अबरन कों का बरनिये, भोपै लख्या न जाइ।
अपना बाना वाहिया, कहि-कहि थाके भाइ॥
जिसका कोई वर्ण-रूप ही नहीं, उसका वर्णन कैसे करें? वह इंद्रियों से जाना नहीं जाता। सब अपनी-अपनी बात कह-कहकर थक गए, पर कोई पार न पा सका।
मन और संयम