आज का दोहा › उपदेश और चेतावनी

उपदेश और चेतावनी पर कबीर के दोहे

50 दोहे · अर्थ सहित

012

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

हे मन! धैर्य रख, सब कुछ अपने समय पर ही होता है। माली चाहे सौ घड़े पानी डाल दे, फल तभी लगेगा जब उसकी ऋतु आएगी। जल्दबाजी से नहीं, प्रतीक्षा और निरंतर प्रयास से फल मिलता है।

उपदेश और चेतावनी
024

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

जो कल करना है उसे आज कर लो और जो आज करना है उसे अभी कर लो। पल भर में सब कुछ समाप्त हो सकता है, फिर करने का अवसर कब मिलेगा? यह अकर्मण्यता के विरुद्ध चेतावनी है।

उपदेश और चेतावनी
057

जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय।
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय॥

जो जागते हुए भी संसार से सोया-सा रहे और साधना में लगन लगाए रखे—उसकी सुरति की डोर प्रभु से ऐसी जुड़ी रहती है कि वह तार कभी टूटता नहीं।

उपदेश और चेतावनी
076

दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गरजी।
कह कबीर आसमान फटा, क्यों कर सीवे दरजी॥

दिल का घाव भरने वाला कोई नहीं मिला; जो मिला वह भी स्वार्थी निकला। कबीर कहते हैं—जब आसमान ही फट जाए तो दर्जी उसे कैसे सिएगा? कुछ पीड़ाएँ सांसारिक उपायों से परे हैं।

उपदेश और चेतावनी
089

मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहिं दोष।
यह कबीरा बैठा रहे, तो सिर करड़े दोष॥

जो चलते हुए गिर गया, उसका कोई दोष नहीं। पर कबीर कहते हैं—जो चला ही नहीं, बैठा ही रह गया, दोष उसके सिर पर है। प्रयास करके असफल होना निष्क्रियता से बेहतर है।

उपदेश और चेतावनी
095

तेरा साईं तुझमें, ज्यों पहुपन में बास।
कस्तूरी का हिरन ज्यों, फिर-फिर ढूँढ़त घास॥

तेरा स्वामी तुझमें ही है, जैसे फूल में सुगंध बसती है। पर तू उसे बाहर खोजता फिरता है—ठीक वैसे ही जैसे कस्तूरी-मृग अपनी ही नाभि की गंध घास में ढूँढ़ता है।

उपदेश और चेतावनी
100

कहता तो बहुत मिला, गहता मिला न कोय।
सो कहता वह जान दे, जो नहिं गहता होय॥

कहने वाले तो बहुत मिले, पर ग्रहण करने वाला कोई नहीं मिला। ऐसे कहने वाले को जाने दो जो स्वयं अपनी कही बात को ग्रहण नहीं करता। उपदेश देना सरल है, जीना कठिन।

उपदेश और चेतावनी
102

आस पराई राखता, खाया घर का खेत।
औरन को उपदेशता, मुख में पड़ रेत॥

जो दूसरों से आशा लगाए बैठा रहा, उसका अपना खेत भी चौपट हो गया। और जो स्वयं करता कुछ नहीं, केवल दूसरों को उपदेश देता है—उसके मुँह में रेत ही पड़े। कथनी से पहले करनी चाहिए।

उपदेश और चेतावनी
105

बलिहारी वा दूध की, जामें निकसे घीव।
घी साखी कबीर की, चार वेद का जीव॥

उस दूध पर बलिहारी जिससे घी निकले। कबीर की साखी उसी घी के समान सार है, जिसमें चारों वेदों का प्राण समाया हुआ है। सार वही है जो निथरकर निकले।

उपदेश और चेतावनी
111

सब आए इस एक में, डाल-पात फल-फूल।
कबीरा पीछा क्या रहा, गह पकड़ी जब मूल॥

डाल, पत्ते, फल, फूल—सब उसी एक मूल से निकले हैं। कबीर कहते हैं, जब जड़ ही पकड़ ली तो पीछे क्या रह गया? मूल तत्त्व जान लेने पर शेष अपने आप समझ आ जाता है।

उपदेश और चेतावनी
113

सिंह अकेला बन रहे, पलक-पलक कर दौर।
जैसा बन है आपना, तैसा बन है और॥

सिंह वन में अकेला ही रहता है और निर्भय होकर विचरता है। उसके लिए अपना वन हो या पराया, सब बराबर है। आत्मबल वाला व्यक्ति कहीं भी अकेला और निर्भय रह सकता है।

उपदेश और चेतावनी
116

जो जाने जीव न आपना, करहीं जीव का सार।
जीवा ऐसा पाहौना, मिले ना दूजी बार॥

जो यह नहीं समझता कि यह जीव उसका अपना है, वह उसकी सुध कैसे लेगा? यह जीवन रूपी अतिथि ऐसा है जो दूसरी बार नहीं मिलेगा। इसकी सँभाल अभी कर लो।

उपदेश और चेतावनी
130

साईं ते सब होते हैं, बंदे से कुछ नाहिं।
राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं॥

सब कुछ प्रभु से होता है, बंदे के वश में कुछ नहीं। वे राई को पर्वत बना सकते हैं और पर्वत को राई। अहंकार करना व्यर्थ है।

उपदेश और चेतावनी
138

उत ते कोई न आवई, पासू पूछूँ धाय।
इतने ही सब जात है, भार लदाय लदाय॥

उस लोक से कोई लौटकर नहीं आता कि दौड़कर उससे हाल पूछूँ। यहाँ से तो सब अपने कर्मों का भार लादे चले ही जा रहे हैं। यही जीवन का एकतरफा सत्य है।

उपदेश और चेतावनी
145

काल करे सो आज कर, सबहि सात तुव साथ।
काल काल तू क्या करे, काल काल के हाथ॥

जो कल करना है वह आज कर ले, सब कुछ तेरे साथ है। 'कल-कल' करके क्या टालता है? कल तो स्वयं काल के हाथ में है, वह तेरे वश में नहीं।

उपदेश और चेतावनी
146

कहा किया हम आय कर, कहा करेंगे पाय।
इनके भये न उतके, चाले मूल गवाय॥

यहाँ आकर हमने किया क्या और वहाँ पहुँचकर क्या करेंगे? न इस लोक के रहे न उस लोक के—मूल पूँजी ही गँवाकर चल दिए। दोनों ओर से हाथ खाली।

उपदेश और चेतावनी
148

कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर।
ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेर॥

लोहा तो एक ही है, अंतर गढ़ने में है। उसी से कवच बनता है जो रक्षा करता है और उसी से तलवार जो प्रहार करती है। संस्कार ही मनुष्य की दिशा तय करते हैं।

उपदेश और चेतावनी
150

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय।
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय॥

जो किया वह सोच-समझकर क्यों नहीं किया, अब पछताने से क्या लाभ? बबूल का पेड़ बोकर आम खाने की आशा कैसे की जा सकती है? कर्म वैसा ही फल देता है।

उपदेश और चेतावनी
157

कबीरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय।
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय॥

स्वयं ठगे जाना स्वीकार करो, पर किसी और को मत ठगो। स्वयं ठगे जाने में अंततः सुख है और दूसरे को ठगने में दुःख। छल का फल छलने वाले को ही भोगना पड़ता है।

उपदेश और चेतावनी
164

ज्यों नैनन में पूतली, त्यों मालिक घर माँहि।
मूर्ख लोग न जानिए, बाहर ढूँढ़त जाहिं॥

जैसे आँखों के भीतर पुतली रहती है, वैसे ही मालिक इस देह-घर में ही बसता है। मूर्ख लोग यह नहीं जानते और उसे बाहर ढूँढ़ने निकल जाते हैं।

उपदेश और चेतावनी
165

जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप।
पुष्प बास ते पामरा, ऐसा तत्त्व अनूप॥

उस परम तत्त्व का न मुख है न माथा, न वह सुंदर है न कुरूप। वह फूल की सुगंध से भी सूक्ष्म है—ऐसा अनुपम है वह तत्त्व, जिसे रूप में बाँधा नहीं जा सकता।

उपदेश और चेतावनी
176

बूँद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय।
समुद्र समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय॥

बूँद समुद्र में समा जाए—यह तो सब जानते हैं। पर समुद्र स्वयं बूँद में समा जाए, इस रहस्य को कोई विरला ही समझता है। जीव का ब्रह्म में और ब्रह्म का जीव में होना यही है।

उपदेश और चेतावनी
184

या दुनियाँ में आ कर, छाँड़ि देय तू ऐंठ।
लेना हो सो लेइ ले, उठी जात है पैंठ॥

इस दुनिया में आकर अपनी अकड़ छोड़ दे। जो लेना है ले ले, क्योंकि यह बाजार उठने ही वाला है। जीवन का मेला जल्दी समाप्त हो जाता है।

उपदेश और चेतावनी
188

साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय।
ज्यों मेहँदी के पात में, लाली रखी न जाय॥

हे स्वामी! तुम्हारी प्रभुता हर हृदय में समाई हुई है। जैसे मेहँदी के हरे पत्ते में छिपी लाली छिपाए नहीं छिपती, वैसे ही तुम्हारी उपस्थिति हर कण में झलकती है।

उपदेश और चेतावनी
191

हरिया जाने रूखड़ा, जो पानी का गेह।
सूखा काठ न जान ही, केतुउ बूड़ा मेह॥

हरा वृक्ष ही पानी का महत्त्व जानता है। सूखी लकड़ी को कितनी भी वर्षा में डुबो दो, वह कुछ नहीं जानती। जिसका हृदय जीवित है, वही उपदेश ग्रहण करता है।

उपदेश और चेतावनी
213

सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवे॥

सारा संसार सुखी है—खाता है और सो जाता है। दुखी तो यह दास कबीर है, जो जागता है और रोता है। जिसे सत्य का बोध है, वही बेचैन रहता है।

उपदेश और चेतावनी
218

पहुँचेंगे तब कहैंगें, उमड़ैंगे उस ठाईं।
आजहूँ बेरा समंद में, बोलि बिगूपैं काई॥

वहाँ पहुँचकर ही कुछ कहेंगे, उसी स्थान पर उमड़ेंगे। अभी तो नाव समुद्र के बीच में है—अभी से बड़बोलापन करके क्यों उलझें? सिद्धि से पहले घोषणा नहीं करनी चाहिए।

उपदेश और चेतावनी
221

कबीर एक न जान्यां, तो बहु जान्यां क्या होइ।
एक तै सब होत है, सब तै एक न होइ॥

यदि उस एक को नहीं जाना तो बहुत कुछ जान लेने से क्या लाभ? उस एक से सब कुछ हो जाता है, पर सब कुछ जान लेने से वह एक नहीं मिलता।

उपदेश और चेतावनी
224

कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो भीत।
जिन दिल बांध्या एक सूँ, ते सुख सोवै निचींत॥

कलियुग आने पर लोगों ने आपस में बहुत दीवारें खड़ी कर लीं। पर जिन्होंने अपना दिल एक ही से बाँध लिया, वे निश्चिंत होकर सुख से सोते हैं।

उपदेश और चेतावनी
228

परनारी राता फिरैं, चोरी बिढ़ता खाहिं।
दिवस चारि सरसा रहै, अति समूला जाहिं॥

जो पराई स्त्री में आसक्त फिरते हैं और चोरी का खाते हैं, वे चार दिन फलते-फूलते दिखते हैं, पर अंत में जड़ सहित नष्ट हो जाते हैं।

उपदेश और चेतावनी
237

कबीर इस संसार कौ, समझाऊँ कै बार।
पूँछ जो पकड़ै भेड़ की, उतर या चाहे पार॥

इस संसार को कितनी बार समझाऊँ! ये लोग भेड़ की पूँछ पकड़कर भवसागर पार उतरना चाहते हैं। कुपात्र का सहारा लेकर मुक्ति नहीं मिलती।

उपदेश और चेतावनी
257

जैसी मुख तै नीकसै, तैसी चाले चाल।
पार ब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल॥

जैसा मुख से निकले वैसी ही चाल भी हो—कथनी और करनी एक हों। तब परब्रह्म पास ही रहते हैं और पल भर में निहाल कर देते हैं।

उपदेश और चेतावनी
262

साईं सेती चोरियाँ, चोरा सेती गुझ।
जाणेगा रे जीवएगा, मार पड़ैगी तुझ॥

स्वामी से छिपाव और चोरों से मेल-जोल! अरे, जीते-जी समझ ले—अंत में मार तुझे ही पड़ेगी। ईश्वर से कुछ छिपा नहीं रहता।

उपदेश और चेतावनी
272

कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तू बसै।
नहिंतर बेगि उठाइ, नित का गंजर को सहै॥

हे प्रभु, मुझे उससे मिला दो जिसके हृदय में तू बसता है। नहीं तो मुझे शीघ्र उठा ही लो—यह नित्य की छटपटाहट कौन सहे?

उपदेश और चेतावनी
306

फाटै दीदै मैं फिरों, नजिर न आवै कोई।
जिहि घटि मेरा साइयाँ, सो क्यूँ छाना होई॥

मैं आँखें फाड़-फाड़कर देखता फिरता हूँ, पर कोई दिखाई नहीं देता। जिस हृदय में मेरा स्वामी बसा हो, वह भला छिपा कैसे रह सकता है?

उपदेश और चेतावनी
313

कबीर दुबिधा दूरि करि, एक अंग है लागि।
यहु सीतल बहु तपति है, दोऊ कहिये आगि॥

दुविधा को दूर करके एक ही पक्ष से जुड़ जाओ। यह शीतल है और वह अत्यंत तप्त—पर दुविधा में रहते हुए दोनों ही आग के समान जलाते हैं।

उपदेश और चेतावनी
315

रचनाहार कूं चीन्हि लै, खैबे कूं कहा रोइ।
दिल मंदि में पैसि करि, ताणि पछेवड़ा सोइ॥

उस रचयिता को पहचान ले, खाने-पीने के लिए क्या रोना? हृदय रूपी मंदिर में प्रवेश करके चादर तानकर निश्चिंत सो जा।

उपदेश और चेतावनी
322

अब तौ जूझ्या ही बणै, मुडि चल्याँ घर दूर।
सिर साहिबा कौ सोंपता, सोंच न कीजै सूर॥

अब तो जूझना ही बनेगा, लौटकर जाएँ तो घर बहुत दूर है। हे वीर! सिर स्वामी को सौंपते समय सोच-विचार मत कर। समर्पण में हिचक नहीं चलती।

उपदेश और चेतावनी
326

जेते तारे रैणि के, तेतै बैरी मुझ।
धड़ सूली सिर कंगुरै, तऊ न बिसारौ तुझ॥

रात के जितने तारे हैं, उतने ही मेरे शत्रु हैं। धड़ सूली पर हो और सिर कँगूरे पर टँगा हो, तब भी मैं तुझे न भूलूँ। निष्ठा की चरम घोषणा।

उपदेश और चेतावनी
333

जिसहि न कोई विसहि तू, जिस तू तिस सब कोई।
दरिगह तेरी साइयाँ, जा मरूम कोइ होइ॥

जिसका कोई नहीं, उसका तू है; और जिसका तू है, उसका सब कोई है। हे स्वामी, तेरा दरबार ऐसा है जहाँ हर कोई स्वीकार पाता है।

उपदेश और चेतावनी
334

साईँ मेरा वाणियाँ, सहित करै व्यौपार।
बिन डाँड़ी बिन पालड़ै, तौले सब संसार॥

मेरा स्वामी एक व्यापारी है जो न्यायपूर्वक व्यापार करता है। वह बिना तराजू और बिना पलड़े के ही सारे संसार को तौल लेता है।

उपदेश और चेतावनी
335

झल बावै झल दाहिनै, झलहि माहि त्योहार।
आगै-पीछै झलमाई, राखै सिरजनहार॥

बाएँ ज्वाला है, दाएँ ज्वाला, आगे-पीछे भी ज्वाला ही है—और उसी के बीच उत्सव मनाना है। रक्षा करने वाला तो सृजनहार ही है।

उपदेश और चेतावनी
343

जो ऊग्या सो आंथवै, फूल्या सो कुमिलाइ।
जो चिणियां सो ढहि पड़ै, जो आया सो जाइ॥

जो उगा है वह अस्त होगा, जो खिला है वह मुरझाएगा। जो चुना गया है वह ढह जाएगा और जो आया है वह जाएगा। यही अटल नियम है।

उपदेश और चेतावनी
344

सीतलता तब जाणियें, समिता रहै समाइ।
पष छाँड़ै निरपष रहै, सबद न देष्या जाइ॥

शीतलता तभी आई मानो जब समता भीतर समा जाए। पक्षपात छोड़कर निष्पक्ष हो जाए और शब्दों के आडंबर से परे हो जाए।

उपदेश और चेतावनी
350

क्या मुख लै बिनती करों, लाज आवत है मोहि।
तुम देखत ओगुन करों, कैसे भावों तोहि॥

किस मुँह से प्रार्थना करूँ, मुझे लज्जा आती है। तुम्हारे देखते हुए ही अवगुण करता हूँ, फिर तुम्हें कैसे भाऊँगा?

उपदेश और चेतावनी
791

लेना है सो जल्द ले, कही सुनी मान।
कहीं सुनी जुग जुग चली, आवागमन बँधान॥

जो लेना है जल्दी ले लो, यह कही-सुनी बात मान लो। सुनी-सुनाई बातें युग-युग से चली आ रही हैं और आवागमन का बंधन बना ही रहा।

उपदेश और चेतावनी