जो जाने जीव न आपना, करहीं जीव का सार।
जीवा ऐसा पाहौना, मिले ना दूजी बार॥
जो यह नहीं समझता कि यह जीव उसका अपना है, वह उसकी सुध कैसे लेगा? यह जीवन रूपी अतिथि ऐसा है जो दूसरी बार नहीं मिलेगा। इसकी सँभाल अभी कर लो।
उपदेश और चेतावनी