रचनाहार कूं चीन्हि लै, खैबे कूं कहा रोइ।
दिल मंदि में पैसि करि, ताणि पछेवड़ा सोइ॥
उस रचयिता को पहचान ले, खाने-पीने के लिए क्या रोना? हृदय रूपी मंदिर में प्रवेश करके चादर तानकर निश्चिंत सो जा।
उपदेश और चेतावनी