गुरु को कीजै दंडवत, कोटि-कोटि परनाम।
कीट न जाने भृंग को, गुरु करले आप समान॥
गुरु को कोटि-कोटि प्रणाम और दंडवत करो। जैसे भृंगी कीड़े को अपने समान बना लेती है, वैसे ही गुरु शिष्य को अपने समान बना लेते हैं।
गुरु महिमा