आस पराई राखता, खाया घर का खेत।
औरन को उपदेशता, मुख में पड़ रेत॥
जो दूसरों से आशा लगाए बैठा रहा, उसका अपना खेत भी चौपट हो गया। और जो स्वयं करता कुछ नहीं, केवल दूसरों को उपदेश देता है—उसके मुँह में रेत ही पड़े। कथनी से पहले करनी चाहिए।
उपदेश और चेतावनी