गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा—वह गढ़-गढ़कर खोट निकालता है। भीतर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से चोट मारता है। अनुशासन में भी करुणा छिपी होती है।
गुरु महिमा