अब तौ जूझ्या ही बणै, मुडि चल्याँ घर दूर।
सिर साहिबा कौ सोंपता, सोंच न कीजै सूर॥
अब तो जूझना ही बनेगा, लौटकर जाएँ तो घर बहुत दूर है। हे वीर! सिर स्वामी को सौंपते समय सोच-विचार मत कर। समर्पण में हिचक नहीं चलती।
उपदेश और चेतावनी