आज का दोहा › वाणी और व्यवहार

वाणी और व्यवहार पर कबीर के दोहे

12 दोहे · अर्थ सहित

021

जो तोकू काँटा बुवे, ताहि बोय तू फूल।
तोकू फूल के फूल है, वाकू है त्रिशूल॥

जो तुम्हारे लिए काँटे बोए, तुम उसके लिए फूल बोओ। तुम्हें फूल के बदले फूल ही मिलेंगे, जबकि उसके हिस्से त्रिशूल-सी पीड़ा आएगी। बुराई का उत्तर भलाई से देना ही श्रेष्ठ है।

वाणी और व्यवहार
030

गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच॥

गाली-गलौज से ही झगड़ा, कष्ट और मृत्यु तक उपज जाती है। जो विवाद में हार मानकर हट जाए वह साधु है, और जो उलझने चला जाए वह नीच है।

वाणी और व्यवहार
034

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥

ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार न हो। ऐसे वचन दूसरों को शांति देते हैं और बोलने वाले का मन भी शीतल कर देते हैं। मधुर वाणी दोनों ओर सुख देती है।

वाणी और व्यवहार
036

कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार।
साधु वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार॥

कठोर और कुटिल वचन सबसे बुरे हैं—वे शरीर और मन को जलाकर राख कर देते हैं। संत के वचन जल के समान हैं, जो अमृत की धारा बनकर बरसते हैं और शीतलता देते हैं।

वाणी और व्यवहार
048

जाके जिह्वा बंधन नहीं, हृदय में नहीं साँच।
वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच॥

जिसकी जीभ पर कोई संयम नहीं और हृदय में सच्चाई नहीं, उसका साथ मत करो। ऐसे व्यक्ति का संग काँच चबाने जैसा है—भीतर से घायल कर देता है।

वाणी और व्यवहार
077

बानी से पहचानिये, साम चोर की घात।
अंदर की करनी से सब, निकले मुँह की बात॥

मनुष्य की पहचान उसकी वाणी से होती है—सज्जन की भी और चोर की भी। भीतर जो करनी और भाव होते हैं, वे ही मुख से बाहर निकल आते हैं। वाणी भीतर का दर्पण है।

वाणी और व्यवहार
136

आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक।
कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक॥

आती हुई गाली एक होती है, पर उसका उत्तर देने पर वह अनेक हो जाती है। कबीर कहते हैं—पलटकर मत बोलो, तब वह एक की एक ही रह जाएगी और वहीं शांत हो जाएगी।

वाणी और व्यवहार
153

कागा काको धन हरे, कोयल काको देय।
मीठे शब्द सुनाय के, जग अपनो कर लेय॥

कौआ किसी का धन नहीं छीनता और कोयल किसी को कुछ देती नहीं। फिर भी कोयल मीठे बोल से सारा जग अपना बना लेती है। वाणी की मिठास ही लोगों को जोड़ती है।

वाणी और व्यवहार
270

जेता मीठा बोलणा, तेता साधन जारिंग।
पहली था दिखाइ करि, उडै देसी आरिंग॥

जो जितना मीठा बोलता है, उतना ही साधना को जला भी सकता है। पहले लुभावना दिखाकर फिर धोखा दे जाता है। अति मधुर वचन में छल छिपा हो सकता है।

वाणी और व्यवहार
351

सब काहू का लीजिये, साचाँ सबद निहार।
पच्छपात ना कीजिये, कहै कबीर विचार॥

सच्चा वचन जहाँ से भी मिले, सबसे ग्रहण कर लो। पक्षपात मत करो—कबीर विचार कर यही कहते हैं। सत्य किसी एक की बपौती नहीं।

वाणी और व्यवहार
443

साकट का मुख बिंब है, निकसत बचन भुवंग।
ताकि औषध मौन है, विष नहिं व्यापै अंग॥

नास्तिक का मुख बिल है जिससे साँप जैसे वचन निकलते हैं। इसकी औषधि मौन है—चुप रहने से उसका विष शरीर पर नहीं चढ़ता।

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