जौ मानुष गृह धर्मयुत, राखै शील विचार।
गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच, सेवा सार॥
जो गृहस्थ धर्म में रहते हुए भी शील और विचार बनाए रखे, गुरु की वाणी सुने, साधु-संग करे और मन-वचन से सेवा करे—वही सार्थक जीवन है।
गुरु महिमा