पद गाएं मन हरषिया, साषी कह्यां अनंद।
सो तत नावं न जाणिया, गल में पड़िया फंद॥
पद गाकर मन प्रसन्न हुआ और साखी कहकर आनंद आया। पर उस मूल तत्त्व को नहीं जाना—इसीलिए गले में फंदा पड़ा ही रहा। रसिकता तत्त्वबोध नहीं है।
मन और संयम