काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय।
काया वैद्य ईश बस, मर्म न काहू पाय॥
यह शरीर लकड़ी है और काल घुन के समान, जो धीरे-धीरे उसे खाता रहता है। इस काया का वैद्य केवल ईश्वर है; इसका रहस्य कोई नहीं पा सका।
काल और मृत्यु