हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप।
निशिवासर सुख निधि, लहा अटल प्रगटा आप॥
हरि की संगति से मन शीतल हो गया और मोह का ताप मिट गया। दिन-रात सुख का भंडार मिल गया और भीतर अटल आत्मस्वरूप स्वयं प्रकट हो गया।
सत्संग और संगति