धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

अर्थ

हे मन! धैर्य रख, सब कुछ अपने समय पर ही होता है। माली चाहे सौ घड़े पानी डाल दे, फल तभी लगेगा जब उसकी ऋतु आएगी। जल्दबाजी से नहीं, प्रतीक्षा और निरंतर प्रयास से फल मिलता है।

उपदेश और चेतावनी

उपदेश और चेतावनी पर और दोहे

024

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

जो कल करना है उसे आज कर लो और जो आज करना है उसे अभी कर लो। पल भर में सब कुछ समाप्त हो सकता है, फिर करने का अवसर कब मिलेगा? यह अकर्मण्यता के विरुद्ध चेतावनी है।

उपदेश और चेतावनी
057

जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय।
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय॥

जो जागते हुए भी संसार से सोया-सा रहे और साधना में लगन लगाए रखे—उसकी सुरति की डोर प्रभु से ऐसी जुड़ी रहती है कि वह तार कभी टूटता नहीं।

उपदेश और चेतावनी
076

दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गरजी।
कह कबीर आसमान फटा, क्यों कर सीवे दरजी॥

दिल का घाव भरने वाला कोई नहीं मिला; जो मिला वह भी स्वार्थी निकला। कबीर कहते हैं—जब आसमान ही फट जाए तो दर्जी उसे कैसे सिएगा? कुछ पीड़ाएँ सांसारिक उपायों से परे हैं।

उपदेश और चेतावनी
089

मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहिं दोष।
यह कबीरा बैठा रहे, तो सिर करड़े दोष॥

जो चलते हुए गिर गया, उसका कोई दोष नहीं। पर कबीर कहते हैं—जो चला ही नहीं, बैठा ही रह गया, दोष उसके सिर पर है। प्रयास करके असफल होना निष्क्रियता से बेहतर है।

उपदेश और चेतावनी