जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप।
पुष्प बास ते पामरा, ऐसा तत्त्व अनूप॥
उस परम तत्त्व का न मुख है न माथा, न वह सुंदर है न कुरूप। वह फूल की सुगंध से भी सूक्ष्म है—ऐसा अनुपम है वह तत्त्व, जिसे रूप में बाँधा नहीं जा सकता।
उपदेश और चेतावनी