मलमल खासा पहिनते, खाते नागर पान।
टेढ़ा होकर चलते, करते बहुत गुमान॥
जो मलमल और बढ़िया वस्त्र पहनते थे, नागर पान खाते थे, अकड़कर चलते थे और बहुत घमंड करते थे—वे भी नहीं रहे।
अहंकार और गर्व
जो मलमल और बढ़िया वस्त्र पहनते थे, नागर पान खाते थे, अकड़कर चलते थे और बहुत घमंड करते थे—वे भी नहीं रहे।
अहंकार और गर्व
तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय।
कबहुँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होय॥
पाँव के नीचे पड़े छोटे-से तिनके को भी तुच्छ समझकर उसका अपमान मत करो। वही तिनका यदि कभी उड़कर आँख में पड़ जाए तो असहनीय पीड़ा देता है। किसी को छोटा मानकर तिरस्कार करना उचित नहीं।
अहंकार और गर्वमाटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय॥
मिट्टी कुम्हार से कहती है—आज तू मुझे रौंद रहा है, पर एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुझे अपने भीतर समेट लूँगी। अहंकार व्यर्थ है; अंत में सबको इसी माटी में मिलना है।
अहंकार और गर्वजहाँ आपा तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग।
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग॥
जहाँ अहंकार है वहाँ विपत्ति है, और जहाँ संदेह है वहाँ रोग। कबीर कहते हैं—ये विकार तभी मिटते हैं जब मन में धैर्य आ जाए। अहं और संशय ही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।
अहंकार और गर्वजग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय।
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय॥
यदि मन शांत हो तो संसार में कोई शत्रु नहीं रह जाता। बस अपना अहंकार छोड़ दो, फिर सब तुम पर स्नेह और दया करने लगेंगे। बैर बाहर नहीं, भीतर के अहं में है।
अहंकार और गर्व