सोना, सज्जन, साधुजन, टूट जुड़ै सौ बार।
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एके धका दरार॥

अर्थ

सोना, सज्जन और साधु—ये सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं। पर दुर्जन कुम्हार के कच्चे घड़े जैसा है, एक ही धक्के में दरक जाता है और फिर नहीं जुड़ता।

सत्संग और संगति

सत्संग और संगति पर और दोहे

052

हंसा मोती चुगत था, कुच्छ थार भराय।
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय॥

हंस मोती चुगता है और थाल भरता जाता है। पर जो व्यक्ति मार्ग ही नहीं जानता, उससे कोई क्या करा सकता है? पात्रता के बिना अवसर भी व्यर्थ हो जाता है।

सत्संग और संगति
117

कबीर जात पुकारया, चढ़ चंदन की डार।
बाट लगाए ना लगे, फिर क्या लेत हमार॥

कबीर चंदन की डाल पर चढ़कर पुकार-पुकारकर मार्ग बताते रहे। जो फिर भी राह पर नहीं आया, उसका उपदेशक क्या ले लेगा? सुनना और अपनाना सुनने वाले पर निर्भर है।

सत्संग और संगति
134

हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप।
निशिवासर सुख निधि, लहा अटल प्रगटा आप॥

हरि की संगति से मन शीतल हो गया और मोह का ताप मिट गया। दिन-रात सुख का भंडार मिल गया और भीतर अटल आत्मस्वरूप स्वयं प्रकट हो गया।

सत्संग और संगति
139

कबीरा संगति साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खाँड़ भोजन मिले, ताकर संग न जाय॥

साधु की संगति में जौ की भूसी भी खानी पड़े तो स्वीकार है, पर कुसंग में खीर और शक्कर का भोजन मिले तो भी वह संग नहीं करना चाहिए। संगति भोजन से बड़ी है।

सत्संग और संगति