गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं।
भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहिं॥
जिसने केवल देहधारी को गुरु बना लिया और सच्चे सतगुरु को नहीं पहचाना, वह भवसागर के जाल में बार-बार गोते खाता रहता है।
गुरु महिमा