आज का दोहा › गुरु महिमा

गुरु महिमा पर कबीर के दोहे

136 दोहे · अर्थ सहित

004

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय॥

गुरु और ईश्वर दोनों सामने खड़े हों तो पहले किसके चरण छुऊँ? कबीर कहते हैं—गुरु ही श्रेष्ठ हैं, क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग उन्हीं ने दिखाया है। गुरु की महिमा ईश्वर से भी बड़ी है।

गुरु महिमा
005

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवत किया, करत न लागी बार॥

अपने गुरु पर मैं हर घड़ी सैकड़ों बार न्योछावर हूँ। उन्होंने एक साधारण मनुष्य को देवता के समान बना दिया और इसमें उन्हें देर भी न लगी। गुरु का संस्कार व्यक्ति को पूरी तरह बदल देता है।

गुरु महिमा
013

कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर॥

कबीर कहते हैं—वे लोग अंधे हैं जो गुरु को साधारण मनुष्य समझते हैं। यदि ईश्वर रूठ जाएँ तो गुरु शरण दे सकते हैं, किंतु गुरु ही रूठ जाएँ तो कहीं ठिकाना नहीं बचता।

गुरु महिमा
047

राम रहे बन भीतरे, गुरु की पूजा ना आस।
रहे कबीर पाखंड सब, झूठे सदा निराश॥

जो राम को केवल वन में खोजता है और गुरु की सेवा-पूजा की परवाह नहीं करता, कबीर कहते हैं—वह सब पाखंड है। ऐसे झूठे साधक सदा निराश ही रहते हैं।

गुरु महिमा
049

तीरथ गये ते एक फल, संत मिले फल चार।
सद्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार॥

तीर्थ जाने से एक फल मिलता है, संत के मिलने से चार गुना। पर सद्गुरु मिल जाएँ तो अनगिनत फल मिलते हैं—कबीर विचार कर यही कहते हैं। गुरु-प्राप्ति सर्वोपरि है।

गुरु महिमा
104

सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय॥

सारी धरती को कागज बना लूँ, समस्त वनों को कलम और सातों समुद्रों की स्याही बना लूँ—तब भी गुरु के गुण लिखे नहीं जा सकते। गुरु की महिमा अवर्णनीय है।

गुरु महिमा
127

गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हर का सेव।
कहे कबीर बैकुंठ से, फेर दिया शुकदेव॥

गुरु के बिना केवल भगवान की सेवा में लगे रहने से काम नहीं चलता। कबीर कहते हैं—गर्भ से ही योगी शुकदेव तक को बैकुंठ के द्वार से लौटा दिया गया, क्योंकि उन्होंने गुरु नहीं किया था।

गुरु महिमा
129

काँचे भाँडे से रहे, ज्यों कुम्हार का देह।
भीतर से रक्षा करे, बाहर चोई देह॥

जैसे कुम्हार कच्चे घड़े को सँभालता है—भीतर हाथ का सहारा देता है और बाहर से थपकी मारता है—वैसे ही गुरु शिष्य को भीतर से सँभालते और बाहर से ताड़ते हैं।

गुरु महिमा
154

कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानई, सो काफिर के पीर॥

सच्चा संत वही है जो दूसरे की पीड़ा को समझे। जो पराई पीड़ा नहीं जानता, वह गुरु कहलाने योग्य नहीं। संवेदना ही संतत्व की कसौटी है।

गुरु महिमा
196

ना गुरु मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव।
दुन्यूँ बूड़े धार में, चढ़ि पाथर की नाव॥

न सच्चा गुरु मिला और न कोई सच्चा शिष्य बना—दोनों ने लालच का दाँव खेला। परिणाम यह कि दोनों पत्थर की नाव पर चढ़कर धार में डूब गए।

गुरु महिमा
198

कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीष।
स्वाँग जती का पहिरि करि, धरि-धरि माँगे भीष॥

जिसे सतगुरु नहीं मिला, उसकी शिक्षा अधूरी रह गई। वह संन्यासी का स्वाँग रचकर घर-घर भीख माँगता फिरता है। बिना गुरु के साधना केवल वेश बनकर रह जाती है।

गुरु महिमा
231

कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि घरी खटाइ।
राज-दुबारा यों फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ॥

कलियुग का गुरु लोभी हो गया है, पीतल को खटाई से चमकाकर सोना बताता है। वह राजदरबार के चक्कर ऐसे काटता है जैसे खेत उजाड़ने वाली गाय।

गुरु महिमा
233

इहि उदर के कारणे, जग पाच्यो निस जाम।
स्वामी-पणौ जो सिरि चढ़यो, सिर यो न एको काम॥

इस पेट के कारण सारा जगत रात-दिन खपता रहता है। और जिसके सिर पर गुरु होने का अहंकार चढ़ गया, उससे एक भी सच्चा काम नहीं बना।

गुरु महिमा
236

कलि का स्वमी लोभिया, मनसा घरी बधाई।
दैंहि पईसा ब्याज़ को, लेखां करता जाई॥

कलियुग का गुरु लोभी है, उसकी कामनाएँ घर भर गई हैं। वह ब्याज पर पैसा देता है और हिसाब लगाता रहता है—गुरु कम, महाजन अधिक।

गुरु महिमा
247

कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खाँड़।
सतगुरु की कृपा भई, नहीं तौ करती भाँड़॥

माया मोहिनी है, मीठी शक्कर जैसी लुभावनी। सतगुरु की कृपा हो गई इसलिए बच गया, नहीं तो वह मुझे भी विदूषक बना देती।

गुरु महिमा
353

गुरु को कीजै दंडवत, कोटि-कोटि परनाम।
कीट न जाने भृंग को, गुरु करले आप समान॥

गुरु को कोटि-कोटि प्रणाम और दंडवत करो। जैसे भृंगी कीड़े को अपने समान बना लेती है, वैसे ही गुरु शिष्य को अपने समान बना लेते हैं।

गुरु महिमा
354

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम-जनम का मोरचा, पल में डारे धोय॥

शिष्य कुबुद्धि के कीचड़ से भरा है और गुरु का ज्ञान जल के समान। वह जल जन्म-जन्म का जमा हुआ मैल पल भर में धो देता है।

गुरु महिमा
355

गुरु पारस को अंतरो, जानत है सब संत।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत॥

गुरु और पारस का अंतर सब संत जानते हैं। पारस लोहे को सोना भर बनाता है, पर गुरु शिष्य को अपने ही समान महान बना देते हैं।

गुरु महिमा
357

जो गुरु बसै बनारसी, सीष समुंदर तीर।
एक पलक बिसरे नहीं, जो गुण होय शरीर॥

गुरु काशी में बसें और शिष्य समुद्र के किनारे—फिर भी यदि शिष्य में सच्चे गुण हों तो एक पल के लिए भी गुरु विस्मृत नहीं होते। दूरी बाधा नहीं है।

गुरु महिमा
359

गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा—वह गढ़-गढ़कर खोट निकालता है। भीतर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से चोट मारता है। अनुशासन में भी करुणा छिपी होती है।

गुरु महिमा
361

लच्छ कोष जो गुरु बसै, दीजै सुरति पठाय।
शब्द तुरी बसवार है, छिन आवै छिन जाय॥

गुरु लाखों कोस दूर भी बसें तो अपनी सुरति उन तक भेज दो। शब्द ऐसा घोड़ा है जो पल में जाता है और पल में लौट आता है।

गुरु महिमा
362

गुरु मूरति गति चंद्रमा, सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखता रहे, गुरु मूरति की ओर॥

गुरु की मूर्ति चंद्रमा के समान है और सेवक के नेत्र चकोर के। वह आठों पहर गुरु की ओर ही टकटकी लगाए देखता रहता है।

गुरु महिमा
363

गुरु सों प्रीति निबाहिये, जेहि तत निबटै संत।
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रेम निकट गुरु कंत॥

गुरु से प्रीति निभाओ, इसी से तत्त्व का निर्णय होता है। प्रेम के बिना पास रहकर भी गुरु दूर हैं और प्रेम हो तो दूर रहकर भी निकट।

गुरु महिमा
364

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष॥

गुरु के बिना न ज्ञान उपजता है, न मोक्ष मिलता है। गुरु के बिना न सत्य दिखाई देता है और न दोष मिटते हैं।

गुरु महिमा
365

गुरु मूरति आगे खड़ी, दुनिया भेद कछु नाहिं।
उन्हीं कूँ परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं॥

गुरु की मूर्ति सामने खड़ी हो तो दुनिया का कोई भेद शेष नहीं रहता। उन्हीं को प्रणाम करने से सारा अंधकार मिट जाता है।

गुरु महिमा
367

सिष खाँडा गुरु भसकला, चढ़ै शब्द खरसान।
शब्द सहै सम्मुख रहै, निपजै शीष सुजान॥

शिष्य तलवार है और गुरु सान चढ़ाने वाला—शब्द की सान पर वह चढ़ता है। जो शब्द की चोट सहकर सामने डटा रहे, वही सुयोग्य शिष्य बनता है।

गुरु महिमा
368

ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास।
गुरु सेवा ते पाइये, सद्गुरु चरण निवास॥

ज्ञान, सत्संग, प्रेम, सुख, दया, भक्ति और विश्वास—ये सब गुरु की सेवा से मिलते हैं, और अंत में सद्गुरु के चरणों में निवास प्राप्त होता है।

गुरु महिमा
369

अहं अग्नि निशि दिन जरै, गुरु सो चाहे मान।
ताको जम न्योता दिया, होउ हमार मेहमान॥

जो अहंकार की आग में रात-दिन जलता है और गुरु से भी सम्मान चाहता है—यमराज ने उसे न्योता दे रखा है कि आओ, हमारे मेहमान बनो।

गुरु महिमा
370

जैसी प्रीति कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय।
कहें कबीर ता दास का, पला न पकड़ै कोय॥

जैसी प्रीति परिवार से होती है, वैसी ही गुरु से हो जाए—कबीर कहते हैं तो उस सेवक का दामन काल भी नहीं पकड़ सकता।

गुरु महिमा
373

सोइ-सोइ नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम।
कहै कबीर गुरु प्रेम बिन, कतहुँ कुशल नहि क्षेम॥

वही नाच नाचो जिससे गुरु का प्रेम निभे। कबीर कहते हैं—गुरु के प्रेम बिना कहीं कुशल-क्षेम नहीं है।

गुरु महिमा
375

कोटिन चंदा उगही, सूरज कोटि हज़ार।
तीमिर तौ नाशै नहीं, बिन गुरु घोर अंधार॥

करोड़ों चंद्रमा उग आएँ और हजारों करोड़ सूर्य—फिर भी वह अंधकार नहीं मिटता। गुरु के बिना घोर अँधेरा बना ही रहता है।

गुरु महिमा
376

तबही गुरु प्रिय बनै कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत।
ते रहियें गुरु सनमुखाँ, कबहूँ न दीजै पीठ॥

जब शिष्य के चित्त में प्रीति बढ़ती है तभी गुरु प्रिय लगते हैं। इसलिए सदा गुरु के सम्मुख रहो, कभी पीठ मत दिखाओ।

गुरु महिमा
377

तन मन शीष निछावरै, दीजै सरबस प्रान।
कहें कबीर गुरु प्रेम बिन, कितहूँ कुशल नहिं क्षेम॥

तन, मन और सिर न्योछावर कर दो, प्राण तक सर्वस्व दे दो। कबीर कहते हैं—गुरु के प्रेम बिना कहीं कल्याण नहीं।

गुरु महिमा
378

जो गुरु पूरा होय तो, शीषहि लेय निबाहि।
शीष भाव सुत्त जानिये, सुत ते ज्येष्ठ शिष आहि॥

यदि गुरु पूर्ण हों तो शिष्य को अंत तक निभा ले जाते हैं। शिष्य को पुत्र के भाव से देखा जाता है—बल्कि शिष्य पुत्र से भी बढ़कर होता है।

गुरु महिमा
382

अबुध सुबुध सुत मातु पितु, सबहि करै प्रतिपाल।
अपनी ओर निबाहिये, सिख सुत गहि निज चाल॥

माता-पिता मूर्ख और बुद्धिमान—सभी संतानों का पालन करते हैं। इसी तरह गुरु भी सबको निभाते हैं; शिष्य को चाहिए कि वह अपनी ओर से मर्यादा निभाए।

गुरु महिमा
385

साबुन बिचारा क्या करे, गाँठे राखे मोय।
जल सो अरसाँ नहिं, क्यों कर ऊजल होय॥

बेचारा साबुन क्या करे, यदि उसे गाँठ में ही बाँधकर रखा जाए और जल से उसका स्पर्श ही न हो? फिर कपड़ा उजला कैसे होगा—गुरु का उपदेश भी लागू करने से ही फलता है।

गुरु महिमा
386

सद्गुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय।
धन्य शीष धन भाग तिहि, जो ऐसी सुधि पाय॥

सद्गुरु स्वयं सद्भाव हैं जो ऐसा गूढ़ भेद बता देते हैं। धन्य है वह शिष्य और धन्य उसका भाग्य जिसे ऐसी सुध मिल जाए।

गुरु महिमा
387

सतगुरु शरण न आवहीं, फिर फिर होय अकाज।
जीव खोय सब जायेंगे, काल तिहूँ पुर राज॥

जो सतगुरु की शरण में नहीं आते, उनका बार-बार काम बिगड़ता है। वे जीवन खोकर चले जाएँगे, क्योंकि तीनों लोकों में काल का ही राज है।

गुरु महिमा
389

सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भाँड तोड़ि करि, रहै निराला होय॥

सतगुरु मिल गए, यह तभी जानो जब भीतर ज्ञान का उजाला हो जाए। तब भ्रम का घड़ा टूट जाता है और साधक निर्लिप्त हो जाता है।

गुरु महिमा
391

जेहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव।
कहै कबीर सुन साधवा, करु सतगुरु की सेव॥

जिसे खोजते-खोजते ब्रह्मा, देवता, मनुष्य और मुनि तक थक गए—कबीर कहते हैं, हे साधु! उसे पाने के लिए सतगुरु की सेवा करो।

गुरु महिमा
392

मनहि दिया निज सब दिया, मन से संग शरीर।
अब देवे को क्या रहा, यों कहि कहहिं कबीर॥

मन दे दिया तो सब दे दिया, क्योंकि मन के साथ शरीर भी चला जाता है। अब देने को शेष क्या रहा—कबीर यही कहते हैं।

गुरु महिमा
393

सतगुरु को माने नहीं, अपनी कहै बनाय।
कहै कबीर क्या कीजिये, और मता मन जाय॥

जो सतगुरु को नहीं मानता और अपनी ही गढ़ी बात कहता है—कबीर कहते हैं उसका क्या किया जाए, उसका मन तो दूसरे मतों में भटकता रहता है।

गुरु महिमा
394

जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान।
तामें निपट अनूप है, सतगुरु लागा कान॥

संसार में साधु-संग और गुरु-ज्ञान से बढ़कर कोई उपाय नहीं। और उसमें भी सबसे अनुपम है सतगुरु का उपदेश कान में पड़ जाना।

गुरु महिमा
396

बिन सतगुरु उपदेश, सुर नर मुनि नहिं निस्तरे।
ब्रह्मा-विष्णु महेश, और सकल जिव को गिनै॥

सतगुरु के उपदेश बिना देवता, मनुष्य और मुनि तक पार नहीं उतरते। जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश का यह हाल है तो साधारण जीवों की क्या गिनती।

गुरु महिमा
397

केते पढ़ि गुनि पचि भए, योग यज्ञ तप लाय।
बिन सतगुरु पावै नहीं, कोटिन करे उपाय॥

कितने ही लोग पढ़-गुनकर और योग, यज्ञ, तप करके खप गए। सतगुरु के बिना करोड़ों उपाय करने पर भी कुछ नहीं मिलता।

गुरु महिमा
400

करहु छोड़ कुल लाज, जो सतगुरु उपदेश है।
होये सब जिव काज, निश्चय करि परतीत करू॥

कुल की झूठी लाज छोड़कर सतगुरु के उपदेश पर चलो। निश्चय और विश्वास कर लो तो जीव के सारे कार्य सिद्ध हो जाएँगे।

गुरु महिमा
401

यह सतगुरु उपदेश है, जो मन माने परतीत।
करम भरम सब त्यागि के, चलै सो भव जल जीत॥

सतगुरु का उपदेश यही है कि मन में पूर्ण विश्वास हो। जो कर्मकांड और भ्रम सब त्यागकर चले, वही भवसागर जीत लेता है।

गुरु महिमा
402

जग सब सागर मोहि, कहु कैसे बूड़त तेरे।
गहु सतगुरु की बाँहि, जो जल थल रक्षा करै॥

सारा जगत मोह का सागर है, इसमें डूबने से कैसे बचोगे? सतगुरु की बाँह पकड़ लो, वे जल और थल दोनों में रक्षा करते हैं।

गुरु महिमा
405

गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव।
दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव॥

गुरु लोभी और शिष्य लालची—दोनों ने अपना-अपना दाँव खेला। परिणाम यह कि दोनों बेचारे पत्थर की नाव पर चढ़कर डूब गए।

गुरु महिमा
407

गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं।
भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहिं॥

जिसने केवल देहधारी को गुरु बना लिया और सच्चे सतगुरु को नहीं पहचाना, वह भवसागर के जाल में बार-बार गोते खाता रहता है।

गुरु महिमा
409

कबीर गुरु है घाट का, हाँटू बैठा चेल।
मूड़ मुड़ाया साँझ कूँ, गुरु सबेरे ठेल॥

आजकल गुरु घाट पर बैठा है और चेला हाट में। साँझ को सिर मुँड़ाया और सबेरे गुरु को ठेल दिया—ऐसे संबंध में निष्ठा कहाँ?

गुरु महिमा
410

गुरु-गुरु में भेद है, गुरु-गुरु में भाव।
सोइ गुरु नित बंदिये, शब्द बतावे दाव॥

गुरु और गुरु में भेद होता है, उनके भावों में भी अंतर होता है। नित्य उसी गुरु को वंदन करो जो शब्द का सही मर्म बता दे।

गुरु महिमा
415

जो गुरु को तो गम नहीं, पाहन दिया बताय।
शिष शोधे बिन सेइया, पार न पहुँचा जाए॥

जिस गुरु को स्वयं मार्ग का पता नहीं, उसने पत्थर पूजने को बता दिया। और शिष्य ने बिना परखे उसकी सेवा कर ली—ऐसे में पार पहुँचना संभव नहीं।

गुरु महिमा
418

गुरु नाम है गम्य का, शीष सीख ले सोय।
बिनु पद बिनु मरजाद नर, गुरु शीष नहिं कोय॥

गुरु उस लक्ष्य का नाम है जहाँ पहुँचना है, और शिष्य वह जो सीख ले। जिसमें न पद की समझ है न मर्यादा, वह न गुरु है न शिष्य।

गुरु महिमा
419

गुरुवा तो घर फिरे, दीक्षा हमारी लेह।
कै बूड़ौ कै ऊबरो, टका परदानी देह॥

आजकल गुरु घर-घर घूमकर कहता है—हमारी दीक्षा ले लो। चाहे डूबो या उबरो, बस दक्षिणा का टका दे दो। यह गुरुता का पतन है।

गुरु महिमा
422

गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तन ताप।
हरष शोष व्यापे नहीं, तब गुरु आपे आप॥

गुरु मिले, यह तभी जानो जब मोह और शरीर का ताप मिट जाए। जब हर्ष-शोक व्यापें नहीं, तब समझो गुरु स्वयं भीतर प्रकट हो गए।

गुरु महिमा
425

कहता हूँ कहि जात हूँ, देता हूँ हेला।
गुरु की करनी गुरु जाने, चेला की चेला॥

मैं कहता हूँ, कहता चला जाता हूँ और पुकारकर सचेत करता हूँ। आगे गुरु की करनी गुरु जाने और चेले की चेला—हर कोई अपने कर्म का उत्तरदायी है।

गुरु महिमा
426

शिष्य पुजै आपना, गुरु पूजै सब साध।
कहें कबीर गुरु शीष को, मत है अगम अगाध॥

शिष्य केवल अपने गुरु को पूजता है, पर गुरु सभी साधुओं को पूजते हैं। कबीर कहते हैं—गुरु और शिष्य का यह मत अगम और अथाह है।

गुरु महिमा
427

हिरदे ज्ञान न उपजै, मन परतीत न होय।
ताके सद्गुरु कहा करें, घनघसि कुल्हरन होय॥

जिसके हृदय में ज्ञान न उपजे और मन में विश्वास न हो, उसका सद्गुरु क्या करें? कितना ही घिसो, पत्थर कुल्हाड़ी नहीं बनता।

गुरु महिमा
430

स्वामी सेवक होय के, मनही में मिलि जाय।
चतुराई रीझै नहीं, रहिये मन के माय॥

स्वामी और सेवक मन ही मन एक हो जाएँ, यही सच्चा संबंध है। चतुराई से कोई प्रसन्न नहीं होता—मन के भीतर सरल बने रहो।

गुरु महिमा
431

गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि।
बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि॥

गुरु जान-परखकर बनाओ, जैसे पानी छानकर पिया जाता है। बिना विचारे गुरु बनाने वाला चौरासी लाख योनियों में भटकता है।

गुरु महिमा
432

सत को खोजत मैं फिरूँ, सतिया न मिलै न कोय।
जब सत को सतिया मिले, विष तजि अमृत होय॥

मैं सत्य को खोजता फिरता हूँ, पर सत्यनिष्ठ कोई नहीं मिलता। जब सत्य को सत्यवान मिल जाए, तब विष छूटकर अमृत बन जाता है।

गुरु महिमा
433

देश-देशांतर मैं फिरूँ, मानुष बड़ा सुकाल।
जा देखै सुख उपजै, वाका पड़ा दुकाल॥

देश-विदेश घूम आया, मनुष्यों की तो बहुतायत है। पर जिसे देखकर मन में सुख उपजे, ऐसे व्यक्ति का अकाल पड़ा हुआ है।

गुरु महिमा
436

जो कामिनि परदै रहे, सुनै न गुरुगुण बात।
सो तो होगी कूकरी, फिरै उघारे गात॥

जो पर्दे में तो रहे पर गुरु के गुणों की बात न सुने—वह आवरण किस काम का? भीतर का ढका होना बाहरी परदे से अधिक महत्त्व रखता है।

गुरु महिमा
442

कंचन मेरू अरपही, अरपें कनक भंडार।
कहें कबीर गुरु बेमुखी, कबहूँ न पावै पार॥

कोई सुमेरु जितना सोना चढ़ा दे और स्वर्ण के भंडार अर्पित कर दे—कबीर कहते हैं, गुरु से विमुख व्यक्ति फिर भी कभी पार नहीं पाता।

गुरु महिमा
444

शुकदेव सरीखा फेरिया, तो को पावे पार।
बिनु गुरु निगुरा जो रहे, पड़े चौरासी धार॥

शुकदेव जैसे को भी लौटा दिया गया, तो और कौन पार पाएगा? जो बिना गुरु के निगुरा रह जाता है, वह चौरासी की धारा में पड़ जाता है।

गुरु महिमा
447

साकट मन का जेवरा, भजै सो करराय।
दो अच्छर गुरु बहिरा, बाधा जमपुर जाय॥

नास्तिक मन की रस्सी से बँधा है और जोर-जोर से चिल्लाता है। गुरु के दो अक्षरों के प्रति वह बहरा है, इसलिए बँधकर यमपुर जाता है।

गुरु महिमा
453

निगुरा ब्राह्मण नहिं भला, गुरुमुख भला चमार।
देवतन से कुत्ता भला, नित उठि भूँके द्वार॥

बिना गुरु वाला ब्राह्मण अच्छा नहीं, गुरुमुख चमार अच्छा है। निष्क्रिय देवताओं से तो वह कुत्ता भला जो नित्य उठकर द्वार पर पहरा देता है।

गुरु महिमा
555

जौ मानुष गृह धर्मयुत, राखै शील विचार।
गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच, सेवा सार॥

जो गृहस्थ धर्म में रहते हुए भी शील और विचार बनाए रखे, गुरु की वाणी सुने, साधु-संग करे और मन-वचन से सेवा करे—वही सार्थक जीवन है।

गुरु महिमा
608

तू तू करूँ तो निकट है, दुर-दुर करू हो जाय।
जों गुरु राखै त्यों रहै, जो देवै सो खाय॥

'तू-तू' कहकर पुकारो तो वह निकट है, दुत्कारो तो दूर हो जाता है। गुरु जैसे रखें वैसे रहो और जो दें वही खाओ।

गुरु महिमा
610

अनराते सुख सोवना, राते नींद न आय।
यों जल छूटी माछरी, तलफत रैन बिहाय॥

जो प्रेम में रँगे नहीं वे सुख से सोते हैं, पर रँगे हुए को नींद नहीं आती। जल से बिछड़ी मछली की तरह उसकी रात तड़पते ही बीतती है।

गुरु महिमा
612

गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गये, आये सिर पर काल॥

जो गुरु की आज्ञा नहीं मानता और मनमानी चाल चलता है, उसका लोक और परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं और सिर पर काल आ खड़ा होता है।

गुरु महिमा
613

आशा करै बैकुंठ की, दुरमति तीनों काल।
शुक्र कही बलि ना करीं, ता ते गयो पताल॥

बैकुंठ की आशा करता है पर तीनों काल कुबुद्धि में लगा रहता है। बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी, इसीलिए पाताल चला गया।

गुरु महिमा
614

द्वार धनी के पड़ि रहे, धका धनी का खाय।
कबहुक धनी निवाजि है, जो दर छाड़ि न जाय॥

स्वामी के द्वार पर पड़े रहो और उसी के धक्के सहते रहो। जो द्वार नहीं छोड़ता, स्वामी कभी न कभी उस पर कृपा कर ही देता है।

गुरु महिमा
616

कहें कबीर गुरु प्रेम बस, क्या नियरै क्या दूर।
जाका चित जासों बसै, सौ तेहि सदा हजूर॥

गुरु के प्रेम में बँधे हों तो पास या दूर होने का कोई अर्थ नहीं। जिसका चित्त जिसमें बसता है, वह सदा उसके सामने ही रहता है।

गुरु महिमा
617

गुरु आज्ञा लै आवही, गुरु आज्ञा लै जाय।
कहें कबीर सो संत प्रिय, बहु विधि अमृत पाय॥

जो गुरु की आज्ञा लेकर आता है और आज्ञा लेकर ही जाता है—कबीर कहते हैं, वही संत प्रिय है और अनेक प्रकार से अमृत पाता है।

गुरु महिमा
618

गुरुमुख गुरु चितवत रहे, जैसे मणिहि भुजंग।
कहें कबीर बिसरे नहीं, यह गुरु मुख के अंग॥

गुरुमुख शिष्य गुरु का ध्यान ऐसे रखता है जैसे साँप अपनी मणि का। कबीर कहते हैं—वह कभी नहीं भूलता, यही गुरुमुख का लक्षण है।

गुरु महिमा
619

यह सब तच्छन चितधरे, अप लच्छन सब त्याग।
सावधान सम ध्यान है, गुरु चरनन में लाग॥

इन सब सद्गुणों को मन में धारण करे और सारे दुर्गुण त्याग दे। सावधानी और समता ही ध्यान है—मन गुरु के चरणों में लगा रहे।

गुरु महिमा
622

कबीर गुरु कै भावते, दूरिह ते दीसंत।
तन छीना मन अनमना, जग से रूठि फिरंत॥

गुरु के प्रिय भक्त दूर से ही पहचान लिए जाते हैं—उनका शरीर दुबला होता है, मन अनमना और वे संसार से विरक्त फिरते हैं।

गुरु महिमा
623

सुख दुख सिर ऊपर सहै, कबहु न छोड़े संग।
रंग न लागै का, व्यापै सतगुरु रंग॥

जो सुख-दुःख सिर पर सहकर भी साथ नहीं छोड़ता, उस पर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ता—उस पर केवल सतगुरु का रंग व्यापता है।

गुरु महिमा
624

गुरु समरथ सिर पर खड़े, कहा कभी तोहि दास।
रिद्धि-सिद्धि सेवा करै, मुक्ति न छोड़े पास॥

समर्थ गुरु सिर पर खड़े हों तो हे दास, तुझे किस बात की चिंता? ऋद्धि-सिद्धि स्वयं सेवा करती हैं और मुक्ति पास से हटती ही नहीं।

गुरु महिमा
626

काहू को न सतापिये, जो सिर हंता होय।
फिर फिर वाकूँ बंदिये, दास लच्छन है सोय॥

किसी को मत सताओ, चाहे वह तुम्हारा प्राण लेने वाला ही क्यों न हो। बार-बार उसे भी प्रणाम करो—यही सच्चे दास का लक्षण है।

गुरु महिमा
707

यह तन काँचा कुंभ है, चोट चहूँ दिस खाय।
एकहि गुरु के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय॥

यह शरीर कच्चा घड़ा है जो चारों ओर से चोट खाता रहता है। एक गुरु के नाम के बिना यह देर-सबेर नष्ट हो ही जाता है।

गुरु महिमा
723

डर करनी डर परम गुरु, डर पारस डर सार।
डरत रहै सो ऊबरे, गाफिल खाई मार॥

भय ही सच्ची करनी है, भय ही परम गुरु, भय ही पारस और भय ही सार है। जो सचेत भय में रहता है वह उबर जाता है और लापरवाह मार खाता है।

गुरु महिमा
728

बैल गढ़ंता नर, चूका सींग रु पूँछ।
एकहि गुरु के ज्ञान बिनु, धिक दाढ़ी धिक मूँछ॥

गढ़ते-गढ़ते बैल बना डाला, पर सींग और पूँछ ही चूक गए। एक गुरु के ज्ञान के बिना ऐसी दाढ़ी और मूँछ को धिक्कार है।

गुरु महिमा
776

घाट जगाती धर्मराय, गुरुमुख ले पहिचान।
छाप बिना गुरु नाम के, साकट रहा निदान॥

घाट पर धर्मराज चुंगी लेने बैठे हैं, वे गुरुमुख को पहचान लेते हैं। गुरु के नाम की छाप के बिना नास्तिक वहीं रोक लिया जाता है।

गुरु महिमा