चतुराई सूवै पढ़ी, सोइ पंजर माहिं।
फिरि प्रमोधै आन कों, आपण समझे नाहिं॥
तोते ने चतुराई की बातें रट लीं, पर वह स्वयं पिंजरे में ही बंद है। वह दूसरों को उपदेश देता है, पर अपनी दशा नहीं समझता। रटा हुआ ज्ञान मुक्त नहीं करता।
ज्ञान और विवेक