आज का दोहा › मन और संयम

मन और संयम पर कबीर के दोहे

38 दोहे · अर्थ सहित

028

आया था किस काम को, तू सोया चादर तान।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान॥

तू इस संसार में किस काम के लिए आया था, और चादर तानकर बेसुध सो रहा है! हे लापरवाह मनुष्य, अपनी सुध सँभाल और अपने असली स्वरूप को पहचान।

मन और संयम
041

बाजीगर का बाँदरा, ऐसा जीव मन के साथ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ॥

जीव मन के हाथों वैसे ही नचाया जाता है जैसे मदारी अपने बंदर को नचाता है। मन तरह-तरह के नाच दिखाकर जीव को अपने वश में बनाए रखता है। मन को साधना ही साधना है।

मन और संयम
042

अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट।
चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पटन को फूट॥

शरीर में तीर की नोक अटकी रह गई है और तीर टूट चुका है। यह चुम्बक के बिना नहीं निकलेगी, चाहे करोड़ों उपाय कर लो। इसी तरह मन में धँसा विकार गुरु-कृपा रूपी चुम्बक से ही निकलता है।

मन और संयम
063

मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार।
तुम दाता दुःख भंजना, मेरी करो सम्हार॥

मैं जन्म से ही अपराधी हूँ और नख से शिखा तक विकारों से भरा हूँ। तुम दाता हो और दुःखों को हरने वाले हो—मेरी सँभाल करो। यह विनम्र आत्म-स्वीकृति है।

मन और संयम
073

आहार करे मन भावता, इंद्री किए स्वाद।
नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद॥

जो मनमाना भोजन करे, इंद्रियों के स्वाद के पीछे भागे और नाक तक ठूँसकर खाए—उसे प्रसाद कैसे कहा जाए? संयमित आहार ही प्रसाद है, भोग नहीं।

मन और संयम
085

कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।
टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥

धैर्य धारण करने के कारण हाथी को मन भर भोजन एक ही स्थान पर मिल जाता है। वहीं कुत्ता एक टुकड़े के लिए घर-घर भटकता फिरता है। धैर्य से गरिमा और तृप्ति दोनों मिलती हैं।

मन और संयम
094

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम।
कहे कबीर सेवक नहीं, चहै चौगुना दाम॥

जो फल की इच्छा से सेवा करे और मन लगाकर काम न करे, कबीर कहते हैं वह सेवक नहीं—वह तो चौगुना मूल्य चाहने वाला व्यापारी है। सेवा निष्काम होनी चाहिए।

मन और संयम
098

तन बोहित मन काग है, लख योजन उड़ जाय।
कबहु के धरम अगम दयी, कबहुँ गगन समाय॥

शरीर जहाज है और मन उस पर बैठा कौआ, जो लाखों योजन दूर उड़ जाता है। कभी वह अगम्य ऊँचाइयों पर पहुँचता है, कभी आकाश में खो जाता है—पर लौटकर जहाज पर ही आता है।

मन और संयम
108

कबीरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय।
जाके विषय विष भरा, दास बंदगी होय॥

जिसमें ईश्वर का बोध जाग गया, वही सचमुच जागा है; बाकी सब सोए हुए हैं। जिसके भीतर विषयों का विष भरा है, वह बंदगी करता तो दिखता है पर जागा नहीं होता।

मन और संयम
155

कबीरा मनहि गयंद है, अंकुश दै-दै राखि।
विष की बेली परि रहै, अमृत को फल चाखि॥

मन मतवाले हाथी जैसा है, इसे अंकुश दे-देकर वश में रखो। नहीं तो यह विष की बेल पर ही पड़ा रहेगा; अंकुश में रहे तो अमृत फल चखेगा।

मन और संयम
159

चंदन जैसा साधु है, सर्पहि सम संसार।
वाके अंग लपटा रहे, मन में नाहिं विकार॥

साधु चंदन के वृक्ष जैसा है और संसार साँप के समान। साँप चंदन से लिपटा रहता है, फिर भी चंदन के मन में कोई विकार नहीं आता—वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।

मन और संयम
169

तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय।
सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय॥

शरीर से योगी बनना सबको आता है, मन से योगी कोई विरला ही बनता है। यदि मन योगी हो जाए तो सब कुछ सहज ही प्राप्त हो जाता है।

मन और संयम
203

कबीरा राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ।
फूटा नग ज्यूँ जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ॥

मुख से अमृत जैसे गुण गाकर राम को प्रसन्न कर लो। जैसे टूटे रत्न को जोड़ते समय संधि से संधि मिलाई जाती है, वैसे ही बिखरे मन को सावधानी से जोड़ना पड़ता है।

मन और संयम
225

कामी अभी न भावई, विष ही कों ले सोधि।
कुबुद्धि न जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोथि॥

कामी व्यक्ति को अमृत नहीं भाता, वह विष को ही खोजकर ले लेता है। जीव की कुबुद्धि जाती नहीं, चाहे कितना ही समझाया-मथा जाए।

मन और संयम
229

ज्ञानी मूल गवाइयाँ, आपण भये करना।
ता थैं संसारी भला, मन में रहै डरना॥

अहंकारी ज्ञानी ने अपनी मूल पूँजी ही गँवा दी, क्योंकि वह स्वयं को कर्ता मानने लगा। उससे तो वह सांसारिक व्यक्ति भला है जिसके मन में कम से कम डर तो बना रहता है।

मन और संयम
230

कामी लज्जा ना करै, न माहें अहिलाद।
नींद न माँगै साथरा, भूख न माँगे स्वाद॥

कामी को लज्जा नहीं आती और न भीतर सच्चा आनंद रहता है। जैसे गहरी नींद बिछौना नहीं माँगती और सच्ची भूख स्वाद नहीं—वैसे ही तीव्र वासना विवेक नहीं देखती।

मन और संयम
240

कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूँ मैं भ्रम।
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम॥

मन इस भ्रम में फूला फिरता है कि 'मैं करता हूँ'। इसी अहंकार में वह करोड़ों कर्मों का बोझ सिर पर लादे चला जा रहा है और अपना भ्रम देख ही नहीं पाता।

मन और संयम
256

पद गाएं मन हरषिया, साषी कह्यां अनंद।
सो तत नावं न जाणिया, गल में पड़िया फंद॥

पद गाकर मन प्रसन्न हुआ और साखी कहकर आनंद आया। पर उस मूल तत्त्व को नहीं जाना—इसीलिए गले में फंदा पड़ा ही रहा। रसिकता तत्त्वबोध नहीं है।

मन और संयम
267

मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि।
दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछाणि॥

मन को मथुरा, दिल को द्वारिका और शरीर को काशी समझो। दसवाँ द्वार ही असली मंदिर है—उसी में उस ज्योति को पहचानो।

मन और संयम
279

पाणी ही तै पातला, धुवाँ ही तै झीण।
पवनां बेगि उतावला, सो दोस्त कबीर कीन्ह॥

जो पानी से भी पतला है, धुएँ से भी सूक्ष्म और हवा से भी तेज—कबीर ने उसी को अपना मित्र बनाया है। परमात्मा इंद्रियों की पकड़ से परे है।

मन और संयम
280

कबीर मारू मन कूँ, टूक-टूक है जाइ।
विष की क्यारी बोइ करि, लुणत कहा पछिताइ॥

मन को ऐसे मारूँ कि वह टुकड़े-टुकड़े हो जाए। विष की क्यारी बोकर काटते समय पछताने से क्या लाभ? बोने के समय ही सावधानी चाहिए।

मन और संयम
283

मनह मनोरथ छाँड़िये, तेरा किया न होइ।
पाणी में घीव नीकसै, तो रूखा खाइ न कोइ॥

मन की व्यर्थ कामनाएँ छोड़ दो, तेरे चाहने से कुछ नहीं होता। यदि पानी से घी निकलने लगे तो रूखी रोटी कौन खाए? इच्छाएँ यथार्थ नहीं बदलतीं।

मन और संयम
293

कैसो कहा बिगाड़िया, जो मुंडै सौ बार।
मन को काहे न मूंडिये, जामे विषम-विकार॥

बालों ने क्या बिगाड़ा है जो उन्हें सौ बार मुँड़ाते हो? मन को क्यों नहीं मूँड़ते, जिसमें भयंकर विकार भरे पड़े हैं?

मन और संयम
303

काम मिलावे राम कूं, जे कोई जाणै राखि।
कबीर बिचारा क्या कहै, जाकि सुखदेव बोले साख॥

यदि कोई उसे सँभालना जाने तो कामना भी राम से मिला सकती है—तीव्र लगन दिशा बदल दे तो साधन बन जाती है। कबीर बेचारा क्या कहे, इसकी गवाही तो शुकदेव देते हैं।

मन और संयम
319

कबीर संसा कोउ नहीं, हरि सूं लाग्गा हेत।
काम-क्रोध सूं झूझणा, चौडै माह्या खेत॥

अब कोई संशय नहीं रहा, हरि से प्रेम लग गया। अब तो काम और क्रोध से खुले मैदान में जूझना है—यह भीतर का युद्ध है।

मन और संयम
320

कबीर सोई सूरिमा, मन सूँ माँडै झूझ।
पंच पयादा पाड़ि ले, दूरि करै सब दूज॥

सच्चा शूरवीर वही है जो अपने मन से युद्ध ठाने। जो पाँचों विकार रूपी प्यादों को गिरा दे और सारे द्वैत को दूर कर दे।

मन और संयम
332

अबरन कों का बरनिये, भोपै लख्या न जाइ।
अपना बाना वाहिया, कहि-कहि थाके भाइ॥

जिसका कोई वर्ण-रूप ही नहीं, उसका वर्णन कैसे करें? वह इंद्रियों से जाना नहीं जाता। सब अपनी-अपनी बात कह-कहकर थक गए, पर कोई पार न पा सका।

मन और संयम
801

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

जब मैं संसार में बुराई खोजने निकला तो कोई बुरा न मिला। पर जब अपने ही भीतर झाँककर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं। कबीर कहते हैं—दोष दूसरों में ढूँढ़ने से पहले अपने भीतर देखो।

मन और संयम