कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर।
ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेर॥
लोहा तो एक ही है, अंतर गढ़ने में है। उसी से कवच बनता है जो रक्षा करता है और उसी से तलवार जो प्रहार करती है। संस्कार ही मनुष्य की दिशा तय करते हैं।
उपदेश और चेतावनी