कबीरा गरब न कीजिए, कबहूँ न हँसिये कोय।
अजहूँ नाव समुद्र में, ना जाने का होय॥

अर्थ

अभिमान मत करो और किसी की हँसी मत उड़ाओ। तुम्हारी नाव अभी समुद्र के बीच में है, न जाने आगे क्या हो। दूसरे की दुर्दशा पर हँसने वाला अपनी बारी भूल जाता है।

अहंकार और गर्व

अहंकार और गर्व पर और दोहे

002

तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय।
कबहुँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होय॥

पाँव के नीचे पड़े छोटे-से तिनके को भी तुच्छ समझकर उसका अपमान मत करो। वही तिनका यदि कभी उड़कर आँख में पड़ जाए तो असहनीय पीड़ा देता है। किसी को छोटा मानकर तिरस्कार करना उचित नहीं।

अहंकार और गर्व
018

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय॥

मिट्टी कुम्हार से कहती है—आज तू मुझे रौंद रहा है, पर एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुझे अपने भीतर समेट लूँगी। अहंकार व्यर्थ है; अंत में सबको इसी माटी में मिलना है।

अहंकार और गर्व
026

जहाँ आपा तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग।
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग॥

जहाँ अहंकार है वहाँ विपत्ति है, और जहाँ संदेह है वहाँ रोग। कबीर कहते हैं—ये विकार तभी मिटते हैं जब मन में धैर्य आ जाए। अहं और संशय ही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।

अहंकार और गर्व
037

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय।
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय॥

यदि मन शांत हो तो संसार में कोई शत्रु नहीं रह जाता। बस अपना अहंकार छोड़ दो, फिर सब तुम पर स्नेह और दया करने लगेंगे। बैर बाहर नहीं, भीतर के अहं में है।

अहंकार और गर्व