कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूँ मैं भ्रम।
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम॥

अर्थ

मन इस भ्रम में फूला फिरता है कि 'मैं करता हूँ'। इसी अहंकार में वह करोड़ों कर्मों का बोझ सिर पर लादे चला जा रहा है और अपना भ्रम देख ही नहीं पाता।

मन और संयम

मन और संयम पर और दोहे

028

आया था किस काम को, तू सोया चादर तान।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान॥

तू इस संसार में किस काम के लिए आया था, और चादर तानकर बेसुध सो रहा है! हे लापरवाह मनुष्य, अपनी सुध सँभाल और अपने असली स्वरूप को पहचान।

मन और संयम
041

बाजीगर का बाँदरा, ऐसा जीव मन के साथ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ॥

जीव मन के हाथों वैसे ही नचाया जाता है जैसे मदारी अपने बंदर को नचाता है। मन तरह-तरह के नाच दिखाकर जीव को अपने वश में बनाए रखता है। मन को साधना ही साधना है।

मन और संयम
042

अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट।
चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पटन को फूट॥

शरीर में तीर की नोक अटकी रह गई है और तीर टूट चुका है। यह चुम्बक के बिना नहीं निकलेगी, चाहे करोड़ों उपाय कर लो। इसी तरह मन में धँसा विकार गुरु-कृपा रूपी चुम्बक से ही निकलता है।

मन और संयम
063

मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार।
तुम दाता दुःख भंजना, मेरी करो सम्हार॥

मैं जन्म से ही अपराधी हूँ और नख से शिखा तक विकारों से भरा हूँ। तुम दाता हो और दुःखों को हरने वाले हो—मेरी सँभाल करो। यह विनम्र आत्म-स्वीकृति है।

मन और संयम