गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच॥

अर्थ

गाली-गलौज से ही झगड़ा, कष्ट और मृत्यु तक उपज जाती है। जो विवाद में हार मानकर हट जाए वह साधु है, और जो उलझने चला जाए वह नीच है।

वाणी और व्यवहार

वाणी और व्यवहार पर और दोहे

021

जो तोकू काँटा बुवे, ताहि बोय तू फूल।
तोकू फूल के फूल है, वाकू है त्रिशूल॥

जो तुम्हारे लिए काँटे बोए, तुम उसके लिए फूल बोओ। तुम्हें फूल के बदले फूल ही मिलेंगे, जबकि उसके हिस्से त्रिशूल-सी पीड़ा आएगी। बुराई का उत्तर भलाई से देना ही श्रेष्ठ है।

वाणी और व्यवहार
034

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥

ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार न हो। ऐसे वचन दूसरों को शांति देते हैं और बोलने वाले का मन भी शीतल कर देते हैं। मधुर वाणी दोनों ओर सुख देती है।

वाणी और व्यवहार
036

कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार।
साधु वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार॥

कठोर और कुटिल वचन सबसे बुरे हैं—वे शरीर और मन को जलाकर राख कर देते हैं। संत के वचन जल के समान हैं, जो अमृत की धारा बनकर बरसते हैं और शीतलता देते हैं।

वाणी और व्यवहार
048

जाके जिह्वा बंधन नहीं, हृदय में नहीं साँच।
वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच॥

जिसकी जीभ पर कोई संयम नहीं और हृदय में सच्चाई नहीं, उसका साथ मत करो। ऐसे व्यक्ति का संग काँच चबाने जैसा है—भीतर से घायल कर देता है।

वाणी और व्यवहार