चंदन जैसा साधु है, सर्पहि सम संसार।
वाके अंग लपटा रहे, मन में नाहिं विकार॥
साधु चंदन के वृक्ष जैसा है और संसार साँप के समान। साँप चंदन से लिपटा रहता है, फिर भी चंदन के मन में कोई विकार नहीं आता—वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।
मन और संयम