आज का दोहा › अहंकार और गर्व

अहंकार और गर्व पर कबीर के दोहे

32 दोहे · अर्थ सहित

002

तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय।
कबहुँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होय॥

पाँव के नीचे पड़े छोटे-से तिनके को भी तुच्छ समझकर उसका अपमान मत करो। वही तिनका यदि कभी उड़कर आँख में पड़ जाए तो असहनीय पीड़ा देता है। किसी को छोटा मानकर तिरस्कार करना उचित नहीं।

अहंकार और गर्व
018

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय॥

मिट्टी कुम्हार से कहती है—आज तू मुझे रौंद रहा है, पर एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुझे अपने भीतर समेट लूँगी। अहंकार व्यर्थ है; अंत में सबको इसी माटी में मिलना है।

अहंकार और गर्व
026

जहाँ आपा तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग।
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग॥

जहाँ अहंकार है वहाँ विपत्ति है, और जहाँ संदेह है वहाँ रोग। कबीर कहते हैं—ये विकार तभी मिटते हैं जब मन में धैर्य आ जाए। अहं और संशय ही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।

अहंकार और गर्व
037

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय।
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय॥

यदि मन शांत हो तो संसार में कोई शत्रु नहीं रह जाता। बस अपना अहंकार छोड़ दो, फिर सब तुम पर स्नेह और दया करने लगेंगे। बैर बाहर नहीं, भीतर के अहं में है।

अहंकार और गर्व
040

अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक होय।
मानुष से पशुआ भया, दाम गाँठ से खोय॥

शराब के अवगुण गिनाऊँ तो पहला यही कि वह मनुष्य को मूर्ख और अहंकारी बना देती है। वह आदमी को पशु बना देती है और गाँठ का धन भी गँवा देती है।

अहंकार और गर्व
044

पतिव्रता मैली भली, काली कुचल कुरूप।
पतिव्रता के रूप पर, वारो कोटि सरूप॥

पतिव्रता स्त्री यदि मैली, काली या कुरूप भी हो तो भी श्रेष्ठ है। उसके शील-सौंदर्य पर करोड़ों रूपवती स्त्रियाँ न्योछावर हैं। बाहरी सुंदरता से चरित्र बड़ा है।

अहंकार और गर्व
082

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाहिं॥

जब तक 'मैं' यानी अहंकार था, तब तक गुरु नहीं मिले; अब गुरु हैं तो 'मैं' नहीं रहा। प्रेम की गली इतनी सँकरी है कि उसमें दो नहीं समा सकते—अहं और प्रेम साथ नहीं रह सकते।

अहंकार और गर्व
086

ऊँचे पानी न टिके, नीचे ही ठहराय।
नीचा हो सो भरिए पिए, ऊँचा प्यासा जाय॥

पानी ऊँचाई पर नहीं ठहरता, वह नीचे ही जमा होता है। जो विनम्र होकर झुकता है वह भरकर पीता है, और अहंकार में ऊँचा बना रहने वाला प्यासा ही लौट जाता है।

अहंकार और गर्व
087

सब ते लघुताई भली, लघुता ते सब होय।
जैसे दूज का चंद्रमा, शीश नवे सब कोय॥

सबसे अच्छी बात है छोटा बने रहना—लघुता से ही सब कुछ सिद्ध होता है। जैसे दूज के पतले चंद्रमा को सब सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं, पूर्णिमा के चाँद को नहीं।

अहंकार और गर्व
119

एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गार।
है जैसा तैसा हो रहे, रहें कबीर विचार॥

उसे 'एक' कहूँ तो वह वैसा है नहीं, और 'दो' कहूँ तो यह उसका अपमान होगा। वह जैसा है वैसा ही रहने दो—कबीर विचार कर यही कहते हैं। परम तत्त्व शब्दों से परे है।

अहंकार और गर्व
140

कबीरा गरब न कीजिए, कबहूँ न हँसिये कोय।
अजहूँ नाव समुद्र में, ना जाने का होय॥

अभिमान मत करो और किसी की हँसी मत उड़ाओ। तुम्हारी नाव अभी समुद्र के बीच में है, न जाने आगे क्या हो। दूसरे की दुर्दशा पर हँसने वाला अपनी बारी भूल जाता है।

अहंकार और गर्व
177

बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पँछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

बड़ा होने से क्या लाभ, यदि खजूर के पेड़ जैसा हो—जो न पक्षी को छाया देता है और जिसके फल इतने ऊँचे लगते हैं कि किसी के काम नहीं आते। बड़प्पन उपयोगिता से है।

अहंकार और गर्व
200

तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूँ।
वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तू॥

'तू-तू' करते-करते मैं स्वयं तू ही हो गया, मुझमें 'मैं' बची ही नहीं। अब जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है। यह अहं के विसर्जन की चरम अवस्था है।

अहंकार और गर्व
249

कबीर जग की जो कहै, भौ जलि बूड़ै दास।
पारब्रह्म पति छाँड़ि करि, करै मानि की आस॥

जो संसार की वाहवाही की परवाह करता है, वह भवसागर में डूब जाता है। परब्रह्म रूपी स्वामी को छोड़कर वह मान-सम्मान की आशा में लगा रहता है।

अहंकार और गर्व
253

करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तुंड।
जाने-बूझै कुछ नहीं, यों ही अंधा रुंड॥

मुँह ऊँचा करके जोर-जोर से कीर्तन करता दिखाई देता है, पर जानता-समझता कुछ नहीं। ऐसा व्यक्ति बिना सिर के अंधे धड़ के समान है।

अहंकार और गर्व
291

मैं-मैं बड़ी बलाइ है, सकै तो निकसौ भाजि।
कब लग राखौ हे सखी, रूई लपेटी आगि॥

यह 'मैं-मैं' बड़ी विपत्ति है, हो सके तो इससे भाग निकलो। हे सखी, रूई में लपेटी आग को कब तक सँभालकर रखोगी? अहंकार अंततः सब जला देता है।

अहंकार और गर्व
327

आपा भेटियाँ हरि मिलै, हरि मेल्या सब जाइ।
अकथ कहाणी प्रेम की, कह्या न कोउ पत्याइ॥

अहंकार का त्याग करने पर हरि मिलते हैं और हरि मिल जाएँ तो सब कुछ मिल जाता है। प्रेम की यह कहानी अकथनीय है—कहने पर कोई विश्वास ही नहीं करता।

अहंकार और गर्व
660

कबीर गर्ब न कीजिये, चाम लपेटी हाड़।
हयबर ऊपर छत्रवट, तो भी देवें गाड़॥

इस चमड़े में लिपटी हड्डियों पर अभिमान मत करो। चाहे घोड़े पर छत्र लगाकर चलो, अंत में सब इसी मिट्टी में गाड़ दिए जाओगे।

अहंकार और गर्व
746

समुझाये समुझे नहीं, धरे बहुत अभिमान।
गुरु का शब्द उछेद है, कहत सकल हम जान॥

समझाने पर भी नहीं समझता और बहुत अभिमान धारण किए रहता है। गुरु के शब्द की काट करता है और कहता है कि हम सब जानते हैं।

अहंकार और गर्व
770

हाथी परबत फाड़ते, समुंदर छूट भराय।
ते मुनिवर धरती गले, का कोई गरब कराय॥

जो हाथी और पर्वत तक चीर देते थे और समुद्र भर देते थे, वे मुनिवर भी धरती में गल गए। फिर कोई किस बात का गर्व करे?

अहंकार और गर्व