द्वार धनी के पड़ि रहे, धका धनी का खाय।
कबहुक धनी निवाजि है, जो दर छाड़ि न जाय॥
स्वामी के द्वार पर पड़े रहो और उसी के धक्के सहते रहो। जो द्वार नहीं छोड़ता, स्वामी कभी न कभी उस पर कृपा कर ही देता है।
गुरु महिमा