धोखे मुआ, चला कुटुम की कानि।
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा मसानि॥

दुनिया के धोखे में और कुटुंब की लाज निभाते-निभाते मर गया। जब श्मशान में ले जाकर रख दिया जाएगा, तब कुल की कौन-सी लाज बचेगी?

काल और मृत्यु
716

जिसको रहना उत घरा, सो क्यों जोड़े मित्र।
जैसे पर घर पाहुना, रहै उठाये चित्त॥

जिसे उस लोक में रहना है, वह यहाँ नाता क्यों जोड़े? जैसे पराए घर का मेहमान चित्त उचटाए रहता है, वैसा ही रहना चाहिए।

काल और मृत्यु
718

मैं भौंरो तोहि बरजिया, बन बन बास न लेय।
अटकेगा कहुँ बेलि में, तड़फि-तड़फि जिय देय॥

हे भौंरे, मैंने तुझे मना किया था कि वन-वन सुगंध मत ले। कहीं किसी बेल में अटक जाएगा और तड़प-तड़पकर प्राण देगा।

काल और मृत्यु
734

मछरी यह छोड़ी नहीं, धीमर तेरो काल।
जिहि जिहि डाबर धर करो, तहँ तहँ मेले जाल॥

हे मछली, धीवर तेरा काल है और वह तुझे छोड़ेगा नहीं। जिस-जिस गड्ढे में तू ठिकाना बनाएगी, वहीं-वहीं वह जाल डाल देगा।

काल और मृत्यु
735

परदा रहती पदुमिनी, करती कुल की कान।
घड़ी जु पहुँची काल की, छोड़ भई मैदान॥

जो सुंदरी परदे में रहती थी और कुल की मर्यादा निभाती थी—काल की घड़ी आते ही सब छोड़कर खुले मैदान में आ पड़ी।

काल और मृत्यु
750

क्यों खोवे नरतन वृथा, परि विषयन के साथ।
पाँच कुल्हाड़ी मारही, मूरख अपने हाथ॥

विषयों के संग पड़कर यह मनुष्य-देह व्यर्थ क्यों खोता है? मूर्ख अपने ही हाथों पाँच विकारों की कुल्हाड़ी अपने ऊपर चला रहा है।

काल और मृत्यु
751

आँखि न देखे बावरा, शब्द सुनै नहिं कान।
सिर के केस उज्ज्वल भये, अबहु निपट अजान॥

बावला आँखों से देखता नहीं और कानों से शब्द सुनता नहीं। सिर के बाल सफेद हो गए, फिर भी बिलकुल अनजान बना हुआ है।

काल और मृत्यु
752

ज्ञानी होय सो मानही, बूझै शब्द हमार।
कहें कबीर सो बाँचि है, और सकल जमधार॥

जो ज्ञानी होगा वही हमारे शब्द को मानेगा और समझेगा। कबीर कहते हैं—वही बचेगा, बाकी सब यम की धार में जाएँगे।

काल और मृत्यु
755

काल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय।
कहें कबीर मैं क्या करूँ, कोई नहीं पितयाय॥

काल जीव को निगल जाता है—यह बहुत समझाकर कह दिया। कबीर कहते हैं, मैं क्या करूँ, कोई विश्वास ही नहीं करता।

काल और मृत्यु
756

निश्चय काल गरासही, बहुत कहा समुझाय।
कहें कबीर मैं का कहूँ, देखत न पितयाय॥

काल निश्चित रूप से ग्रास लेगा—यह बहुत समझाकर कहा। कबीर कहते हैं, मैं और क्या कहूँ—लोग आँखों से देखकर भी विश्वास नहीं करते।

काल और मृत्यु
759

जरा श्वान जोबन ससा, काल अहेरी नित्त।
दो बैरी बिच झोंपड़ा, कुशल कहाँ सो मित्त॥

बुढ़ापा कुत्ता है, यौवन खरगोश और काल नित्य शिकारी। दो शत्रुओं के बीच झोंपड़ा पड़ा है—हे मित्र, कुशल कहाँ से होगी?

काल और मृत्यु
761

यह जीव आया दूर ते, जाना है बहु दूर।
बिच के बासे बसि गया, काल रहा सिर पूर॥

यह जीव बहुत दूर से आया है और उसे बहुत दूर जाना है। पर वह बीच के पड़ाव में ही बस गया, जबकि काल सिर पर मँडरा रहा है।

काल और मृत्यु
762

कबीर गाफिल क्यों फिरै, क्या सोता घनघोर।
तेरे सिराने जम खड़ा, ज्यों अँधियारे चोर॥

हे लापरवाह, क्यों बेसुध फिरता है और घोर नींद में सोता है? तेरे सिरहाने यम ऐसे खड़ा है जैसे अँधेरे में चोर।

काल और मृत्यु
767

चहुँ दिसि पाका कोट था, मंदिर नगर मझार। खिरकी खिरकी पाहरू, गज बंदा दरबार॥
चहुँ दिसि ठाढ़े सूरमा, हाथ लिये हथियार। सबही यह तन देखता, काल ले गया मात॥

चारों ओर पक्का किला था और नगर के बीच महल। हर खिड़की पर पहरेदार तैनात थे, दरबार में हाथी बँधे थे और चारों ओर हथियारबंद योद्धा खड़े थे। सब देखते ही रह गए और काल इस शरीर को मात देकर ले गया। सुरक्षा का कोई प्रबंध काल को नहीं रोक सकता।

काल और मृत्यु
768

हम जाने थे खायेंगे, बहुत जिमि बहु माल।
ज्यों का त्यों ही रहि गया, पकरि ले गया काल॥

हम सोचते थे बहुत भोगेंगे, बहुत भूमि और बहुत धन जमा करेंगे। सब ज्यों का त्यों धरा रह गया और काल पकड़कर ले गया।

काल और मृत्यु
769

काची काया मन अथिर, थिर थिर कर्म करंत।
ज्यों-ज्यों नर निधड़क फिरै, त्यों-त्यों काल हसंत॥

काया कच्ची है और मन अस्थिर, फिर भी मनुष्य स्थायी होने के भरोसे कर्म करता जाता है। ज्यों-ज्यों वह निडर होकर फिरता है, त्यों-त्यों काल हँसता है।

काल और मृत्यु
774

ताजी छूटा शहर ते, कसबे पड़ी पुकार।
दरवाजा जड़ा ही रहा, निकस गया असवार॥

घोड़ा शहर से छूट गया और कस्बे में हल्ला मच गया। दरवाजा बंद ही रहा और सवार निकल गया—प्राण के जाने को कोई रोक नहीं सकता।

काल और मृत्यु
777

संसै काल शरीर में, जारि करै सब धूरि।
काल से बाँचे दास जन, जिन पै ढ्याल हुजूर॥

संशय रूपी काल शरीर में ही है जो सब जलाकर धूल कर देता है। काल से वही भक्त बचते हैं जिन पर स्वामी की ढाल है।

काल और मृत्यु
779

जारि बारि मिस्सी करे, मिस्सी करि है छार।
कहें कबीर कोइला करै, फिर दै दै औतार॥

जलाकर राख कर दिया जाता है और राख भी अंततः मिट्टी हो जाती है। कबीर कहते हैं—यही क्रम बार-बार अवतार लेकर चलता रहता है।

काल और मृत्यु
784

सब जग डरपै काल सों, ब्रह्मा, विष्णु महेश।
सुर नर मुनि औ लोक सब, सात रसातल सेस॥

सारा जगत काल से डरता है—ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी। देवता, मनुष्य, मुनि, सब लोक और सातों रसातल तक इसी भय में हैं।

काल और मृत्यु