कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय॥

अर्थ

जो कहना था कह दिया, अब कुछ कहने को शेष नहीं। द्वैत मिट गया, केवल एक बचा—जैसे लहर दरिया में समा जाती है। यह अद्वैत-अनुभव की चरम अवस्था है।

ज्ञान और विवेक

ज्ञान और विवेक पर और दोहे

010

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

संत की जाति मत पूछो, उसका ज्ञान परखो। जैसे तलवार खरीदते समय उसकी धार का मोल लगाया जाता है, म्यान का नहीं—वैसे ही मनुष्य का मूल्य उसके गुणों से है, कुल या जाति से नहीं।

ज्ञान और विवेक
035

हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट।
बाँधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट॥

जहाँ साग-सब्जी बेचने वालों का बाजार हो वहाँ हीरे की गठरी मत खोलो। वहाँ चुप्पी की पोटली बाँधकर अपने रास्ते चल दो। ज्ञान अपात्र के सामने प्रकट करना व्यर्थ है।

ज्ञान और विवेक
054

वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल।
बिना करम का मानव, फिरै डावाडोल॥

अनमोल वस्तु सागर की तरह भरी पड़ी है, पर उसका कोई ग्राहक नहीं। भाग्यहीन और कर्महीन मनुष्य यूँ ही डाँवाडोल भटकता फिरता है। मूल्य वस्तु का नहीं, पारखी का अभाव है।

ज्ञान और विवेक
055

कलि खोटा जग आँधरा, शब्द न माने कोय।
चाहे कहूँ सत आइना, सो जग बैरी होय॥

कलियुग खोटा है और संसार अंधा—कोई सच्चे उपदेश को नहीं मानता। जो दर्पण की तरह सच दिखा दे, संसार उसी को अपना शत्रु बना लेता है।

ज्ञान और विवेक