तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूँ।
वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तू॥
'तू-तू' करते-करते मैं स्वयं तू ही हो गया, मुझमें 'मैं' बची ही नहीं। अब जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है। यह अहं के विसर्जन की चरम अवस्था है।
अहंकार और गर्व