पाणी ही तै पातला, धुवाँ ही तै झीण।
पवनां बेगि उतावला, सो दोस्त कबीर कीन्ह॥
जो पानी से भी पतला है, धुएँ से भी सूक्ष्म और हवा से भी तेज—कबीर ने उसी को अपना मित्र बनाया है। परमात्मा इंद्रियों की पकड़ से परे है।
मन और संयम